आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है?
आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है? (उदाहरण सहित विस्तार से) 🔷 प्रस्तावना. हिंदू शास्त्रों में आत्महत्या (Self-Suicide) को महान पाप कहा गया है। यह केवल एक शारीरिक मृत्यु नहीं, बल्कि धर्म, आत्मा और पुनर्जन्म के नियमों का उल्लंघन भी माना गया है। आत्महत्या का अर्थ है—प्रकृति द्वारा तय की गई जीवन-यात्रा को बीच में छोड़ देना। यह कार्य न केवल स्वयं के लिए हानिकारक है, बल्कि समाज और सृष्टि-चक्र के लिए भी बाधक होता है। 🔶 आत्महत्या क्यों पाप है? शास्त्रों की दृष्टि से 1. जीवन ईश्वर का दिया हुआ वरदान है "शरीरं धर्मसाधनम्" – (मनुस्मृति) इसका अर्थ है – यह शरीर धर्म का साधन है। हमें यह शरीर पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है, जिससे हम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की ओर बढ़ सकें। इसे स्वेच्छा से त्याग देना ईश्वर के आदेश का अनादर है। 2. कर्म-चक्र का उल्लंघन हर प्राणी को अपने कर्मों का फल भोगना ही होता है , चाहे वह सुख हो या दुःख। आत्महत्या करके कोई व्यक्ति यह सोचता है कि वह अपने दुखों से बच जाएगा, लेकिन वास्तव में वह अपने अधूरे कर्मों को अगले जन्म मे...