#आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार #चैत्र ( मार्च-अप्रैल) – इस महीने में गुड का सेवन करे क्योकि गुड आपके रक्त संचार और रक्त को शुद्ध करता है एवं कई बीमारियों से भी बचाता है। चैत्र के महीने में नित्य नीम की 4 – 5 कोमल पतियों का उपयोग भी करना चाहिए इससे आप इस महीने के सभी दोषों से बच सकते है। नीम की पतियों को चबाने से शरीर में स्थित दोष शरीर से हटते है। #वैशाख (अप्रैल – मई)- वैशाख महीने में गर्मी की शुरुआत हो जाती है। बेल पत्र का इस्तेमाल इस महीने में अवश्य करना चाहिए जो आपको स्वस्थ रखेगा। वैशाख के महीने में तेल का उपयोग बिल्कुल न करे क्योकि इससे आपका शरीर अस्वस्थ हो सकता है। #ज्येष्ठ (मई-जून) – भारत में इस महीने में सबसे अधिक गर्मी होती है। ज्येष्ठ के महीने में दोपहर में सोना स्वास्थ्य वर्द्धक होता है , ठंडी छाछ , लस्सी, ज्यूस और अधिक से अधिक पानी का सेवन करें। बासी खाना, गरिष्ठ भोजन एवं गर्म चीजो का सेवन न करे। इनके प्रयोग से आपका शरीर रोग ग्रस्त हो सकता है। #अषाढ़ (जून-जुलाई) – आषाढ़ के महीने में आम , पुराने गेंहू, सत्तु , जौ, भात, खीर, ठन्डे पदार्थ , ककड़ी, पलवल, करेला, बथुआ आदि का उ...
आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है? (उदाहरण सहित विस्तार से) 🔷 प्रस्तावना. हिंदू शास्त्रों में आत्महत्या (Self-Suicide) को महान पाप कहा गया है। यह केवल एक शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि धर्म, आत्मा और पुनर्जन्म के नियमों का उल्लंघन भी माना गया है। आत्महत्या का अर्थ है—प्रकृति द्वारा तय की गई जीवन-यात्रा को बीच में छोड़ देना। यह कार्य न केवल स्वयं के लिए हानिकारक है, बल्कि समाज और सृष्टि-चक्र के लिए भी बाधक होता है। 🔶 आत्महत्या क्यों पाप है? शास्त्रों की दृष्टि से 1. जीवन ईश्वर का दिया हुआ वरदान है "शरीरं धर्मसाधनम्" – (मनुस्मृति) इसका अर्थ है – यह शरीर धर्म का साधन है। हमें यह शरीर पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है, जिससे हम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की ओर बढ़ सकें। इसे स्वेच्छा से त्याग देना ईश्वर के आदेश का अनादर है। 2. कर्म-चक्र का उल्लंघन हर प्राणी को अपने कर्मों का फल भोगना ही होता है , चाहे वह सुख हो या दुःख। आत्महत्या करके कोई व्यक्ति यह सोचता है कि वह अपने दुखों से बच जाएगा, लेकिन वास्तव में वह अपने अधूरे कर्मों को अगले जन्म मे...
भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है, क्योंकि उन्होंने यह शिक्षा दी कि ज्ञान किसी भी स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरु बनाए, जिनमें मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रकृति और विभिन्न जीव-जंतु भी शामिल थे। इन सभी से उन्होंने कुछ न कुछ महत्वपूर्ण सीखा। यह दर्शाता है कि सीखने की कोई सीमा नहीं होती और हर चीज में हमें गुरु तत्व दिख सकता है, बशर्ते हमारे पास विवेक और जिज्ञासा हो। आइए जानते हैं भगवान दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे मिली शिक्षाएँ: दत्तात्रेय के 24 गुरु और उनसे प्राप्त शिक्षाएँ * पृथ्वी: पृथ्वी से दत्तात्रेय ने सहनशीलता, क्षमा और परोपकार की शिक्षा ली। पृथ्वी सभी जीवों का भार सहन करती है और बिना किसी भेदभाव के उन्हें आश्रय और पोषण देती है। इससे उन्होंने सीखा कि व्यक्ति को संसार के सुख-दुख को सहन करते हुए, अपनी प्रकृति में दृढ़ रहना चाहिए और दूसरों का भला करना चाहिए। * वायु: वायु हर जगह मौजूद होती है, लेकिन किसी से चिपकती नहीं। इससे उन्होंने निर्लिप्तता और अनासक्ति सीखी। जिस प्रकार वायु अच्छी-बुरी गंध से अप्रभावित रहती है, उसी प्रकार ...
Comments
Post a Comment