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यक्षों की उत्पत्ति

पुराणों के अनुसार, यक्षों की उत्पत्ति राक्षसों के साथ स्वयं परमपिता ब्रह्मा से हुई थी।  जब ब्रह्मा जी ने जल की उत्पत्ति की तो उसकी रक्षा के लिए कुछ प्राणियों का निर्माण किया। उनमें से ही पहले थे यक्ष एवं राक्षस।  जब ब्रह्मा जी ने पूछा कि इस जल की रक्षा कौन करेगा तो हेति और प्रहेति नामक दो प्राणियों ने उसकी रक्षा का प्रण लिया और इसीलिए वे राक्षस कहलाये। ब्रह्मा जी से ही उत्पन्न एक अन्य जाति ने उस जल के यक्षण, अर्थात पूजा और वृद्धि का प्रण लिया और वे यक्ष कहलाये। हालाँकि प्रथम यक्ष कौन था इसके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती। कुछ लोग कुबेर को प्रथम यक्ष मानते हैं किन्तु उनका जन्म बहुत बाद में हुआ। आगे चल कर इन्ही यक्षों की शक्तियां यक्षिणियां कहलाईं। आगे चल कर जब कुबेर यक्षों के राजा और दिग्पाल बनें तो ये सभी यक्षिणियां उनकी अनुचरी बनी। आज भी यक्षिणियों को कुबेर की द्वारपाल के रूप में चित्रित किया जाता है। ये भगवान रूद्र की सेविकाएं भी हैं। ऐसी मान्यता है कि यक्षिणियों का निवास पृथ्वी पर और पृथ्वी के निकट के लोकों में ही होता है और वे इस पृथ्वी की सभी सम्पदाओं की रक्षा करती ...

श्री केदारनाथ मंदिर

बहुत से लोग सोचते हैँ की आजकल लोग श्री केदारनाथ मंदिर के दर्शन हेतु क्यूँ लालायित रहते हैँ.... तो ये रहा उत्तर..... 👇👇👇👇 DRDO के रिसर्च और रात मे शिवलिंग से निकलती नीली रौशनी का रहस्य.... 1. 2013 की आपदा: जब केदारनाथ डूबा, पर शिवलिंग नहीं हिला..... 16 जून 2013। केदारनाथ में बादल फटा। मंदाकिनी में सुनामी आई। 10,000 लोग मरे। पूरा केदारनाथ शहर बह गया।  पर चमत्कार देखो - केदारनाथ मंदिर को खरोंच तक नहीं आई। 1000 साल पुराना मंदिर, 400 किमी/घंटा की रफ्तार से आए पत्थरों के सैलाब के बीच खड़ा रहा।  क्यों?  क्योंकि मंदिर के ठीक पीछे एक विशाल शिला आकर अटक गई थी। 20 फीट ऊँची, 60 फीट चौड़ी। उसने मंदिर को ढाल की तरह बचा लिया।  वैज्ञानिक बोले - "संयोग है।"   भक्त बोले - "नहीं, भीम शिला है। महादेव ने भेजी थी।" पर असली रहस्य तो आपदा के 10 साल बाद खुला। 2023 में। 2. DRDO की रिसर्च: जब शिवलिंग से रेडिएशन निकला 2023, मई। चारधाम यात्रा शुरू हुई। DRDO और ISRO की टीम केदारनाथ में "हिमालयन एनर्जी स्टडी" कर रही थी। मंदिर के अंदर Geiger Counter ले गए - रेडिएशन नापने के लिए। गर्भ...

एक सदाशिव है तो एक शिव है। एक महाविष्णु है तो एक विष्णु है। एक ब्रह्म है तो एक ब्रह्मा है।

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√•विष्णु के अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं है अष्टाविंशद्वय= २८ नक्षत्रों से युक्त नीलवर्ण आकाश का विष्णु  तामसरूप है। यह देखा जाता दिखायी पड़ता तथा इससे इसके आलोक में पार्थिव वस्तुएँ देखी जाती हैं। इससे यह पशु है। वृक्ष, लता, गुल्म, वीरुध, तृण तथा गिरि-यह ६ भेदों वाला मुख्य (उद्भिद) रूप भी विष्णु का है। खन् + अच् + यत्= मुख्य भूमि को खन कर/ चीर कर निकला हुआ प्राणी/वनस्पति समुदाय मुख्य वा उद्भिद है। विष्णु के इन नाना रूपों को नमस्कार कर मैं श्री महाराज जी के सम्मुख भक्तिभाव से नत होता हूँ। √• एक सदाशिव है तो एक शिव है। एक महाविष्णु है तो एक विष्णु है। एक ब्रह्म है तो एक ब्रह्मा है। सदाशिव, महाविष्णु एवं ब्रह्म का वर्णन करना किसी के लिये भी शक्य नहीं है। जो पुरुष स्त्री के साथ ऊंचे स्थान एकान्त में अपरिग्रह वृत्ति से रहता हुआ पत्नी को ज्ञान कथा सुनाता, समाधि लगाता ऐसा पुरुष शिव है। उसे प्रणाम । जो पुरुष द्वीप द्वीपान्तर में सबसे दूर समुद्र से घिरे व दुर्गम स्थान में पत्नी सहित रहते हुए योगनिद्रा में लीन रहता तथा समस्त जगत् के कल्याण का उपक्रम करता, वह विष्णु है। उसे मेरा सादर प्रणाम । जो...

ब्रह्मा जी का एक दिन हमारी पृथ्वी के कितने वर्षों के बराबर होता है।

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हिन्दू धर्म में चतुर्युगी व्यवस्था है जिनमे चार युग होते हैं - सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग। हिन्दू धर्म की काल गणना हमारे ग्रंथों की सबसे रोचक जानकारियों में से एक है। इसके विषय में जितना भी जाना जाये वो कम है। इसके अतिरिक्त आश्चर्यजनक रूप से हमारी सहस्त्रों वर्षों पुरानी गणना वैज्ञानिक रूप से बिलकुल सटीक बैठती है। आइये इस महत्वपूर्ण विषय को जानते हैं। 6 श्वास से एक विनाड़ी बनती है। 10 विनाडियों से एक नाड़ी बनती है। 60 नाड़ियों से एक दिवस (दिन और रात्रि) बनते हैं। 30 दिवसों से एक मास (महीना) बनता है। 6 मास का एक अयन होता है।  2 अयन का एक मानव वर्ष (मनुष्यों का वर्ष) होता है।  हिन्दू धर्म के अनुसार 1 मानव वर्ष में 360 दिवस होते हैं। यहाँ 365 वाली गणना नहीं चलती। 15 मानव वर्ष के बराबर पित्तरों का 1 वर्ष होता है जिसे पितृवर्ष कहते है।  360 मानव वर्षों का एक दिव्य वर्ष होता है। दिव्य वर्ष देवताओं के एक वर्ष को कहते हैं। दैत्यों का एक वर्ष भी इतना ही होता है। बस अंतर ये है कि देवताओं का दिन दैत्यों की रात्रि और देवताओं की रात्रि दैत्यों का दिन होती है। ...

पुरुषोत्तम, मल अथवा अधिक मास

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"पुरुषोत्तम, मल अथवा अधिक मास : शास्त्रीय एवं गणितीय अध्ययन भारतीय पंचाङ्ग, खगोलीय गणना तथा धार्मिक महत्त्व के आलोक में" ✓•प्रस्तावना: भारतीय कालगणना-पद्धति विश्व की प्राचीनतम एवं वैज्ञानिक समय-निर्धारण प्रणालियों में से एक है। भारतीय मनीषियों ने केवल दिन, मास और वर्ष की गणना ही नहीं की, अपितु सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों की गतियों के समन्वय द्वारा ऐसी अद्भुत पंचाङ्ग व्यवस्था निर्मित की, जो खगोलीय, धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है। इसी पंचाङ्ग व्यवस्था का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है — अधिक मास, जिसे शास्त्रों में मलमास तथा पुरुषोत्तम मास भी कहा गया है। अधिक मास और ग्रहों की गति अधिक मास और ग्रहों की गति का संबंध हिंदू पंचांग की एक विशेषता है। यह अतिरिक्त महीना सूर्य और चंद्र कैलेंडर के बीच के अंतर को संतुलित करने के लिए आता है। क्यों आता है अधिक मास? - एक सौर वर्ष में लगभग 365 दिन होते हैं। - एक चंद्र वर्ष में लगभग 354 दिन होते हैं। - इस अंतर को संतुलित करने के लिए हर 3 साल में लगभग 32-33 दिनों का एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास...

पंचामृत

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●●●पंचामृत: शास्त्रोक्त विधि, वैज्ञानिक आधार और आध्यात्मिक रहस्य ●●● भारतीय संस्कृति में पंचामृत केवल एक प्रसाद नहीं, बल्कि आयुर्वेद और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। ‘पंच’ यानी पाँच और ‘अमृत’ यानी अमरत्व देने वाला—यह पाँच दिव्य तत्वों का ऐसा संतुलन है, जो तन, मन और आत्मा को शुद्ध करता है। ●●शास्त्रोक्त विधि (सही अनुपात) “सर्पिषा द्विगुणं क्षौद्रं, क्षौद्रात् द्विगुणशर्करा। दध्नश्च द्विगुणं दुग्धं, पञ्चामृतमुदाहृतम्।।" ●अर्थ: घी से दोगुना शहद, शहद से दोगुनी शर्करा, शर्करा से दोगुना दही, और दही से दोगुना दूध—यही है शास्त्रीय पंचामृत। ● सही अनुपात: ▪️ घी — 1 भाग ▪️ शहद — 2 भाग ▪️ शर्करा — 4 भाग ▪️ दही — 8 भाग ▪️ दूध — 16 भाग ●पंचामृत के पाँच तत्व—पाँच गुण •दूध: पवित्रता और निष्कलंकता •दही: स्थिरता और संस्कार देने की शक्ति •घी: स्नेह, ऊर्जा और तेज •शहद: मधुरता और कर्मठता •शर्करा: जीवन में आनंद और संतुलन ●●वैज्ञानिक व आयुर्वेदिक दृष्टि •यह एक प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर माना गया है •सही अनुपात शरीर के पोषण और संतुलन में सहायक होता है • तुलसी मिलाने से यह प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण भी प...

चौरासी लाख योनियों का शास्त्रीय रहस्य

चौरासी लाख योनियों का शास्त्रीय रहस्य (वेद–पुराण आधारित एक समन्वित दार्शनिक अध्ययन) 1. प्रस्तावना : जीवन का अनन्त चक्र भारतीय दर्शन में “जीव” को न तो केवल शरीर माना गया है और न ही केवल मन; बल्कि उसे एक शाश्वत चेतना माना गया है जो कर्मों के अनुसार विभिन्न देहों को धारण करती रहती है। इस निरन्तर आवागमन को संसार–चक्र कहा गया है। इसी चक्र को समझाने के लिए हमारे शास्त्रों ने एक अत्यंत गहन सिद्धान्त दिया— “चौरासी लाख योनियाँ” (८४,००,००० जीवन रूप) यह केवल संख्या नहीं, बल्कि यह एक पूर्ण जीव-विकास मॉडल है, जिसमें चेतना का क्रमिक विस्तार, कर्मों का प्रभाव, और मोक्ष का मार्ग—सब एक साथ समाहित हैं। 2. शास्त्रीय प्रमाण : कहाँ-कहाँ मिलता है यह सिद्धान्त (क) पुराणों में स्पष्ट उल्लेख सबसे प्रत्यक्ष वर्णन पुराणों में मिलता है, विशेषतः पद्मपुराण में— “चतुरशीतिलक्षाणि योनयः” अर्थात—84 लाख योनियाँ मानी गई हैं। इसमें विस्तृत वर्गीकरण भी मिलता है— जलचर – 27 लाख स्थावर (वनस्पति आदि) – 20 लाख कृमि/कीट – 11 लाख पक्षी – 10 लाख पशु – 30 लाख मनुष्य – 4 लाख इसी प्रकार गरुड़पुराण में भी ...