चारों वेदों के विषय में

🙏 चारों वेदों के विषय में🙏 

वेदों का परिमाण तथा स्वरूप

वैदिक सनातन धर्म का मूल स्रोत वेद है। इस वैदिक सनातन धर्म से ही समस्त जगत् के अनेक सम्प्रदाय (मत-मतान्तर) हुए हैं अर्थात् वर्तमान काल में जितने सम्प्रदाय हैं वह सनातन धर्म रूपी वृक्ष की शाखाएं-प्रशाखाएँ हैं।

सनातन धर्म का लक्षण आचार्यों ने इस प्रकार किया है~~ "श्रुति स्मृति पुराणप्रतिपादित: धर्म: सनातनधर्म:"  
श्रुति-स्मृति तथा पुराण प्रतिपादित धर्म सनातन धर्म है। 

सनातन धर्म को जन्म देने वाले निर्गुण, निराकार ब्रह्म है। ब्रह्म अनादि, जन्म रहित है, सनातन धर्म भी अनादि है।

सनातन धर्म तथा वेदों का प्रादुर्भाव परमात्मा से हुआ। वेद ब्रह्म का श्वास रूप है।

ईश्वर रचित वेद में मनुष्य रचित ग्रन्थों के समान भ्रम-प्रमाद-संशय-भय-विप्रलिप्सा (लोभ) तथा यथार्थ बात न कहना आदि दोष नहीं है, अतः वेद स्वतः प्रमाण है। वेदानुसारी ही आस्तिक दर्शन, स्मृतियां, श्रौतसूत्र, धर्मसूत्र,   पुराण, रामायण, महाभारत तथा तन्त्रग्रन्थ प्रमाण माने गये है।

"अज्ञात ज्ञापकं प्रमाणं" 
अज्ञात का ज्ञान कराने वाले ग्रँथ (वेद) प्रमाण है। यथा~ "प्रमाया: करणमिति प्रमाणम्"  प्रमा का साधन प्रमाण है।

सनातन हिंदू धर्म के वेद-शास्त्र परिचय ~
सनातन हिंदू धर्म भूमंडल मे सृष्टि के आदि से आया हुआ  विख्यात धर्म है। इसके आधारभूत शास्त्रों का जानना आवश्यक है। यहाँ संक्षेप मे इस पर कुछ निरूपण किया गया है।

हिंदू धर्म का मूल स्रोत वेद 
सनातन हिंदू धर्म का मूल स्रोत वेद है। उसके बाद उपवेद , फिर वेद के अंग तथा उपांग। इनमे वेद के दो भाग है – एक मन्त्रभाग दूसरा ब्राह्मणभाग। मंत्रभाग मे संहिताए होती है और ब्राह्मणभाग मे ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक तथा उपनिषदे।

मंत्र भागात्मक वेद के चार भेद है 
(1) ऋग्वेद   (2) यजुर्वेद   (3) सामवेद  (4) अथर्ववेद 

ऋग्वेद का प्रमाण~  
इसकी इक्कीस मंत्र संहिताएं हैं। ऋग्वेद के आठ स्थान है~~  1- चर्चा 2- श्रावक 3- चर्चक 4-श्रवणीय पार 5-क्रमपार 6- क्रमचट्ट 7- क्रमजट 8- क्रमदण्ड
इसके चार परायणों की पांच शाखाएं हैं~~ शाकला, बाष्कला, अश्वलायना, शांखायना, मांडूकायना।
इनके अध्ययन, अध्याय 64 है, इसके मण्डल 10 है।
एकर्च, एक वर्ग, एकश्च नवक। दो दोवर्ग, दो-दो ऋचाएं। कुल मिलाकर 300 ऋचाएं हैं।

ऋग्वेद का स्वरूप~~ 
"ऋग्वेद पद्मपत्राक्ष: ग्रीव: , कुंचित केश: श्मश्रु:, श्वेतवर्ण:, प्रमाप पंच वितस्ति मितम्।"
अर्थात ऋग्वेद के कमल के समान नेत्र, सुंदर गर्दन, घुंघराले केश, दाढ़ी-मूंछ से युक्त श्वेतवर्ण, पांच बालिस्त लम्बा शरीर है।

ऋग्वेद का आत्रेयगोत्र, चन्द्रमा देवता, गायत्री छन्द है।








यजुर्वेद का स्वरूप~~  "पिंगाक्ष:, कृशमध्य:, स्थूलगलकपोलस्ताम्रवर्ण:, कृष्णवर्णा:, प्रादेशषट् दीर्घ:।"
यजुर्वेद के पीले नेत्र, पतली कमर, मोटा गला, तांबे के रंग के गाल, काला वर्ण, छः बालिस्त शरीर है।

यजुर्वेद का कश्यप गोत्र, इन्द्र देवता, त्रिष्टुप छन्द है।

सामवेद का स्वरूप~~ "नित्य स्त्रग्वी, सुप्रीत:, शुचि:, शुचौवासी, शमी, दांतो, चर्मी, बृह्च्छरीर:-काञ्चननयन:, नवरत्निमात्र:।"
सामवेद नित्य माला धारण किये हुए, पवित्र मुस्कान, पवित्र स्थान के निवासी, संयतेन्द्रिय, मृगचर्मधारी, बड़ा शरीर, सुनहरे नेत्र, सूर्य के समान रंग, नवरत्नि लम्बाई है।

सामवेद का भारद्वाज गोत्र, इन्द्र देवता, जगती छन्द है।

अथर्ववेद का स्वरूप ~~ "तीक्ष्ण प्रचंड कामरूपी, विश्वात्मा, विश्वकर्ता, क्षुद्रकर्मा, स्वशाखाध्यायी, प्राज्ञो, महाहनु:, नीलोत्पल वर्ण:, स्वदारसंतुष्ट:, दशरत्निमात्र:।"

अथर्ववेद तीक्ष्ण, प्रचंड, इच्छानुसार रूपधारी, विश्वात्मा, विश्वकर्ता, क्षुद्रकर्मा, अपनी शाखा का पाठ करने वाला, बुद्धिमान्, बड़ी ठोड़ी, नीलकमल के समान रंग, अपनी पत्नी में संतुष्ट, दशरत्नि लम्बाई है।




अथर्ववेद का वैखानस गोत्र, ब्रह्मा देवता, अनुष्टुप छन्द है।

🌷ऋग्वेद :वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का निर्माण हुआ । यह पद्यात्मक है । यजुर्वेद गद्यमय है और सामवेद गीतात्मक है। ऋग्वेद में मण्डल 10 हैं,1028 सूक्त हैं और 11 हज़ार मन्त्र हैं । इसमें 5 शाखायें हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन । ऋग्वेद के दशम मण्डल में औषधि सूक्त हैं। इसके प्रणेता अर्थशास्त्र ऋषि है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग निर्दिष्ट की गई है जो कि 107 स्थानों पर पायी जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने का कथानक भी उद्धृत है और औषधियों से रोगों का नाश करना भी समाविष्ट है । इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा एवं हवन द्वारा चिकित्सा का समावेश है🌷

🚩सामवेद : चार वेदों में सामवेद का नाम तीसरे क्रम में आता है। पर ऋग्वेद के एक मन्त्र में ऋग्वेद से भी पहले सामवेद का नाम आने से कुछ विद्वान वेदों को एक के बाद एक रचना न मानकर प्रत्येक का स्वतंत्र रचना मानते हैं। सामवेद में गेय छंदों की अधिकता है जिनका गान यज्ञों के समय होता था। 1824 मन्त्रों कें इस वेद में 75 मन्त्रों को छोड़कर शेष सब मन्त्र ऋग्वेद से ही संकलित हैं। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें सविता, अग्नि और इन्द्र देवताओं का प्राधान्य है। इसमें यज्ञ में गाने के लिये संगीतमय मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः गन्धर्व लोगो के लिये होता है । इसमें मुख्य 3 शाखायें हैं, 75 ऋचायें हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है ।🌷

💦यजुर्वेद : इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिये गद्य मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः क्षत्रियो के लिये होता है । यजुर्वेद के दो भाग हैं -
1.कृष्ण : वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है । कृष्ण की चार शाखायें है।
2.शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है । शुक्ल की दो शाखायें हैं । इसमें 40 अध्याय हैं । यजुर्वेद के एक मन्त्र में ‘ब्रीहिधान्यों’ का वर्णन प्राप्त होता है । इसके अलावा, दिव्य वैद्य एवं कृषि विज्ञान का भी विषय समाहित है ।💦

🌍अथर्ववेद : इसमें जादू, चमत्कार, आरोग्य, यज्ञ के लिये मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः व्यापारियों के लिये होता है । इसमें 20 काण्ड हैं । अथर्ववेद में आठ खण्ड आते हैं जिनमें भेषज वेद एवं धातु वेद ये दो नाम स्पष्ट प्राप्त हैं।.🌍



इन चारो की 1131 संहिताए होती है। इनमे ऋग्वेद की 21 संहिताए होती है , जिनमे आजकल “बाष्कल” और “शाकल” ये दो संहिताए मिलती है।

“बाष्कल” मे अष्टक, आध्यायिक क्रम है और शाकल मे मण्डल, अनुवाक आदि। शेष संहिताए लुप्त है।



यजुर्वेद की 181 संहिताए है। यजुर्वेद के दो भेद माने जाते है – (1) शुक्ल और (2) कृष्ण।

इनमे शुक्ल यजुर्वेद की 15 संहिताए है, उनमे केवल दो संहिताए मिलती है  - 
(1) वाजसनेयी  और
(2) काण्व, शेष लुप्त है।

कृष्ण यजुर्वेद कि 86 संहिताए होती है। इनमे से चार मिली है – (1) तैत्तिरीय  संहिता (2) मैत्रायणी (3) काठक (4) कठकपिष्ठल, शेष लुप्त है।



सामवेद की 1000 संहिताए है, उनमे आजकल 2 मिली है – (1) कौथुम और (2) जैमिनी कुछ भाग  राणायनीय संहिता का भी मिलता है।



अथर्ववेद की 9  संहिताए है,  इनमे आजतक दो मिली है – (1) शौनक और (2) पैप्पलाद  यह सब मंत्रभाग है।

मंत्रभाग की जितनी संहिताए होती है , ब्राह्मण भाग भी उतना ही होता है , क्योकि शब्द और अर्थ का सम्बन्ध हुआ करता है। अतः आरण्यक और उपनिषदे भी उतनी ही होती है। श्रौतसूत्र भी उतने ही तथा गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और प्रातिशाख्य भी उतने ही होते है।

ब्राह्मण भाग मे ऋग्वेद के “ऐतरेय“ और कौशीतक  यह दो ब्राह्मण मिलते है। “ऐतरेयोपनिषद” आदि 10 उपनिषदे मिलती है। इनमे गवेशणीय है की किस संहिता का कौन सा ब्राम्हण है। ऐतरेय और कौशीतक दो आख्यक मिलते है।

आश्वलायन और शान्ख्यान दो यह श्रौतसूत्र तथा इसी नाम के दो गृह्यसूत्र है। इसका ऋक्प्रातिशाख्य  भी होता है। यजुर्वेद मे शुक्ल यजुर्वेद के माध्यन्दिन “शतपथ ब्राह्मण”  और “कण्व शतपथ” यह दो ब्राह्मण मिलते है।

कण्वसंहिता का बृहदारण्यक यह आरण्यक मिलता है। कात्यायन नामक श्रौतसूत्र और पारस्कर गृह्यसूत्र मिलता है। शुक्लयजुः प्रातिशाख्य तथ ईश, बृहदारण्यक, जाबल, मुक्तिका आदि उपनिशदे मिलती है।

कृष्ण्यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण तथा आरण्यक मिलता है। सत्याषाढ, हिरण्यकेशी, बौधायन आदि सात श्रौतसूत्र तथा आपस्तम्भ, मानव आदि सात गृह्यसूत्र और बोधायन, आपस्तम्ब ये दो धर्मसूत्र मिलते है। मनुस्मृति धर्मशास्त्र मिलता है। और तैत्तिरीय प्रातिशाख्य भी, कठ, तैत्तिरीय, श्वेताशवर आदि 32 उपनिषदे मिलती है।



सामवेद के ताण्दय, षड्विन्श, मन्त्र-ब्राह्मण आदि 9 ब्राह्मण है। आरण्यक पृथक नही मिलता। केनोपनिषद, छान्दोग्य आदि 16 उपनिशदे है। द्राह्ययण, लट्यायन, मशकसूत्र आदि 3 श्रौतसूत्र तथा गोभिल, खादिर और जैमिनीय यह ३ गृह्यसूत्र है। धर्मसूत्र नही मिलते है। सामप्रातिशाख्य मिलता है।


अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण मिलता है। यह पैप्पलाद संहिता का है। अन्य लुप्त है । आरण्यक नही मिलता। प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य आदि 31 उपनिशदे है। वैखानस, एवं वाराह गृह्यसूत्र मिलते है। धर्मसूत्र नही मिलता। अथर्व प्रातिशाख्य मिलता है।
उपवेद और अंग



जैसे वेद 4 प्रकार का होता है, वैसे उपवेद भी - (1) आयुर्वेद (2)धनुर्वेद (3) गान्धर्ववेद (4)अर्थवेद

आयुर्वेद के सम्बन्ध अथर्ववेद से , गान्धर्ववेद का सामवेद से , धनुर्वेद का यजुर्वेद से और अर्थवेद का  ऋग्वेद से होता है । आयुर्वेदादि की भी बहुत सी संहिताये है , जैसेः सुश्रुत, चरक, भेल, काश्यप आदि।

वेद के अंग छः होते है - (1) शिक्षा (2) कल्प (3) व्याकरण (4)निरुक्त (5) छन्द (6) ज्योतिष।

इनमे ऋग्वेद की पाणिनिशिक्षा, कृष्ण यजुर्वेद कि व्यासशिक्षा, शुक्लयजुर्वेद कि याज्ञवल्क्य आदि 25 शिक्षाये है। सामवेद की (1) गौतमी (2) लोमशी और(3) नारदी शिक्षाये है। 

अथर्ववेद की माण्डुकी शिक्षा है । गृह्यसूत्र, श्रौतसूत्र आदि कल्प होते है ।उनका निरूपण पहले हो चुका है। पृथक कल्प भी मिलते है। 

(1) नक्षत्र कल्प (2) संहिताकल्प (3) आंगिरसकल्प (4) शान्तिकल्प (5) वैतानकल्प आदि।

कल्प मे वेदमंत्रो का विनियोग मिलता है। व्याकरण तथा प्रातिशाख्य भिन्न भिन्न वेदों के भिन्न भिन्न हुआ करते थे, पाणिनि का व्याकरण यजुर्वेद से संबद्ध प्रतीत होता है। इस प्रकार शाकल्य आदि  से भी बहुत से व्याकरण मिलते थे। इसी प्रकार निरुक्त भी भिन्न भिन्न संहिताओ के भिन्न भिन्न थे।
यास्क का निरुक्त ऋगवेद की वर्तमान  से प्रचलित शाकल संहिता  का नहीं बल्कि अन्य संहिता का है , निरुक्त मे व्याख्यात ऋकमंत्रो का वर्तमान ऋग्वेदसंहिता से पूरा मेल नहीं दिखता, शाकपूणी आदि भी निरुक्त थे जिनका नाम इस निरुक्त मे आता है।

छंद शास्त्र भी भिन्न भिन्न हो सकते है।  पिंगलादिमुनिप्रणीत छंदोग्रंथ कुछ मिलते भी है। उपनिदानसूत्र नामक सामवेद का छंदोग्रंथ उपलब्ध है। ज्योतिष के भी भृगुसंहिता, बृहत्संहिता, सूर्यसिद्धान्त, सिद्धान्तशिरोमणि आदि मिलते है, पर उनमे किसका किस वेदसंहिता से सम्बन्ध है ये पता नहीं लगता यह वेद के अंग है।

वेद के उपांग चार है – (1) पुराण (2) न्याय (3) मीमांसा  (4) धर्मशास्त्र 

पुराण से पुराण , उपपुराण, औपपुरण, तंत्रशास्त्र , रामायण और महाभारत यह इतिहास गृहीत होते है। न्याय शब्द से न्याय, वैशेषिक , सांख्य, योग ये दर्शन गृहीत होते है।
मीमांसा से पूर्वमीमांसा (मीमांसादर्शन ), उनमे भी कर्ममीमांसा तथा दैवतमीमांसा  और उत्तरमीमांसा (वेदांतदर्शन ) यह न्याय आदि छः दर्शन गृहीत होते है। धर्मशास्त्र से धर्मसूत्र तथा स्मृतियाँ गृहीत होती है।

इनमे प्रथम उपांग पुराण 18 होते है। (1) ब्रह्म (2) पद्म (3) विष्णु (4) शिव या वायु (5) लिंग (6) गरुड़ (7) नारद (8) भागवत (9) अग्नि (10) स्कन्द (11) भविष्य (12) ब्रह्मवैवर्त (13) मार्कण्डेय (14) वामन (15) वाराह (16) मत्स्य (17) कूर्म (18) ब्रह्माण्ड 

वेद के उपांग पुराणों मे वेद के कठिन  विषय (1) रामधिभाषा (2) परकीया व (3) लौकिकी  भाषा एवं  गाथा अदि से बहुत सरल कर दिए गए है।

पुराण ज्ञान अनादि है , श्री वेदव्यास उनके संपादक एवं परिष्कारक है। रचना उनकी पौरुषेय है। पुराणों मे वेद “गागर मे सागर”  की तरह समाये हुए है, उनमे वेद का सम्पूर्ण तत्व आ गया है।

उपपुराण भी 18 होते है – (1) आदि-पुराण (2) नरसिंह  पुराण (3)स्कन्द पुराण (4) शिवधर्म पुराण (5)दुर्वासा पुराण (6) नारदीय पुराण (7) कपिल पुराण (8) वामन पुराण (9) महेश्वर पुराण (10) औशनस पुराण (11) ब्रह्माण्ड पुराण (12) वरुण पुराण (13) कालिका पुराण (14) साम्ब पुराण (15) सौर पुराण (16) पाराशर पुराण (17) मारीच पुराण (18) भास्कर पुराण।

औपपुराण भी 18 होते है – (1) सनत्कुमार पुराण (2) बृहन्नारदीय पुराण (3) आदित्य पुराण (4) मानव पुराण (5) नन्दिकेश्वर पुराण (6) कौर्म पुराण (7) भागवत (8) वसिष्ठ (9) भार्गव (10) मुद्गल (11) कल्कि पुराण (12) देवी पुराण (13) महाभागवत (14) बृहद्धर्म (15) परानंद (16) पशुपति (17) वाही (18) हरिवंश।

पुराणों मे तन्त्रग्रंथो का भी समावेश हो जाता है। तंत्रशास्त्र मे भी  वेदों के विषय विभिन्न अधिकारियो के लिए बतलाये गए है। इनमे आचार, उपासना, ज्ञान , मन्त्र, हठ, ले आदि योग, आयुर्वेद के वाजीकरण  आदि के गुप्त योग, भूतविद्या, रसायन आदि सभी विद्याये और ज्योतिष के रहस्य स्पष्ट किये गए है।
तन्त्रो के परोक्षरूप से कहे गए कई तत्व अतिशयित गूढ़ है। परिभाषाये, मेरुमंत्र, महानिर्वाणतंत्र , आगमसार , हठयोग – प्रदीपिका  आदि से जाने बिना वे अश्लील प्रतीत होते है। किन्तु उनकी परिभाषा  जानने के बाद अत्यंत आनंद आता है। 

दत्तात्रे, कुलार्णव , कालीतंत्र आदि बहुत से तन्त्रग्रंथ होते है।
वेद के उपांगो मे दूसरा भाग इतिहास है। इनमे मुख्यतः रामायण, महाभारत लिए जाते है। इनमे रामायण आदिकवि वाल्मीकि की आदिम मधुर रचना है। इसमे श्री राम अवतार का वर्णन है। इसकी पद्य संख्या 26 हज़ार है। दूसरा है महाभारत ये एक लाख पद्यो का है। इसमे 18 पर्व है। इसमे हिंदू धर्म के सभी विषय इतिहास द्वारा व्याख्यात कर दिए गए है।

वेद का तीसरा उपांग न्याय - मीमांसा होता है। इसमे 6 दर्शन आते है, यह हम पहले बता चुके है  इनमे (1) सांख्य दर्शन श्री कपिल मुनि  से प्रणीत है। इसमे प्रकृति – पुरुष का वर्णन है।
(2) योग दर्शन – इसके कर्ता श्री पतंजलि मुनि है। इसपर व्यास भाष्य है। इसमे योग की ग्रंथिया  सुलझाई गई है।
(3) वैशेषिक दर्शन – इसके प्रणेता श्री कणाद मुनि है ; प्रशस्तपाद का भाष्य है। इसमे संसार को 6 भागो मे विभक्त करके उसका विवरण किया गया है।
(4) न्याय दर्शन – उसमे 16 पदार्थो का तत्वज्ञान विषय है। गौतम मुनि प्रणेता है। श्री वात्स्यायन मुनि का इस पर भाष्य है।
(5) मीमांसा दर्शन के श्री जैमिनी जी कर्ता है। वैदिक कर्मकांड  की मीमांसा इसका विषय है। इस पर श्री शंकराचार्य का भाष्य है।

(6) वेदांत दर्शन – इसके कर्ता श्री वेदव्यास है, इसमे जीव – ब्रह्म की अद्वैतता पर विचार किया गया है। इस पर श्री शंकराचार्य , स्वामी रामानुजाचार्य, श्री माध्वाचार्य, श्री वल्लभाचार्य  आदि के भाष्य मिलते है।

अंतिम वेद का उपांग है धर्मशास्त्र इसमे धर्मसूत्र तथा स्मृतिया अंतर्भूत होती है। इनमे (1) गौतम (2) वसिष्ठ (3) आपस्तम्ब (4) बोधायन आदि धर्मसूत्र मिलते है। स्मृतियाँ भी बहुत होती है, जिनकी वेद्संहिताये है, उतने ही श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा स्मृतियाँ होती है। धर्म के सूत्रण (संक्षेप) का नाम धर्मसूत्र है, वेदार्थ के स्मरण का नाम स्मृति होता है।

इनमे (1) मनुस्मृति (2) वृद्धमनु (3) आंगिर: स्मृति (4) अत्रि  (5) आपस्तम्ब (6) औशनस  (7) कात्यायन (8) गोभिल (प्रजापति) (9) यम (10) बृहद्थम  (11) लघुविष्णु (12) वृहद्विष्णु (13) नारद (14) शातातप (15) हारीत (16) वृद्धहारीत (17) लघुआश्वलायन (18) शंख  (19) लिखित (20) शंख – लिखित (24) याज्ञवल्क्य (22) व्यास (23) संवर्त (24) अत्रिसंहिता (25) दक्षस्मृति (26) देवल (27) बृहस्पति (28) पाराशर (29) बृहत्पराशर (30) कश्यपस्मृति (31) गौतम स्मृति (32) वृद्धगौतम (33) वसिष्ठस्मृति (34) पुलत्स्य (35) योगिरुज्ञवल्क्य (39) व्याघ्रपाद (37) बोधायन (38) कपिल (39) विश्वामित्र (40) शाण्डिल्य (41) कण्व  (42) दाल्भ्य  (43) भारद्वाज (44) मार्कण्डेय (45) लौगाक्शी आदि 60 स्मृतियाँ है।

स्मृतो मे आचार, संस्कार , वर्णधर्म, वर्णसंकर धर्म , स्त्रीत्वधर्म, पुरुषधर्म, राजधर्म, प्रयश्चिन्तादि बहुत विषय आये है। न्यायदर्शन के भाष्यकार  श्री वात्स्यायन मुनि ने लिखा है – “की यदि  धर्मशास्त्र  न हो, तो लोकव्यवहार का उच्छेद हो जाय” यह ठीक है। विधिनिशेधा  सब स्मृतियों से ज्ञात होते है।
वेद, स्मृति एवं पुराण के विरोध मे वेद अधिक माननीय है।
पुराण प्रधानता से लोकवृत्त का प्रतिपादन करते है, लोकव्यवहार की व्यवस्थापना उनका प्रधान विषय नहीं लोकव्यवहार की व्यवस्थापना धर्मशास्त्र का मुख्य विषय है।

इस प्रकार यह सारा साहित्य मिलकर हिंदू धर्म का आधार बनता है।
          यतो धर्मस्ततो जय



य: एषां वेदानां नाम, रूप, गोत्र:, प्रमाण,छन्दो, देवता, वर्णादीनि वर्णयति, स सर्व विद्यो भवति, जातिस्मरो जायते, जन्मजन्मानि वेद पारगो भवति, अव्रतीव्रतीभवति, अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति य इदं चरणव्यूहं गर्भिणी शृणुयात् स पुत्रान् लभते, इदंश्राद्ध पठेत् स अक्षय श्राद्धं पितृणां समर्पयति , य: इदं पठेत् स पंक्तिपावनो भवति। य इदं पर्व पर्वषु पठेत् स विधूतपाप्मा भवति ! ब्रह्मभूयाय गच्छति।

【श्रीमद्भागवत पुराण के प्रथम श्लोक में तर्कशास्त्र के पक्ष में श्री वंशीधर जी के व्याख्या के आधार पर】

चतुर्वेद = वेद चार हैं ऋग्वेद-यजुर्वेद-सामवेद-अथर्ववेद। प्रत्येक वेद के चार भाग हैं।

पहला मंत्र भाग जिसे संहिता भी कहते हैं। दूसरा ब्राह्मण, तीसरा आरण्यक और चौथा उपनिषद् ।

महाभाष्यकार पतञ्जलि ने ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1000 , अथर्ववेद की  9 संहिताएँ कही है। सब मिलाकर  1131 है, किन्तु वर्तमान कल्प की संहिताओं के विषय में सीतोपनिषद् में ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 109 , सामवेद की 1000, अथर्ववेद की 50 संहिताएँ कही है, यह सब मिलाकर 1180 संहिताएँ हैं। इतने ही ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद्, धर्मसूत्र, श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र है। इन सब को मिलाकर चारों वेद पूर्ण होते हैं। महर्षि पतंजलि के समय मे उपर्युक्त संहिता प्रभृति मिलते थे, किन्तु वर्तमान में बहुत कम उपलब्ध हैं।
                                     ~~ 

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