भारतीय ज्योतिष और पञ्चाङ्ग

भारतीय ज्योतिष और पञ्चाङ्ग

ज्योतिष => ज्योति => प्रकाश

आकाश में 2 प्रकार की ज्योति हैं।

01. स्वयं प्रकाशितः जैसे सूर्य, या अन्य तारा। 
02. दूसरे से प्रकाशितः जैसे चन्द्र सूर्य प्रकाश से प्रकाशित है। पृथ्वी तथा अन्य ग्रह मंगल, बृहस्पति आदि सूर्य से प्रकाशित हैं। आकाश में तारा समूह, सूर्य के ग्रहों की स्थिति और गति का अध्ययन ज्योतिष है।

काल गणनाः किसी समय से अब तक कितना समय बीता उसको वर्ष, मास, दिन में गिनते हैं। इसे कैलेण्डर कहते हैं। 

संस्कृत में कलन = संख्या या गणना।

दिनः सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक का समय

मासः चन्द्र की पूर्णिमा से पूर्णिमा का समय वर्षः ऋतु आरम्भ से अगले ऋतु आरम्भ तक, सूर्य के चारो तरफ पृथ्वी की परिक्रमा।

रोमन कैलेण्डर में दिन की संख्या मास के आरम्भ से 1, 2, 3, 4... 30 या 31 तक करते हैं (तिथि)।

इसके साथ 7 ग्रहों के नाम पर 7 वार हैं- 1. रवि (सूर्य), 2. सोम (चन्द्र), 3. मंगल (भौम), 4. बुध, 5. गुरु, 6. शुक्र, 7. शनि

"पञ्चाङ्ग"

भारत में 5 प्रकार से दिन लिखते हैं। अतः यहां की काल गणना को पञ्चाङ्ग (5 अङ्ग) कहते हैं।

5 अङ्ग हैं-

01. तिथिः चन्द्र का प्रकाश 15 दिन तक बढ़ता है। यह शुक्ल पक्ष है जिसमें 1 से 15 तक तिथि है। कृष्ण पक्ष में 15 दिनों तक चन्द्र का प्रकाश घतता है। इसमें भी 1 से 15 तिथि हैं।

02. वारः 7 ग्रहों के नाम पर 7 वार हैं- 1. रवि (सूर्य), 2. सोम (चन्द्र), 3. मंगल (भौम), 4. बुध, 5. गुरु, 6. शुक्र, 7. शनि

03. नक्षत्रः चन्द्र 27.3 दिन में पृथ्वी का चक्कर लगाता है। एक दिन में आकाश के जितने भाग में चन्द्र रहता है, वह उसका नक्षत्र है। 360 अंश के वृत्त को 27 भाग में बांटने पर 1 नक्षत्र 13⅓ अंश का है। चन्द्र जिस नक्षत्र में रहता है, वह उस दिन का नक्षत्र हुआ।

04. योगः चन्द्र तथा सूर्य की गति का योग कर नक्षत्र के बराबर दूरी तय करने का समय योग है। 27 योग 25 दिन में पूरा होते हैं।

05. करणः तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं।

पृथ्वी की दैनिक गति 


अक्ष भ्रमण और दिन"

1. सूर्य की 1 वर्ष में 360 अंश गति = 360 (365.5) दिन 
2. 1 दिन में गति 1 अंश 
3. पृथ्वी का अक्षभ्रमण 24 घण्टा = 360 अंश 
4. 1 अंश गति = 244 × 60/360 = 4 मिनट 
5. सूर्योदय से सूर्योदय 24 घण्टा 
6. अक्ष भ्रमण = २३23 घण्टा 56 मिनट (4 मिनट कम)

"चन्द्र परिक्रमा-मास" 

चन्द्र परिक्रमा = 27.3 दिन

परिक्रमा होने पर सूर्य भी कुछ आगे निकलता है, उतनी दूरी के लिये 2.2 दिन अमावास्या से अगली अमावास्या 27.3 + 2.2 = 29.2 दिन

"राशि-नक्षत्र 

पृथ्वी से देखने पर सूर्य परिक्रमा करता हुआ दिखाई देता है। प्रायः 365 दिन में परिक्रमा अतः वृत्त में 360 अंश।

12 चान्द्र मास (354 दिन) अतः वृत्त में 12 राशि 1 राशि = 30 अंश

चन्द्र परिक्रमा 20.3 दिन जतः 1 दिन की दूरी = 1 नक्षत्र = 360/27 = 13°20'

1. राशि = 2 + ¼ नक्षत्र

"नक्षत्र और तिचि" 

"27 नक्षत्र" 
1. अश्विनी,     2. भरणी     3. कृत्तिका     4. रोहिणी     5. मृगशिरा     6. आर्दा     7. पुनर्वसु     8. पुष्य     9. अश्लेषा     10. मघा     11. पूर्वा फाल्गुनी     12. उत्तरा फाल्गुनी     13. हस्त     14. चित्रा     15. स्वाती     16. विशाखा     17. अनुराधा     18. ज्येष्ठा     19. मूल     20. पूर्वाषाढ़     21. उत्तराषाढ़     23. श्रवण     23. थनिष्ठा     24. शतभिषक्     25. पूर्व भाद्रपद     26. उत्तर भाद्रपद     27. रेवती

"मास-नाम" 
प्रति मास पूर्णिमा को चन्द्र जिस नक्षत्र में रहता है, मास का वही नाम होता है। जब सूर्य प्रथम राशि (मेष) या प्रथम नक्षत्र (अश्विनी) में होता है, तो चन्द्र पूर्णिमा के दिन उसके उलटा चित्रा नक्षत्र में रहेगा। अतः प्रथम मास चैत्र। अगली पूर्णिमा को 2 + ¼ नक्षत्र आगे, विशाखा नक्षत्र में। द्वितीय मास वैशाख।

12 मासः-

1. चैत्र, 2. वैशाख, 3. ज्येष्ठ, 4. आषाढ 5. श्रावण, 6. भाद्रपद, 7. आश्विन, 8. कार्तिक, 9. मार्गशीर्ष (अग्रहायण), 10. पौष, 11. माघ, 12. फाल्गुन।

"अयन"

मार्गशीर्ष मास में सूर्य मकर रेखा से उत्तर गति आरम्भ करता है: 6 मास तक उत्तर गति उत्तरायण।
आषाढ़ से दक्षिणायन 6 मास।
दोनों अयन मिला कर वर्ष = हायन।
अग्रहायन के आरम्भ का मास (मृगशिरा) अग्रहायणा।


"चान्द्र तिथि 
अमावास्या में सूर्य चन्द्र एक दिशा में (अमा = एक साथ, वास्य = वास)।
(चन्द्र-सूर्य) अन्तर 0 अंशा

पूर्णिमा को चन्द्र सूर्य के विपरीत = 180 अंश आगे। 

अमावास्था में चन्द्र का अन्धकार भाग दीखता है। प्रकाशित भाग सूर्य की तरफ।

पूर्णिमा में पूर्ण प्रकाशित भाग दीखता है। 
अमावास्या से पूर्णिमा तक प्रकाशित भाग बढ़ता है- शुक्ल पक्ष। 
पूर्णिमा से अमावास्या तक अन्धकार भाग बढ़ता है- कृष्ण पक्ष।

पक्ष = पार्श्व, चिड़िया का पंख। पक्ष होने से पक्षी।

1 पक्ष = 14 + 3/4 = प्रायः 15 दिन 15 तिथि। 15 तिथि में चन्द्र-सूर्य अन्तर 0 से 180 अंश बढ़ता है।

अतः तिथि संख्या (चन्द्र सूर्य) / 15

180/15 = 12 अंश पर तिथि बदलती है।

तिथियों के नामः - 
1. प्रतिपदा
उसके बाद गिनती सेः- 2. द्वितीया, 3. तृतीया, 4. चतुर्थी, 5. पञ्जामी, 6. षष्ठी, 7. सप्तमी, 8. अष्टमी, 9. नवमी, 10. दशमी, 11. एकादशी, 12. द्वादशी, 13. त्रयोदशी, 14. चतुर्दशी शुक्ल पक्ष की अन्तिम तिथि 15. पूर्णिमा।

उसके बाद 16, 17.... 30 तक तिथि होनी चाहिये। 

लेकिन कृष्ण पक्ष में भी १ से गिनते हैं- 1. प्रतिपदा, 2. द्वितीया, 3. तृतीया, 4. चतुर्थी, 5. पञ्जामी, 6. षष्ठी, 7. सप्तमी, 8. अष्टमी, 9. नवमी, 10. दशमी, 11. एकादशी, 12. द्वादशी, 13. त्रयोदशी, 14. चतुर्दशी कृष्ण पक्ष की अन्तिम तिथि 30. अमावस्या।

अन्तिम तिथि को 30 अमावास्या लिखते हैं। 

शुक्ल प्रतिपदा (चन्द्र- सूर्य) 1 से 12 अंश तक।
द्वितीया 12 से 24 अंश तक।
तृतीया 24 से 36 अंश तक 
............
पूर्णिमा - 168 से 180 अंश तक।

कृष्ण पक्ष की 
प्रतिपदा 180 से 192 अंश तक 
द्वितीया 192 से 204 अंश तक।
तृतीया 204 से 216 अंश तक 
............
अमावास्या 348 से 360 अंश तक।

"चान्द्र और सौर वर्ष 
चान्द्र मास गणित अनुसार शुक्ल पक्ष से शुरु होता है। तिथि 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15 
उसके बाद कृष्ण पक्ष की 15 तिधि- 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14, 30

सौर वर्ष में 12 मास
1. मेष (0 से 30 अंश तक), 2. वृष, 3. मिथुन, 4. कर्क, 5. सिंह, 6. कन्या, 7. तुला, 8. वृश्चिक, 9. धनु, 10. मकर, 11. कुम्भ, 12. मीन

सूर्य गति समान नहीं होने से सौर मास में 29 से 31 दिन होते हैं। जिस चान्द्र मास में सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है (0- अंश, मेष-संक्रान्ति), वह चैत्र मास है। इस मास की पूर्णिमा को चन्द्र चित्रा नक्षत्र में रहेगा। इसी क्रम में,
2. वृष संक्रान्ति वैशाख मास
3. मिथुन संक्रान्ति ज्येष्ठ मास
4. कर्क संक्रान्ति आषाढ़ मास
5. सिंह संक्रान्ति आवण मास
6. कन्या भाद्रपद मास
7. तुला आश्विन मास (कुमार या क्वार मास)
8. वृश्चिक कार्तिक मास
9. धनु- मार्गशीर्ष मास (अग्रहायण)
10. मकर पौष मास
11. कुम्भ - माघ मास
12. मीन - फाल्गुन मास (फल्गु खाली बाल्टी, दोल पूर्णिमा)

औसत सौर मास 30.5 दिन, औसत चान्द्र मास 29.5 दिन।

30 या 31 चान्द्र मास के बाद किसी चान्द्र मास में सूर्य संकान्ति नहीं होती है। उसके ठीक पहले और पीछे एक एक संक्रान्तिः बाद की संक्रान्ति के अनुसार मास का नाम। उसी नाम का अधिक मास जिसमें संक्रान्ति नहीं होती।

चन्द्र और सूर्य की इस परस्यर गति नीचे दर्शाये गए चित्र में देखिये।
"दिन"
1. सौर दिनः किसी स्थान के सूर्योदय से आगामी सूर्योदय तक। यह सामाजिक व्यवहार का दिन है।
2. छाया व्यवहार (अक्षांश, समय के लिये) के लिये मध्याह्न से दिन आरम्भ। पितर कार्य के लिये भी।
3. वैधः आकाश में ग्रह स्थिति देखने के लिये सूर्यास्त से दिन। प्रदोष, शिवरात्रि के लिये दिन का आरम्भ। 
4. गणना के लिये मध्य रात्रि से दिन। किसी देशान्तर रेखा पर सभी स्थानों पर एक ही समय मध्यरात्रि (या मध्याह्न भी) होगा।

इनका क्रम हैः- सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।

यह भी सूर्योदय से होते हैं। गति बढ़ने के क्रम में ग्रह है- शनि (सबसे धीमा होने के कारण शनैश्चर), गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र। पृथ्वी के अक्ष भ्रमण के कारण २४ घण्टे (४ मिनट कम) में पूर्व क्षितिज पर १२ राशियों का क्रम से उदय होता है। आउसत २ घण्टे में एक राशि का उदय। हर राशि का दिन के दो भाग अहःरात्र अहोरात्र जैसे दो भाग होंगे। अहोरात्र के बीच के अक्षरों के अनुसार इसे होरा कहते हैं। हर दिन २४ होरा का उदय होता है।

होरा = Hour। चन्द्र के दिन सोमवार को सूर्योदय के बाद पहली होरा चन्द्र की होगी। उसके बाद ७-७ ग्रहों के ३ चक्र होने पर २१ होरा पूर्ण होगी। फिर २२वीं होरा चन्द्र की, २३ वीं शनि, २४वीं- गुरु की होगी। २४ होरा में दिन पूरा हो जायेगा। अगले दिन की पहली होरा (चन्द्र से २५वीं) मंगल की होगी। अतः सोमवार के बाद मंगल वार होगा। अगले दिन पहली होरा मंगल से गिनने पर ४भी बुध की होगी। इसी प्रकार क्रम से दिनों की होरा शुक्र, शनि, सूर्य से आरम्भ होगी। सूर्य-चन्द्र-मंगल बुध गुरु-शुक्र-शनि यह क्रम सृष्टि के आरम्भ से चला आ रहा है। दिनों की गणना की जांच करने के लिये देखते हैं कि बार ठीक आ रहा है कि नहीं।

दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिये वार का महत्त्व है। हर वार के कुछ उपयोगी या वर्जित काम हैं। इसका इतिहास में कोई महत्त्व नहीं है अतः इसका उल्लेख नहीं होता है।

"तिथि"

चन्द्र जब सूर्य से १२ अंश जागे निकलता है तो एक तिथि होती है।

तिथि संख्या = (चन्द्र सूर्य) / १२ अंश

० से १ तक अर्थात् १ अंश से १२ अंश तक पहली तिथि प्रतिपदा। सूर्य से ११ अंश के भीतर चन्द्र रहने पर वह नहीं दीखता है। शुक्ल पक्ष की द्वितीया (१२-२४ अंश) से चन्द्र दीखता है। गणना में तिथि संख्या १५ से अधिक आने पर कृष्ण पक्ष शुरु होता है और लिथि से शुक्ल पक्ष की १५ तिथि घटाते हैं।

उदाहरण- (चन्द्र सूर्य) = २०७ अंश

१२ से भाग देने पर -१७.२५ अर्थात् १८वी तिथि। १५ घटाने पर यह कृष्ण तृतीया हुआ। गणित के अनुसार पूरे विश्व में तिथि का आरम्भ एक ही साथ होता है। व्यवहार के लिये किसी स्थान पर सूर्योदय के समय जो तिथि होती है, वही तिथि अगले सूर्योदय तक मानी जाती है।

उदाहरण, भारतीय समय से यदि ५३० से अगले दिन ५३० तक ११ तिथि है। जिस स्थान पर ६ बजे सूर्योदय होगा वहां सूर्योदय समय ११ तिथि चल रही है, अतः वहां ११ तिथि होगी। जिस
श स्थान पर सूर्योदय ५ बजे है वहां १० तिथि चल रही है। अतः अगले सूर्योदय तक १० तिथि ही कही जायेगी यद्यपि सूर्योदय के ३० मिनट बाद ११ तिथि शुरु हो गयी थी।

१ दिन में २४ घण्टा = ६० दण्ड होते हैं। १ तिथि ५० से ६९ दण्ड तक होती है। अतः कभी कभी किसी तिथि में किसी स्थान पर कोई सूर्योदय नहीं होता। जैसे किसी स्थान पर ६ बजे सूर्योदय हो रहा है और ११ तिथि ६१५ से आगामी दिन ५३० तक है, तो वह दिन १० तिथि तथा अगले दिन १२ तिथि होगी। १० तिथि नहीं होगी अर्थात् क्षय तिथि होगी। तिथि में वृद्धि भी होती है अर्थात् १ तिथि में दो बार सूर्योदय होता है। पहले दिन तिथि परिवर्तन नहीं होता है, उस दिन तिधि वृद्धि (अशुद्ध तिथि) तथा अगले दिन शुद्ध तिथि होगी।

नक्षत्र 

प्राचीन काल में नक्षत्र से भी तिथि कही जाती थी। चन्द्र सूर्योदय के समय जिस नक्षत्र में रहेगा वह उस दिन का नक्षत्र कहा जायेगा। राशि के साथ समन्वय के लिये नक्षत्रों के ४-४ भाग (पाद) किये गये हैं। २०x४ में ९-९ पाद होंगे। हर पाद को १०८ नक्षत्र पाद होने से हर राशि अक्षर से सूचित करते हैं। जन्म के समय जिस नक्षत्र पाद में चन्द्र रहता है, उस अक्षर से राशिनाम होता है।

चन्द्र २७.२ दिन में पृथ्वी की परिक्रमा करता है। अतः २८ नक्षत्र की भी एक पद्धति थी। २८वां नक्षत्र अभिजित् (श्रवण के पहले) का मान चन्द्र की ०.२ दिन की गति के बराबर है। ब्रह्मा के काल में यह ध्रुव-तारा था, अर्थात् पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की दिशा में। प्रायः १५८०० ईसा पूर्व में उत्तरी ध्रुव की दिशा अभिजित् से बहुत दूर हो गयी। तब कार्त्तिकेय ने धनिष्ठा से वर्ष का आरम्भ किया। किन्तु अभिजित् स्वतन्त्र नक्षत्र के रूप में माना गया जिसके स्वामी ब्रह्मा है। फल, मुहूर्त आदि के लिये अभिजित्स हित २८ नक्षत्र माने जाते हैं। चन्द्र की मध्य गति (७९०/३५/५२ कला) को सूक्ष्म नक्षत्र भोग कहते हैं। इसका डेढ़ गुणा मान इन ६ नक्षत्रों का है- रोहिणी, अनुराधा, पुनर्वसु और ३ उत्तरा (उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर-भाद्रपद, अर्थात् ४, १६, ७, १२, २१, २६ नक्षत्र)। भरणी (२), आर्द्रा (६), अश्लेषा (१), स्वाती (१५), ज्येष्ठा (१८), शतभिषक् (२४)-इन ६ नक्षत्रों का मान आधा है। शेष १५ नक्षत्र चन्द्र की मध्यम गति के बराबर हैं। इन २७ नक्षत्रों का कुल भोग (२१३४५/४१/२५) वृत्त की कलाओं (२१६००) से घटाने पर शेष (२५४/१८/३५) २८ वें अभिजित् नक्षत्र का भोग आता है जो उत्तराषाढ़ (२१) तथा श्रवण (२२) नक्षत्रों के बीच आता है।

"करण
करण तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। जैसे एक दिन को दो भागों में बांटकर हम दिन-रात्रि कहते हैं। करण (चन्द्र सूर्य) / ६ अंश चान्द्र मास में ३० तिथि के ६० करण होंगे। • चल करण हैं, जो ७ वारों की तरह कम से आते रहते हैं- बव (सिंह), बालव (बालक), कौलव (भालू), तैतिल, गर, वणिज, विष्टि (भद्रा)।

शुक्ल प्रतिपदा के द्वितीय भाग से चल करण शुरु होते हैं। ८ बार इनके चक्र के बाद ५६ करण होते हैं। ४ करण बचते हैं जो स्थिर करण हैं- कृष्ण १४. दूसरा भाग- शकुनि, अमावास्या- चतुष्यद, नाग। शुक्ल प्रतिपदा पूर्व भाग- किंस्तुघ्न।

योग 

योगः सूर्य चन्द्र का योग परिक्रमा (३६० अंश) में २७ योग बनाते हैं।
1. विष्कम्भ, 2. प्रीति, 3. आयुष्मान्  4. सौभाग्य 5. शोभन 6. अतिगण्ड 7. सुकर्मा 8. धृति 9. शूल10. गाह 11. वृद्धि  12. ध्रुव 13. व्याघात 14. हर्षण 15. वज 16. सिद्धि 17, व्यतीपात 18. वरीयान्  19. परिष 20, शिव 21. सिद्ध 22. साध्य 23. शुभ 24. शुकल 25. ब्रह्म 26. ऐन्द्र 27. वैधृति

पृथ्वी अक्ष की परिक्रमा -२६,००० वर्ष

बान झुकाव २२.५ से २६ अंशका-४१,००० वर्ष

इवायु काल (८६०० ई. में २५६ का

मिथिला नैमिषारण्य कर्क रेखा अभी घट रही है-२२.५ अंश


छाया (२-३) के बीच चन्द्र-ग्रहण 
उपच्छाया (१-२, ३-४) उपच्छाया-चन्द्र मलिन-रंग

पूर्ण ग्रहण-पृथ्वी सतह छाया शंकु के भीतर वलय ग्रहण (सूर्य का बाहरी वलय दृश्य) पृथ्वी छाया शंकु के बाहर चन्द्र ग्रहण में पृथ्वी छाया से चन्द्र छिप जाता है-हर स्थान पर एक समय सूर्य ग्रहण में चन्द्र छाया से पृथ्वी का एअ छोटा स्थान छिपता है, हर स्थान पर अलग समय ग्रहण


"अयन चक्र तथा युग" 
ज्योतिष का युग ४३,२००० वर्ष का है। जिसमें शनि तक के ग्रह पूरा चक्र लगाते हैं। ऐतिहासिक युग २४,००० वर्ष का है जो जल प्रलय का चक्र है। 

पृथ्ची के उत्तरी भाग में अधिक स्थल भाग है। इसमें अधिक गर्मी २ कारण से हैः- 
०१. पृथ्वी सूर्य के निकट हो मन्द नीच पर 
०२. उत्तरी ध्रुव सूर्य की तरफ झुका हो उत्तरायण का अन्त। 

दोनों जब एक साथ हों तो जल प्रलय होगा। दोनों उलटी दिशा में हों तो हिम युग होगा, ध्रुव प्रदेश की बर्फ दक्षिण तक फैल जायेगी। मन्दोच्य (या नीच) तथा अक्ष दिसा का चक्र विपरीत दिशा में हैं- लाख तथा २६,००० वर्ष में। दोनों मिला कर २१,६०० वर्ष का हिम चक आधुनिक सिद्धान्त के अनुसार है- १/१००,००० + १/२६,००० = १/२१,६०० किन्तु भारतीय सिद्धान्त में मन्दोच्च का दीर्घकालिक चक्र ३१२,००० वर्ष का लिया है। २४००० वर्ष में प्रथम १२,००० वर्ष अवसर्पिणी, उसके बाद १२,००० वर्ष उत्सर्पिणी। १/२६,००० + १/३१२,००० = १/२४,०००

१२,००० वर्ष में कलि, द्वापर, प्रेता, सत्य युग १,२,३,४ अनुपात में हैं- १२००, २४,००, ३६,००, ४८,०० वर्ष के। अवसर्पिणी में सत्य युग से कलि तक, उसके बाद उत्सर्पिणी में कलिसे सत्य युग तक। अवसर्पिणी त्रेता में जल प्रलय, उत्सर्पिणी त्रेता में हिम युग होता है। वास्तविक हिमयुगों के हिसाब से यह अधिक ठीक है।

२४००० वर्ष काल को ब्रह्माब्द या अपनाब्द कहा है, अभी तीसरा अयनाब्द है। तीसरा अयनाब्द में अवसर्पिणी कलि ३९०२ ई.पू. से है। उससे १०,८०० वर्ष पूर्व वैवस्वत मनु से सत्य युग, त्रेता, द्वापर बीते। वैवस्वत मनु (१३९०२ ई.पू.) से २४००० वर्ष पूर्व ३७९०२ ई.पू. से द्वितीय अयनाब्द। द्वितीय अपनाब्द के त्रेता में २९१०२ ई.पू. स्वायम्भुव मनु ब्रह्मा थे। उनके परिवार में ध्रुव काल में ध्रुव तारा की दिशा में उत्तरी ध्रुव था (२७,३०६ ई.पू.), कस्यप (१७५०० ई.पू.), पृथु (१७१०० ई.पू.), कार्तिकय १५८०० ई.पू. में थे। वैवस्वत मनु के बाद वैवस्वत यम कल में जल प्रलय (१०,०००-९५०० ई.पू.) हुआ। उसके बाद ऋषभ देव ९५०० ई.पू.। इक्ष्वाकु (८५७६ ई.पू.) से सूर्यवंश। परशुराम के देहान्त के बाद ६१७७ ई. पू. से कलम्ब सम्वत् (केरल का कोल्लम)। कलि (३१०२ ई.पू.) के ३०४४ वर्ष बाद विक्रमादित्य का विक्रम सम्वत्। कलियुग आरम्भ में शुक्ल पक्ष से मास आरम्भ। २६००० वर्ष के अयन चक्र के कारण २१०० वर्ष में ऋतु १ मास पीछे। विक्रम सम्वत् आरम्भ में १.५ मास पीछे खिसकने के कारण मास आरम्भ कृष्ण पक्ष से।


"अहर्गण माप"
अहर्गण तक पृथ्वी 
सौर मंडल 
सौरमंडल विष्णु के पद
आकाश गंगा
सौरमंडल के द्वीप
सौरमंडल के ग्रह
वराह = १०० से ११० योजन
पृथ्वी-सूर्य से १०८-१०९ सूर्य व्यास
यहां, योजन = सूर्य व्यास

सौर मण्डल की सीमा
विष्णु पुराण, अध्याय २/८, श्लोक २, ३, ६ सूर्य रथ ९००० योजन परिधि, त्रिज्या = १५०० योजन ईषादण्ड १८००० योजन परिधि, त्रिज्या = ३००० योजन यजुर्वेद (१/१)-ईषा = वायवस्थ ऊर्जा = सौर वायु चक्र का अक्ष (व्यास) = १५७ लाख योजन
उत्क्रम वर्ग नियम
★ मध्यम ग्रह एक काल्पनिक ग्रह है जो कक्षा वृत्त पर घड़ी की मूई की विपरीत दिशा में समान गति से चलता है। मध्य ग्रह के केन्द्र में एक छोटा वृत्त मन्द-परिधि है जिस पर स्पष्ट ग्रह विपरीत दिशा में उसी गनि मे चलता है। केवल मध्य गनि के कारण ग्रह क दिशा में रहता, पर मन्द परिधि पर की गति के कारण वह व विन्दु पर दीखता है। स्पष्ट ग्रह का स्थान या मन्दोच की दिशा में खिसक गया है, अतः कहा जाता है कि मन्दोच द्वारा ग्रह आकर्षित होते हैं।
★ सबसे दूर का विन्दु उच्च है तथा वहां ग्रह सबमे मन्द रहता है अतः यह मन्वोच्च है। इस का विपरीत विन्दु मन्द-नीच है।


भारत के मुख्य कैलेण्डर 

०१. स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ई.पू.) से ऋतु वर्ष के अनुसार- विषुव वृत्त के उत्तर और दक्षिण ३-३ पथ १२, २०, २४ अंश घर थे जिनको सूर्य १-१ मास में पार करता था। उत्तर दिशा में ६ तथा दक्षिण दिशा में भी ६ मास। (ब्रह्माण्ड पुराण १/२२ आदि)। इसे पुरानी इथिओपियन बाइबिल में इनोक की पुस्तक के अध्याय ८२ में भी लिखा गया है।

०२. ध्रुव- इनके मरने के समय २७३७६ ई.पू. में ध्रुव सम्वत्, जब उत्तरी ध्रुव पोलरिस (ध्रुव तारा) की दिशा में था। 

०३. क्रौञ्च सम्वत् - ८१०० वर्ष बाद १९२७६ ई.पू. में कौञ्च द्वीप (उत्तर अमेरिका) का प्रभुत्व था (वायु पुराण, ९९/४१९)। 

०४. कश्यप (१७५०० ई.पू.) भारत में आदित्य वर्ष- अदितिर्जातम् अदितिर्जनित्वम्-अदिति के नक्षत्र पुनर्वसु से पुराना वर्ष समाप्त, नया आरम्भ। आज भी इस समय पुरी में रथ यात्रा होती है।

०५. कार्तिकेय- १५८०० ई.पू-उत्तरी ध्रुव अभिजित् से दूर हट गया। धनिष्ठा नक्षत्र से वर्षा तथा सम्वत् का आरम्भ। अतः सम्वत्को वर्ष कहा गया। (महाभारत, वन पर्व २३०/८-१०) 

०६. वैवस्वत मनु- १३९०२ ई.पू. चैत्र मास से वर्ष आरम्भ।

वर्तमान युग व्यवस्था।

०७. वैवस्वत यम- ११,१०६ ई.पू. (कौव्य के ८१०० वर्ष बाद)। इनके बाद जल प्रलय। अवेस्ता के जम्योद।

०८. इक्ष्वाकु - १-११-८५०६ ई.पू. से। इनके पुत्र विकुक्षि को इराक में उकुसी कहा गया जिसके लेख ८४०० ई.पू. अनुमानित

०९. परशुराम ६१७० ई.पू. से कलम्ब (कोल्लम) सम्वत्।

१०. युधिष्टिर काल के ४ पञ्चाङ्ग-
(क) अभिषेक- १७-१२-३१३९ ई.पू. (इसके ५ दिन बाद उत्तरायण में भीष्म का देहान्त)
(ख) ३६ वर्ष बाद भगवान् कृष्ण के देहान्त से कलियुग १७-२-३१०२ उज्जैन मध्यरात्रि से। २ दिन २-२०-३० घंटे बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
(ग) जयाभ्युदय क्ष्मास ११ दिन बाद परीक्षित अभिषेक २२-८-३१०२ ई.पू. से।
(घ) लौकिक- ध्रुव के २४३०० वर्ष बाद युधिष्ठिर देहान्त से, कलि २५ वर्ष २००६ ई. पू से कश्मीर में (राजतरंगिणी)।

११. भटाब्द- आर्यभट-कलि ३६० २०४२ ई.पू. से।

१२. जैन युधिष्ठिर शक काशी राजा पार्श्वनाथ का सन्यास-२६३४ ई.पू. (मगध अनुव्रत-१२वां बार्हद्रथ राजा)।

१३. शिशुनाग शक शिसुनाग देहान्त १९५४ ई.पू. से (वर्मा या म्याम्मार का कौजाद शक)।

१४. नन्द शक १६३४ ई.पू. महापद्मनन्द अभिषेक से। ७९९ वर्ष बाद खारावेल अभिषेक।

१५. शुद्रक शक- ७५६ ई.पू. मालव गण आरम्भ।

१६. चाहमान शक- ६१२ ई.पू. में (बृहत् संहिता १३/३) असीरिया राजधानी निनेवे ध्वस्त।

१०. श्रीहर्ष शक- ४५६ ई.पू. मालव गण का अन्त।

१८. विक्रम सम्वत् उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य द्वारा ५० ई.पू. से।

१९. शालिवाहन शक विक्रमादित्य के पौत्र द्वारा ०८ ई. से।

२०. कलघुरि या चेदि शका २४६ ई.।

२१. बलभी भंग (३१९ ई.) गुजरात के बलभी में परवर्ती गुप्त राजाओं का अन्त।

"विदेशी कैलेण्डर

०१. इनोक- इथिओपिया की पुरानी बाइबिल के भाग ३ इनोक के अध्याय ७२-८९ में। वर्ष के ४ भाग ९१-९१ दिनों के, उसके बाद १ दिन छुट्टी। ९१ दिन में विषुव के उत्तर या दक्षिण के ३-३ मार्ग पर १-१ मास सूर्य। बाइबिल (जेनेसिस ५/२१-इनीक की आयु २६५ वर्ष)।

०२. मिस- ३०-३० दिनों के १२ मास। अन्त में ५ दिन जोड़ते थे। भारत में १२ x ३० दिनों का वत्सर, उसके बाद पाञ्यरात्र, कभी कभी बडाह। सिरियस तारा (मिस्र में घोष) के उदय से थोथ मास और वर्ष आरम्भा १४६० वर्ष के बाद र वर्ष जोडते थे।

०३. सुमेरिया चान्द्र सौर वर्ष में ३५४, ३५५, ३८३, ३८४ दिन दो प्रकार से अधिक मास की गणना।
(क) अष्टक- ८ ऋतु वर्ष २९२१.९४ दिन, ९९ चान्द्र मास (३ अधिक) = २९२३.५३ दिन।

(ख) ३८३ ई.पू, से- मेटन चक्र-१९ सौर वर्ष ६९३९.६० दिन, २३५ चान्द्र मास (७ अधिक) ६९३९.६९ दिन।

०४. यहूदी वर्ष ७/८-१०-३७६१ ई.पू. (रवि-सोम वार के बीच की मध्यरात्रि से) ११ बजे ११ मिनट २० सेकण्ड से। यहूदी वर्ष ३८३१ (७१ ई.) में यहूदी राज्य नाह।

०५. इरानी-
(क) दारा (Darius)- ५२० ई.पू. से-३६५ दिनों के १२ सौर मास। १२० वर्ष के बाद ३० दिनों का अधिक मास।
(ख) तारीख-ए-जलाली- २०७४ ई. में सैल्जुक राजा जलालुद्दीन मलिक द्वारा-३६५ दिनों के ३३ वर्षों के बाद ८ दिन अधिक।
(ग) पहलवी (तमिल का पल्लव शक्तिशाली, पहलवान)- १९२० ई. में रजा शाह पहलवी द्वारा-पुराने नामों के साथ सौर वर्ष।

०६. असीरिया में ७४० ई.पू. में नबोनासिर (लगणासुर)- इसके दमन के लिये भारत में ७५६ ई.पू. में शूद्रक की अध्यक्षता में मालव-गण।

०७. सेलुसिड ३१२ ई.पू. सुमेरियन नकल पर ग्रीक सेनापति सेल्यूकस द्वारा।

०८. जुलियन रोमन राजा जुलियस सीजर द्वारा-उत्तर यूरोप में २ मास बर्फ से ढंके रहते थे अतः बाकी ३०४ दिनों के १० मास होते थे। नुमा पोम्यियस ने ६७३ ई.पू. में २ मास जोड़ कर ३५५ दिनों का वर्ष शुरु किया। जनवरी से वर्ष का अन्त तथा आरम्भ (जानुस देवी का दोनों तरफ मुंह-जैसे अदिति का या विक्रम सम्वत् का चैत्र मास)। फरवरी के बाद २. या ३ वर्ष पर २२ या २३ दिन का अधिक मास मरसिडीनियस जोड़ते थे। ४६ ई.पू. में जुलियस सीजर ने मिस्र से सम्पर्क होने के बाद उत्तरायण से सौर वर्ष आरम्भ करने का आदेश दिया। पर लोगों ने ७ दिन बाद जब विक्रम सम्वत् गत वर्ष १० का पौष मास आरम्भ हो रहा था, उस दिन से नया वर्ष शुरु किया (१-१-४५ ई.पू.) मूल वर्ष आरण्भ तिथि को कृष्णा-माम (सबसे लम्बी रात) कहा गया जो आजकल क्रिस्मस है। प्रायः ४०० वर्ष बाद कौन्स्टैण्टाइन ने ईसा के काल्पनिक जन्म के अनुसार इसका आरम्भ ४५ वर्ष बाद से कर दिया। प्रतिवर्ष ३६५ दिन का होता था तथा ४ वर्ष में है दिन अधिक था।

०९. हिजरी वर्ष १९-३-६२२ ई. से विक्रम वर्ष ६७९ के आरम्भ के साथ हिजरी वर्ष पैगम्बर मुहम्मद द्वारा आरम्भ हुआ। अरब में पञ्चांग गणना (कलन) करने वालों को कलमा कहते थे। इसी परिवार में मुहम्मद का जन्म हुआ था। ६३२ ई. में उनके देहान्त तक ३ अधिक मास जोड़े गये। अन्तिम मास में हज के समय अधिक मास का फैसला होता था। पैगम्बर के देहान्त के बाद इसका निर्णय करने वाला कोई नहीं रहा और यह पद्धति बन्द हो गयी (अल बरूनी द्वारा प्राचीन देशों की काल गणना)। इसकी गणना ब्रह्मगुप्त के ब्राह्रा स्फुट सिद्धान्त पर आधारित थी अतः खलीफा अल-मन्सूर के समय इसका अरबी अनुवाद हुआ। ब्रह्म अल-जबर (महान), स्फुट सिद्धान्त उल-मुकाबला। इसमें पहले गणित भाग था। अतः अल-जबर-उल-मुकाबला से बीजगणित का नाम अलजेब्रा हुआ।

१०. रोगरी १०५२ ई. में ब्रिटेन में ग्रेगरी ने जुलियन कैलेण्डर में संशोधन किया। ४ दिनों में लीप वर्ष (३६६ दिनका) जारी रहा, पर शताब्दी वर्षों में केवल उन्हीं शताब्दी वर्षों में रहा जो ४०० से विभाजित हों। १ ई. से गणना में ११ दिन की अधिक गिनती होने के कारण ३ सितम्बर को १४ सितम्बर कहा गया।


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