चेतना का प्रवाह ऊपर की शुद्धता से नीचे के स्थूल रूपों तक उतरता है।
यह विवरण सांख्य दर्शन की तत्त्व-उत्पत्ति पर आधारित है।।
यह चित्र बताता है कि चेतना की यात्रा कैसे शुद्ध पुरुष से प्रारंभ होकर पदार्थ तक पहुँचती है। सबसे ऊपर दो मूल तत्व हैं पुरुष और प्रकृति।
पुरुष शुद्ध चेतना है: अकर्ता, निष्क्रिय, केवल साक्षी। प्रकृति मूल ऊर्जा है, जिसमें तीन गुण: सत्त्व, रजस और तमस सदैव संतुलन में रहते हैं।
पुरुष का केवल देखना ही प्रकृति में हलचल पैदा करता है, जिससे सबसे पहले महत (ब्रह्मांड की प्रथम जागरूकता) उत्पन्न होती है। महत का ही विकसित रूप है बुद्धि, जो विवेक, निर्णय, पहचान और जानने की क्षमता का स्रोत है।
बुद्धि से आगे प्रकट होता है अहंकार, वह शक्ति जो चेतना में “मैं” और “मेरा” की अनुभूति पैदा करती है अहंकार बुरा नहीं होता; यह वही द्वार है जिससे पूरी प्रकृति बाहर आती है।
यही अहंकार तीन धाराओं में विभाजित होकर पूरा जगत रचता है।
सत्त्व-प्रधान अहंकार प्रकाश और स्पष्टता से युक्त होकर पाँच ज्ञानेंद्रियों (श्रवण–ध्वनि, दृष्टि–रूप, रसना–स्वाद, घ्राण–गंध, स्पर्श–स्पर्श) और पाँच कर्मेंद्रियों (वाणी, हाथ, पैर, उत्सर्ग, प्रजनन) को जन्म देता है।
ये इंद्रियाँ जीवन को संवेदन और क्रिया प्रदान करती हैं।
रजस-प्रधान अहंकार गति और ऊर्जा से भरा होता है और इसी से उत्पन्न होता है मन, जो चेतना, इच्छा, कल्पना, संशय, संकल्प और क्रिया का माध्यम है मन ही इंद्रियों और बुद्धि के बीच सेतु बनकर जीव को संसार में सक्रिय रखता है।
तमस-प्रधान अहंकार जड़ता और भारीपन से युक्त होकर पंचमहाभूतों का जन्म करता है। आकाश (ध्वनि का गुण), वायु (स्पर्श), अग्नि (रूप), जल (रस) और पृथ्वी (गंध)।
इन्हीं पाँच तत्वों से समस्त स्थूल जगत शरीर, प्रकृति, पदार्थ और ब्रह्मांड बनता है।
इस प्रकार चेतना का प्रवाह ऊपर की शुद्धता से नीचे के स्थूल रूपों तक उतरता है।
यह सम्पूर्ण प्रक्रिया हमें बताती है कि संसार बाहर नहीं, बल्कि चेतना का ही विस्तार है; जैसे-जैसे मन, अहंकार और इंद्रियों की परतें शांत होती हैं, चेतना पुनः उसी मूल पुरुष की ओर लौटती है और यही वापसी ही वास्तविक मुक्ति, योग और आध्यात्मिकता का लक्ष्य है।
शब्द आकाशस्य, स्पर्शो वायोः, रूपम् अग्नेः, रसः आपः, गन्धः पृथिव्याः।
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