यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे

काया अर्थात, आपके पिंड में ब्रह्मांड का दर्शन आप भी कर सकते है।  ऋषि मुनि इस विद्या से ब्रह्मांड का दर्शन जिसे यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे कहा जाता है। 

यह बहुत ही अमूल्य, एक साबर मंत्रों के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी द्वारा दिया गया साबरी ज्ञान है। 
(काया अन्दर-पंचवायु दर्शन)
पंचवायु के उपप्राण
१. नाग = डकार में
२. देवदत्त = जिंबाई में
३. कुर्म = पलक झपकने में
४. कृकल = भूख लगती है
५. धनंजय = मृत्यु उपरान्त काया को फुलाता है।

स्थूल रूप में जिसमें प्राणों के ढाँचे पर देह का कोश बना हुआ है। सूक्ष्म रूप जिसमें पंच शक्तियाँ प्राणों को चलाती है और कारण रुप जो अनुभव का लक्ष्य है। स्थूल का अधिष्ठान चिग्रंथी है। सूक्ष्म का अधिष्ठान चिदाभास है और कारण का अधिष्ठान चिदाकाश है। चिदग्रंथी में देह का अभिमान रहता है। चिदाभास में लिंग शरीर का ज्ञाता बसता है। चिदाकाश में स्वरूप का साक्षी चैतन्य निवास कर्ता है।

१. चिदग्रंथी – यह प्रतिबिम्ब जैसे चमकते हुए धातु के टुकड़ों में मुख को देखे, तो जो जैसे टुकड़ों का रंग है। वैसे ही प्रतिबिंब है।

२. चिदाभास – यह प्रतिबिम्ब जैसे जल में मुख देखते है, जो हिलता हुआ प्रतीत होता है।

३. चिदाकाश – यह प्रतिबिम्ब निश्चल स्पष्ट होता है, जैसे दर्पण में मुख को जैसे कि वैसे ही दिख जाता है।

१. स्थूल क्रिया स्पन्दरूप है जो मरूत देवता के आधीन है।

२. सूक्ष्म क्रिया प्राणशक्ति है जो निस्पन्द रूप इन्द्र के आधीन है।

३. कारण समाधिस्थ गति, जिसके स्वामी रुद्र है और इन स्थूल सूक्ष्म कारण की पांच-पांच शक्तियाँ को ही समान प्राण अपान व्यान उदान कहते है। अब इन पांच वायु का स्थूल रूप देखिए जो एक वायु श्वास होकर चलती है तो इनके क्रिया-स्थान के पांच भाग होते है। 
अर्थात्
१. समान वायु – यह निश्चल होकर आकाश का रूप धारण करके सब में सर्वत्र गमन करती है स्थान नाभि है और यह आकर्षण शक्ति उत्पन्न करती है।
२. प्राणवायु – यह अपेक्षानुसार बाहर की पवन अन्दर खींचते है जिसका स्थान हृदय है।
३. अपानवायु – क्रिया-उत्तेपण है, रूप अग्नि, स्थान गुदा स्थान है। यह देह के अन्दर की पवन ऊपर को निकालती है।
४. व्यान वायु - क्रिया-प्रसारण है। देह के सर्व अंगों में प्रवेश करता रूप = जल और स्थान = ललाट है।
५. उदानवायु – क्रिया-आंकुचन देह के सभी अंग में सिकुड़ना, रूप-पृथ्वी और स्थान कण्ठ है।
अपना देह एक भपके के समान है। सबसे नीचे अपान वायु अग्नि का काम देती है और समान वायु भाण्डा (बर्तन) बनती है। प्राणवायु जल का कार्य करती है इन तीनों के व्यापार से जो भाप उठती है। शिश के ढकने (खोपड़ी) में एकत्र होकर देह के सब अंगों में फैलती है। उसका नाम व्यान है। जब भाप का कार्य हो जाता है। तब वह द्रव रूप सिमट कर ढकने पर रस बिन्दुओं को उत्पन्न करती है। उसे उदान कहते है।

यथार्थ में प्राण/अपान दो शक्तियाँ है और उदान-व्यान उनकी युक्तियाँ है। प्राण का सम्बन्ध उदान से और अपान का व्यान से है, जैसे जल में मिट्टी के परमाणु बैठते है और अग्निभाप को उठाती है इन चारों का अधिष्ठान समानवायु में है। जो आकाशवान निर्लेप है। फिर उसमें आकर्षण शक्ति बाहर की प्राणवायु देह के अन्दर खींचती है और वह समाप्त होते ही अपान शक्ति देह से बाहर निकालना प्रारंभ कर देती है। इस प्रकार श्वास का आवागमन बनकर लुहार कि घौंकनी की तरह दिन-रात चलता है और इसी का नाम जीवन है।

प्राण श्वास अन्दर खींचते हुए बाह्य पदार्थो का संग चैतन्य के साथ इन्द्रियों द्वारा होता है और श्वास बाहर निकलते है तब चैतन्य का प्रतिबिम्ब विश्व में भासता है। इन दो क्रिया की समता में बाणी उत्पन्न होती है और ये परस्पर घिसने से जठराग्नि निकलती है और अन्नपचता है। 
पवन तत्व का बीज रूप प्राण है अतः पांचों पवन को प्राण कहते है जिनमें प्राण तत्व का अंश मिश्रित है। यह मुख्य निजरूप प्राणवायु पिण्ड और ब्रह्माण्ड में सम्पूर्ण व्यापक है। यदि पिण्ड की वायु ब्रह्माण्ड की वायु से सम्बन्ध टूट जाये तो यह मृत्यु है।

इस प्राण से वायु, अपान से पित्त, और व्यान से कफ, उत्पन्न होकर उदान रूपी देह की स्थिति सिद्ध होती है और इन पवनों का परस्पर सम्बन्ध और समूह से संकल्प उठता है। 
मन का अभ्यास चिद ग्रन्थि में होता है।

इन प्राणों के संयोग से पांच उपप्राण बनते है। जो १. नाग = से डकार आता है।
 २. देवदत्त = से जिंबाई आती है।
 ३. कुर्म = से पलक-पलक झपकते है।
 ४. कृकल = से भूख लगती है। और
 ५. धनंजय = मृत्युपरान्त शरीर को फुलाता है।
 अतः समान (नाभि) वायु पिण्ड और ब्रह्माण्ड में आकाशवत व्यापक है। और निम्न ४ वायु उत्पन्न होती है।
१ . प्राणवायु (हृदय) – ब्रह्माण्ड में पवन होकर चलती है और पिण्ड में श्वास बनकर बाहर से अन्दर आती है।
२. अपानवायु (गुदा) - ब्रह्माण्ड में अग्नि ज्योति होकर रहती है। और पिण्ड मे जठराग्नि बनकर श्वास को अन्दर से बाहर फेकती है।
३. व्यान (शिश) – ब्रह्माण्ड में चन्द्र ज्योति होकर रहती है। पिण्ड में भाप बनकर रूधिर को नाडियों में चक्र देती है और देह का पोषण कराती है।
४. उदानवायु (कण्ठ) – ब्रह्माण्ड में परमाणु रूप मे ठहरी है। और पिण्ड में स्थूलाकार बनी है जिससे सभी कर्म इन्द्रियों के कार्य सिद्ध होते है।
अतः ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनों में पांच पवन का खेल है। किन्तु उन पवन का व्यवहार स्थान भेद से ब्रह्माण्ड में एक प्रकार का और पिण्ड में दूसरे प्रकार से बिम्ब प्रति-बिम्बवत है। 
जो वास्तव मे पंचप्राणों का सूक्ष्म आकार है, और पंचमहाभूत उन्हीं की स्थूल अवस्था है। इसी प्रकार सूक्ष्म अवस्था में प्राण-अपान व्यान उदान इन चारों प्राण शक्ति की सूक्ष्म क्रिया अन्तर्दृष्टि से देखने पर पवन की चाल मंद हुई प्रतीत होती है और प्राण पवन निस्पन्द रूप होते ही द्वन्द मिटता है। चिदाभास का निर्माण होता है। यहां चैतन्य स्वतंत्र है और देह जड़ वत होता है। चैतन्य के अधीन मन-इन्द्रियों का व्यापार चलता है।
इसी प्रकार कारण अवस्था में चिदाभास का लय होकर चिदग्रंथी खुलने पर दर्शन होता है। नाभि (समान) त्रिकुटी (व्यान) हृदय (प्राण) पर ध्यान करने पर नाभि द्वारा प्राण स्पन्दन क्रिया होती है। हृदय पर शब्द की एकता करने पर प्राण निस्पन्द होता है। और त्रिकुटी में स्पन्द और निस्पन्द क्रिया रूप प्राण-अपान का लय हो जाता है। एक विलक्षण दर्शन हो जाता है। जो अवर्णनीय है। जिसे चिदाकाश अवस्था कहा जाता है। यहां अशून्य रूप चिदाकाश में जगत से चैतन्य का पृथक भाव ज्ञान चक्षुद्वारा दिखता है। तब मायारूपी जगत चैतन्य के प्रतिबिम्ब समान दिखता है।
इस प्रकार प्राणों का विश्लेषण बतलाया गया है। 
मूल विषय ॐकार चैतन्यमय शब्द, स्वर व्यंजन अक्षर आदि का ॐकार ही कारण स्वरूप है।

गुरु मत्स्येंद्रनाथ जी अपने शिष्य से कहते हैं कि, 
 हे प्रिय शिष्यों मैं पुनः शब्दब्रह्म एवं अक्षर ब्रह्म के विषय में पुनः विश्लेषण करता हूँ। 
 हमने बताया था कि हंस शब्द से आत्मभाव तथा अनात्म भाव कैसे निर्माण होते है अतः उसके आगे सुनो।

जब प्राण और अपान-व्यान के अन्दर लय हो जाते है तब वैखरी बाणी बनती है जो स्वर शक्ति बनकर व्यंजनों को व्यक्त (प्रगट) करती है।
अतः इन व्यंजन और अक्षरों की उत्पत्ति भिन्न है जो कण्ठ रूपी वीणा से विस्तारित होती है जैसे
“चित्तबुद्धि गणपति कण्ठ बसे सरस्वती” 
तो कण्ठ में वीणाधारी सरस्वती ही वैखरी बाणी से बोलती है। कण्ठ के ७ पर्दे वीणा के तार ही होते है। 
१. गले से क ख ग घ निकलते है वह निषाद पड़ता है।
२. तालू से च छ ज झ निकलते है वह चैवत पड़ता है।
३. जिव्हा से ट ठ ड ढ निकलते है वह पश्चम पड़ता है।
४. दाँतों से त थ द ध निकलते है वह मध्यम पड़ता है।
५. होठो से प फ ब भ निकलते है वह गंधार पड़ता है।
६. नाक से ङञ ण न म निकलते है वह ऋषभ पड़ता है।
७. मुख से य र ल व श ष स ह निकलते है वह मुखस्वर पड़ता है।

इन सप्त पर्दे से सप्त सूर निकले है। इन स्वरों के ३ भेद है।
 १. उदात्त 
२. अनुदात्त और 
३. स्वरित
 ७*३ = २१ भाँत के स्वर सिद्ध होते हैं जो ७ प्रकृति और ३ गुण के अनुसार समझना चाहिए।
अतः वाणी और संगीत का कुछ परिणाम अवश्य होता है। जो उस समय का उन्मान किया जाता है। जिसे छन्द कहते है। जो सामविद्या में ताल और लय कहते है। अर्थात् साम छन्दों में आकर छुप जाता है पर विभक्त का प्रतीत होता है। 
छन्दों में गायत्री छन्द उत्तम जाता है। उसमें परिणाम का नियम नहीं है और ब्रह्म विद्या उसमें गुप्त हुई है। जो वैदिक दैविक देवभाषा (संस्कृत) के मंत्र तंत्र  गायत्री छंद में बोले जाते है।
नाथ सिद्ध सम्प्रदाय में स्वछन्द श्रेष्ठ माना जाता है। जो स्वयं सिद्ध कहा गया है। जिसका परिणाम या प्रत्यय प्रत्यक्ष प्रमाण है और ब्रह्मज्ञान उसमें सूक्ष्म रूप से विद्यमान है।
 ॐकार, आदिनाथ ९, नाथ ८४

सिद्ध मुख्यत: मत्स्येन्द्र नाथ जी के शाबर मंत्र तंत्र रहस्य तथा सांभरी मंत्र तंत्र रहस्यों में इत्यादि स्वंछन्द सिद्ध में बोले जाते है। 
अतः नाथ सिद्धों का ब्रह्म ज्ञान, का सत्य ज्ञान या शून्य समाधि या मोक्ष मुक्ति यह सब योग ध्यान धारणा समाधि के स्वरूप है। प्रकृति माया स्वरूप यौगिक चक्र तथा सप्त लोक सप्त स्वर्ग पातालादि अर्थात् ब्रह्माण्ड ते पिण्ड सब ॐकार से ही है। जैसे प्रथम १. भूलोक जो पृथ्वी मण्डल है नाथ सिद्ध योग में मूलाधार चक्र में मूल बीज मंत्र “लँ” या “भूः” शब्द को जप कर ध्यान करने पर देह और भूलोक का ऐक्य अनुभव आता है।

२. पृथ्वी के ऊपर जल चक्र जो स्वाधिष्ठान चक्र मेरू दण्ड में स्थित है, इसका बीज मन्त्र 'वँ' या भूवः शब्द का ध्यान करने पर इस लोक की शब्द एकता का अनुभव सिद्ध होता है। इसे चन्द्र लोक भी कहते है।

३. इसके ऊपर अग्नि चक्र है अर्थात् स्वः लोक जो योग में 'पँ' इसके स्थान हृदय में अनहद चक्र में है इस 'रँ', बीज या स्वः शब्द के साथ सूर्य लोक का ध्यान करने से श्रुति निश्चल हो जाती है।

४. सूर्य लोक जो वायुमण्डल से घेरे हुए है इसे वायुलोक भी कहा जाता है या महर्लोक कहा जाता है जिसका अधिष्ठान कंठ स्थान स्थित विशुद्ध चक्र में है, 'हँ' बीज से महः शब्द का चिन्तन ध्यान करने पर वायु लोक या मरूत लोक सूर्य-चन्द्र तारांगन दर्शन होकर एकता प्रतीत होती है।

५. अब इस वायुलोक के चारों ओर आकाश लोक या जन लोक जिसका स्थान दो नेत्रों के बीच में है। ज्ञान चक्र में है यहां 'हँ' या रुद्र देव का ध्यान करने पर चैतन्य व पंचमहाभूत साक्षी हो जाता है।

६. तपः लोक जो मन का अधिष्ठान है। जो पंच महाभूत आधार है। अंधेरे का रूप रखता है। योग में इसका स्थान ललाट में ज्ञान चक्षु जहां इन्द्र का ध्यान प्रकार रूप करने पर अंधेरा नष्ट हो जाता है और ज्ञान का स्वरूप आता है।

७. सत्य लोक यह मेरा स्थान है जो योग में ब्रह्मरंध्र परम गुफा का स्थान है। जहां शिखा स्थान अवस्थित ॐकार का या गुरु का ध्यान करने पर अविद्या या अज्ञान दूर होकर ब्रह्मज्ञान अहंब्रह्मास्मि तत्वमसि आदि की उपलब्धि होकर आगे-आगे शून्यातीत समाधि उपरान्त मोक्ष मुक्ति की उपलब्धि हो जाती है।

इस प्रकार ब्रह्माण्ड सप्त लोक, सप्त स्वर्ग आदि सब ॐकार का ही विचार है। अतः मैंने जो पृथ्वी मण्डल का लँ बीज, जल का वँ, बीज, अग्नि का 'रँ' बीज, सूर्यलोक या वायु का हँ बीज, आकाश का हँ बीज तथा तपोलोक एवं सत्यलोक के लिये 'ॐ' बीज की साधना करने पर अपेक्षित साक्षात्कार एवं ज्ञान हो जाता है।  अतः शब्दब्रह्म के अनुसार लँ वँ रँ हँ यह सभी ॐकार से ही प्रगट होकर पंचतत्वादि सृष्टि बनी है। इस प्रकार सारा ब्रह्माण्ड एवं तीन लोक सह सब सृष्टि ॐकार का ही विस्तार है। ऐसा कहते हुए भगवत श्री गोरक्षनाथ आसमान में दिख रहे चन्द्रमा को एक टक देखने लगे चन्द्रमा की वह शीतल और अमृतमय प्रकाश मन को अद्भुत शान्ति दे रही थी। तब योगीराज भर्तृहरि नाथजी से रहा नही गया वह मन के राजा चन्द्र के समान अपने सतगुरु बानी द्वारा ज्ञानामृत का आनन्द और लेना चाह रहे थे। उन्होंने कहा हे गुरुदेव आप चारों वेदों के विस्तार बता रहे थे, जिसमें चार आश्रम चार वर्ण-धर्म कर्म इस विषय का भी उल्लेख किया था। अब हमें और विस्तार से बताने की चेष्टा करें तो हम पर बड़ी कृपा होगी।

तब गुरु गोरक्षनाथजी बहुत प्रसन्न हुए।  उनके तेजस्वी मुख मंडल पर स्मित हास्य चन्द्र के भांति मनमोहक लग रहा था। उन्होंने मधुर बानी से कहा कि हे योगी भर्तृहरि गोपीचन्द हमने पहले ही आपको सुनाया था कि जब प्रजापति ब्रह्माजी ने ॐकार स्वरूप की बहुत दिनों तक तपस्या की थी तब यही चारों वेदों को प्राप्त किया था जो नाथ सिद्धों के सूक्ष्म वेद से प्रगट हुये थे।
 इस प्रकार इन वेदों के विस्तार से आगे चार वर्णों का भी विस्तार हुआ जो उनके अपने गुण-धर्म कर्म के अनुसार थे। 
तब उस समय सृजन सृष्टि के बीज रूपी ॐकार के विराट स्वरूप के मुख से ब्राह्मण सिद्ध हुये फिर उनके बाहु से क्षत्रिय प्रगट हुये फिर वैश्य ॐ के जांघ से तो शुद्र उनके पाव तुल्य जानने लगे, और जिसे प्रकार कहा गया है कि “चंदा सूरज पवन पानी" अर्थात उस विराट ॐकार का मन ही चन्द्र है और नेत्र सूरज है। विशेषतः इस विराट ॐकार के शिखा मण्डल से जो बिंदू रूप है इससे नाथ सिद्ध योगेश्वर तथा अनेकों साधु सन्त का प्रागट्य हुआ जिनके गुण-धर्म-कर्मनुसार जन-जीवन के लिये त्याग-वैराग्य-ज्ञान-धर्म-कर्म मोक्ष मुक्ति का कारण बने अतः यह सर्व श्रेष्ठ सिद्ध हुआ तदपश्चात देखो।

इस विराट ॐ के मुख से वैखरी बाणी से ब्राह्मण वर्ण जो विद्याज्ञान-शास्त्र विधि विधान, कर्मकाण्डों सतकर्म इत्यादि का प्रसार हुआ जो श्रेष्ठ अंग (निर्माण) है। उसी प्रकार बाहुबल के अंग क्षत्रिय जिनके सहायता से प्रजा की रक्षा होती है। और जो वैश्य जिस जांघो से उत्पन्न हुये उन जांघो में कार्य शक्ति है जिसमें कर्म व्यापार लेन-देन व्यवहार इत्यादि से स्थिति उन्नति होती है। और उन पावों से निर्माण शुद्र जो सेवा सुश्रूषा सहयोग करते है और इस प्रकार चारों वर्ण से सेवा उन्नति और कार्य सिद्ध होते है। और चारों धर्म का निर्वाह होता है।
 धर्म यज्ञार्थ कर्म का ही नाम है। और कर्मकाल के तीन भेद है। जो कि प्रथम (१) प्रालब्ध (२) क्रियमाण और (३) अगामी हैं परन्तु विवेक से तीन प्रकार के कर्म बनते है (१) अध्यात्म कर्म (२) आधिभौतिक कर्म (३) आधि दैविक कर्म अतः
(१) अध्यात्म कर्म – यह देहधारी से बुद्धि, मन और इन्द्रिय द्वारा किये जाते है और उसके फलस्वरूप सुख-दुःख को प्राप्त होते है।

- (२) आधिभौतिक कर्म – यह जो देहधारियों से उत्पन्न होता है और उसे भी सुख-दुःख पहुँचता है।

(३) आधिदैविक कर्म – यह कर्म पंचमहाभूतों से निर्माण होता है और मनुष्य को अच्छा-बुरा फल देता है।
 अतः भर्तृहरि गोपीचन्द जरा गौर से सुनो कि सत्य तो यह है कि कर्म सिद्धि जो सम्पूर्ण सृष्टि स्वरूप कर्म ही है वह यज्ञों के द्वारा होती है। जिसकी सर्वप्रथम सृष्टि के पूर्व एक विराट यज्ञ के भांति अग्नि स्तम्भ जो ॐकार स्वरूपी आदिनाथजी ने प्रगट किया था। जो नाथ सिद्धों का धूना या धूनी रूप में सिद्ध हुआ अतः इस यज्ञ अथवा नाथ सिद्धों का धूना का कर्ता यही ॐकार ही है। जिसको अज्ञान से लोग नहीं जानते जो कि वह लोक कर्म और उस कर्म का फल अपना ही, अपने ही अहंकार में मानते है जैसे मैं करता हूँ, मैं बलवान हूँ, मैं ही करता हूँ, मुझे फल चाहिए इत्यादि। 
 यह मैं-मेरा-मुझे ही अहंकार है।

देखो सभी जीव प्राणियों की उत्पत्ति अन्न से होती है। अन्न पोषण वर्षा से लेता है। वर्षा पृथ्वी तथा जल से परमाणु (बाष्प) को ऊपर खींचकर उससे बादल बन कर वर्षा होती है। जिसे अन्न बनाकर जीव उत्पत्ति होती रहती है और यही प्राकृतिक यज्ञ है।
 जो ॐकार द्वारा होता रहता है। इस ब्रह्म यज्ञ भी कहते है जो ॐ ही ब्रह्म है और यहां सभी देवता जैसे अग्नि, तेज, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश अपने अपने कार्य करते है जिसमें तेज तत्व प्रधान है।
अतः इस ब्रह्मयज्ञ या प्राकृतिक यज्ञ में अथवा अपने नाथ परम्परा के धूना कर्मों में और भी यज्ञ कहे जाते है। जैसे १. अश्वमेघ यज्ञ २. नरमेघ यज्ञ ३. गौमेघ यज्ञ ४. स्वाध्याय यज्ञ ५. शान्ति यज्ञ ६. पुत्र कामेष्टि यज्ञ इत्यादि यज्ञ के प्रकार है।

१. अश्वमेघ यज्ञ – इस यज्ञ का तात्पर्य यह है कि अश्व अर्थात् घोड़े की चंचलता यह प्राण को कहा गया है। मेघ अर्थात् वध या और निरोध कहा गया है। अश्वमेघ यह एक ऐसा यज्ञ है तो प्राणायाम ही यज्ञ है जो एक साधना है जो प्राण का निरोध करते है। जो प्राण ॐकार स्वरूप है और इस अश्वमेघ यज्ञ जैसे साधना से घोड़े की चंचलता स्वभाव के मन का वध करके अर्थात् मन के विचार, संस्कार, वृत्तियाँ, विकारों का वध करके अर्थात् चंचल मन को शून्य करके ध्यान समाधि में अवस्थित होना ही अश्वमेघ यज्ञ कहते है।
 जो परिपक्व अवस्था में आत्मविद्या-आत्मज्ञान को जीव प्राप्त करता है। 
अतः हमारे नाथ सिद्ध योगेश्वर धूना (यज्ञ) चेतन करके उसके सानिध्य में योग साधना (प्राणायाम आसन मुद्रा इत्यादि) करते है और ज्ञान को प्राप्त करते है। यही अश्वमेघ यज्ञ कहलाते है। परन्तु अज्ञानी लोक यज्ञों में घोड़े की बलि चढ़ाने का ही अर्थ लेते है। किन्तु यह अत्यंत घृणित, अत्यंत गलत, तामसी एवं पाप कर्म कहा जाता है। अतः यज्ञ विधियों में कोई भी जीव का बलि विधान निषिद्ध है।

२. नरमेघ यज्ञ – इसका प्रयोजन जीव या नर-नारी अपने अहंकार का मेघ यानि वध करे, नाश करे। जिससे नर को ज्ञान होकर वह सुख-दुःख के परे ले जाता है। यहां भी मूर्ख लोक नर बलि का अर्थ लेते है। अतः इस प्रकार से नर हत्या पाप का भागी बनाता है।

३. गौमेघ यज्ञ – इसका प्रयोजन गौ यानि इन्द्रिय अतः इन्द्रियों के ऊपर संयम करना या निरोध करना कहा गया है। इस भक्ति यज्ञ या योग साधना रूपी यज्ञों में इन्द्रिय शमन या इन्द्रिय संयम करके सात्विक भाव से ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष मुक्ति को प्राप्त करना है। अतः इसमें भी पापी लोक गौ की बलि का गलत अर्थ लेकर गौवों की हत्या करते हुए गौहत्या का पाप करते है जो अन्त में नरक को प्राप्त होते है।

४. स्वाध्याय यज्ञ – इसका प्रयोजन ज्ञान की प्राप्ति के लिये वेदों-शास्त्रों पुराणों उपनिषदों आदि ग्रंथों अध्ययन किया जाता है और अन्त में सत्कर्म ज्ञान पाकर मुक्त हो जाते है।

५. शान्ति यज्ञ – यह यज्ञ का आशय यह है कि सर्वस्व का त्याग-वैराग्य होकर शान्ति को प्राप्त होना या संसार के कर्म भोग भोगते हुये निष्काम-निस्वार्थ होकर मुक्त हो जाना, जैसे विदेह राजा जनक थे। अतः स्थूल रूप से लोक राज्य शान्ति-विश्व शान्ति-ग्राम शान्ति, ग्रह दोष शान्ति, गृह क्लेश शान्ति आदि उद्देश्य से यज्ञ कर्म करते है।

६. पुत्र कामेष्टि यज्ञ – यह निसंतान को सन्तान प्राप्ति हेतु किये यज्ञ को पुत्र कामेष्टि यज्ञ कहते है। यह तांत्रिक कर्म है तथा राजा दशरथ ने यह यज्ञ करने पर उन्हें राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न जैसे उत्तम पुत्रों की प्राप्ति हुई थी। 
इस प्रकार यज्ञ कर्मों से ॐकार के त्रिगुण मिश्रित जीव नर नारियों में सात्विक गुणों से देवी देवता राजसी गुणों से मनुष्य और तामसी गुणों से राक्षस बनते है। जिसमें जिस गुण की अधिकता है वह वैसे ही बन जाते है।

अतः इसमें दो संपदा है, १. दैवी संपदा २. राक्षस संपदा।
 इनमें हमेशा विरोध होता है। यहां जब दैवी संपदा बलवान होती है तब राक्षसी संपदा निर्बल होती है, तो वह एक यज्ञ सिद्ध होता है और ॐकार से ३३ कोटि या ५६ कोटि देवता अर्थात् दैवी संपदा बनती है। 
५ कर्मेन्द्रिय, ५ ज्ञानेन्द्रिय और एक मन = ११ अंक, उसे त्रिगुण ३ से गुणा ११*३-- ३३ अंक सिद्ध होता है। उस पर सप्त प्राकृतिक ७ शून्य देकर अर्थात् ३३कोटि की संख्या सिद्ध होती है। 
इसमें कारण = त्रिपुटी के ३ अंक को सूक्ष्म = त्रिपुटी के ११ अंक से अधिक या योग करके स्थूल = त्रिपुटी के ७ शून्य को बढ़ाकर तैतीस कोटि देवी-देवता माने जाते है। यह शैव अर्थात शिव ॐकार आदिनाथ जी की नाथ सिद्ध परम्परा का सिद्धान्त है। 
उसी प्रकार विष्णु भक्त या वैष्णवी लोक ५६ कोटि देवता मानते है। वह कारण त्रिपुटी के अष्ठधा प्रकृति को सिद्ध किया और सूक्ष्म त्रिपुटी में सप्त लोक माने और स्थूल त्रिपुटी में सप्त मण्डल स्थापित किये इस विधि से २*४*७=५६ इस पर ७ शून्य बनाये तो ५६ कोटि की संख्या देवताओं की बनती है। अतः देखो ब्रह्मज्ञान जो देवी देवताओं की शक्तिओं से बनता है। जो ईश्वरीय ॐकार कृत है। जो सदैव एक सा रहता है, जो नित्य नित्य या नेति नेति कहते है। अतः देवताओं की स्वाभाविक क्रियाओं को समझना पराविद्या है और जो संसार की भांति चलती है उसे अपराविद्या पर चलता है। जिसका मुख्य आधार या मुख बीज या मुख्य निर्माता ॐकार ही है। इस प्रकार हे भर्तृहरि गोपीचन्द नाथ जो कि नाथ सिद्ध आदेश करते समय ऐसा जो कहते है एक ओंकार तेरा आधार तीन लोक में जय जय कार। 
अतः हमने ॐकार की स्थूल सूक्ष्म और कारण रूपी जगत विस्तार की महिमा का बखान किया है।
आदेश आदेश आदेश।

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