सूतक और पातक विचार
🌼✡️ सूतक/पातक विचार ✡️🌼
हमारे ऊपर आ रहे कष्टो का एक कारण सूतक के नियमो का पालन नहीं करना भी हो सकता है।
सूतक का सम्बन्ध “जन्म एवं मृत्यु के” निम्मित से हुई अशुद्धि से है ! जन्म के अवसर पर जो ""नाल काटा"" जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप “सूतक” माना जाता है !
जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता
३ पीढ़ी तक – १० दिन
४ पीढ़ी तक – १० दिन
५ पीढ़ी तक – ६ दिन
ध्यान दें :- एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती … वहाँ पूरा १० दिन का सूतक माना है !
प्रसूति (नवजात की माँ) को ४५ दिन का सूतक रहता है
प्रसूति स्थान १ माह तक अशुद्ध है ! इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं !
अपनी पुत्री
पीहर में जनै तो हमे ३ दिन का,
ससुराल में जन्म दे तो उन्हें १० दिन का सूतक रहता है ! और हमे कोई सूतक नहीं रहता है !
नौकर-चाकर
अपने घर में जन्म दे तो १ दिन का,
बाहर दे तो हमे कोई सूतक नहीं !
पालतू पशुओं का
घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर हमे १ दिन का सूतक रहता है !
किन्तु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता !
बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः १५ दिन, १० दिन और ८ दिन तक “अभक्ष्य/अशुद्ध” रहता है !
पातक
पातक का सम्बन्ध “मरण के” निम्मित से हुई अशुद्धि से है ! मरण के अवसर पर ""दाह-संस्कार"" में इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप “पातक” माना जाता है !
मरण के बाद हुई अशुचिता :-
३ पीढ़ी तक – १२ दिन
४ पीढ़ी तक – १० दिन
५ पीढ़ी तक – ६ दिन
ध्यान दें :- जिस दिन """दाह-संस्कार"" किया जाता है, उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है, न कि मृत्यु के दिन से !
यदि घर का कोई सदस्य बाहर/विदेश में है, तो जिस दिन उसे सूचना मिलती है, उस दिन से शेष दिनों तक उसके पातक लगता है !
अगर १2 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान-मात्र करने से शुद्धि हो जाती है !
गर्भपात
किसी स्त्री के यदि गर्भपात हुआ हो तो, जितने माह का गर्भ पतित हुआ, उतने ही दिन का पातक मानना चाहिए
घर का कोई सदस्य ""तपस्वी' साधु सन्यासी""" बन गया हो तो, उस साधु सन्त को , उसे घर में होने वाले जन्म-मरण का सूतक-पातक नहीं लगता है ! किन्तु स्वयं उसका ही मरण हो जाने पर उसके घर वालों को १ दिन का पातक लगता है !
विशेष
किसी अन्य की शवयात्रा में जाने वाले को १ दिन का, मुर्दा छूने वाले को ३ दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले को ८ दिन की अशुद्धि जाननी चाहिए !
घर में कोई "आत्मघात "करले तो ६ महीने का पातक मानना चाहिए !
यदि कोई स्त्री अपने पति के मोह/निर्मोह से"आग लगाकर जल मरे," बालक पढाई में फेल होकर या कोई अपने ऊपर दोष देकर "आत्महत्या" कर मरता है तो इनका पातक बारह पक्ष याने ६ महीने का होता है !
उसके अलावा भी कहा है कि जिसके घर में इस प्रकार "अपघात" होता है, वहाँ छह महीने तक कोई बुद्धिमान मनुष्य भोजन अथवा जल भी ग्रहण नहीं करता है ! वह मंदिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर जी में चढ़ाया जाता है !
जहां आत्महत्या हुई है, उस घर का पानी भी ६ माह तक नहीं पीना चाहिए। एवं अनाचारी स्त्री-पुरुष के हर समय ही पातक रहता है।
यह भी ध्यान से पढ़िए
सूतक-पातक की अवधि में “देव-शास्त्र-गुरु” का पूजन, प्रक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती हैं !
इन दिनों में मंदिर के उपकरणों को स्पर्श करने का भी निषेध है ! यहाँ तक की गुल्लक में रुपया डालने का भी निषेध बताया है ! दान पेटी मे दान भी नहीं देना चाहिए।
देव-दर्शन, प्रदिक्षणा, जो पहले से याद हैं वो विनती/स्तुति बोलना, भाव-पूजा करना, हाथ की अँगुलियों पर जाप देना शास्त्र सम्मत है !
कहीं कहीं लोग सूतक-पातक के दिनों में मंदिर ना जाकर इसकी समाप्ति के बाद मंदिरजी से गंधोदक लाकर शुद्धि के लिए घर-दुकान में छिड़कते हैं, ऐसा करके नियम से घोनघोर पाप का बंध करते हैं ! मानो या न मानो,
यह सत्य है, नहीं मानने पर दुःख, कष्ट, तकलीफ, होगी
इन्हे समझना इसलिए ज़रूरी है, ताकि अब आगे घर-परिवार में हुए जन्म-मरण के अवसरों पर अनजाने से भी कहीं दोष का उपार्जन ना हो।
धर्मशास्त्रों में जनन, मरण, रज, उच्छिष्ठ तथा जाति पाँच प्रकार के सूतक माने गये हैं, अर्थात् घर में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर, घर की किसी स्त्री के रजस्वला होने पर सूतक की प्राप्ति होती है।
इस सूतक के समय उस घर में पूजा आदि वैदिक कर्मो का निषेध किया गया है। उसी प्रकार उच्छिष्ठ का ग्रहण तथा कुछ विशिष्ट जाति के लोगों के साथ संपर्क न करने का भी विधान है। किंतु शैव आचार्य एवं संतों ने विशेष परिस्थितियों में उपर्युक्त सूतकों को स्वीकार नहीं किया है, जैसे कि इष्टलिंग का धारण तथा उसकी पूजा के लिये जनन, मरण और रज इन तीन प्रकार के सूतकों की प्रवृत्ति नहीं होती।
इसी प्रकार पादोदक और प्रसाद के सेवन के प्रसंग में ‘उच्छिष्ठ-सूतक’ को भी नहीं माना जाता। इसका तात्पर्य यह है कि शैव-धर्म में दीक्षा के समय गुरु अपने शिष्य को इष्टलिंग देता है और उसे आमरण शरीर पर धारण करने का आदेश करता है। यह दीक्षा स्त्री तथा पुरुषों के लिये समान रूप से होती है।
दीक्षा-संपन्न स्त्री यदि रजस्वला अथवा प्रसूता होती है, तो उस समय उस स्त्री को इष्टलिंग की पूजा करने का अधिकार है या नहीं ? यह शंका होने पर शैव आचार्ये ने इष्टलिंग धारण करने वाली स्त्री को इष्टलिंग की पूजा का अधिकार प्रदान किया है। जैसे पौण्डरीक आदि दीर्घकालीन सत्रों का संकल्प करके त्याग करते समय यजमान की पत्नी यदि रजस्वला हो जाती है, तो भी वह स्नान करके गीला वस्त्र पहनकर पुन: याग में सम्मिलित होती है, उसी प्रकार शैव धर्म में दीक्षित स्त्री रजस्वला या प्रसूता होने पर भी उसी दिन स्नान एवं गुरु के चरणोदक का प्रोक्षण करके शुद्ध होकर अपने नित्यकर्म इष्टलिंग की पूजा करने के लिये अधिकारी होती है।
इष्टलिंग की पूजा के अतिरिक्त पाक आदि अन्य कार्यों के लिए शैव धर्म में भी सूतक माना जाता है। जैसे हस्तस्पर्श के अयोग्य होने पर भी जिह्वा मंत्रोच्चारण के लिये योग्य है, उसी प्रकार रजस्वला या प्रसूता स्त्री पाक आदि अन्य लौकिक कर्म करने के लिये अयोग्य और अपवित्र होने पर भी इष्टलिंग के धारण एवं उसकी पूजा के लिये वह अग्नि, रवि तथा वायु के समान सदा पवित्र रहती है। घर में किसी की मृत्यु होती है, तो उस घर के लोग भी शव संस्कार के बाद स्नान एवं गुरु के चरणोदक के प्रोक्षण से घर को शुद्ध करके अपने अपने इष्टलिंग पूजा रूप नित्यकर्म को बिना किसी बाधा के यथावत् अवश्य पूरा करते हैं। यानि शैवों को इष्टलिंग की पूजा में मरणसूतक भी नहीं लगता है।
शैव संप्रदाय में प्रतिदिन गुरु या जंगम की पादपूजा करके एक पात्र में पादोदक (चरणमृत) तैयार किया जाता है और उस पादपूजा में सम्मिलित सभी शिवभक्त उसी एक पात्र में से पादोदक का सेवन करते हैं। यहाँ प्रथम व्यक्ति के ग्रहण करने के बाद वह पादोदक उच्छिष्ठ हो जाता है, तो दूसरा उसका ग्रहण करें या नहीं ? यह शंका होती है। शैव आचार्यो ने इस प्रसंग में भी उच्छिष्ठ सूतक को नहीं माना है। जैसे सोमयाग में हविःशेषभूत सोमरस को चमस नामक पात्र में संग्रह करके यज्ञशाला के सभी ऋत्विज उस चमस पात्र से सोमरस का सेवन करते हैं, तो भी वहाँ उच्छिष्ठ-सूतक नहीं माना जाता, उसी प्रकार शैव धर्म में भी एक पात्र से अनेक लोगों के द्वारा पादोदक स्वीकार करने पर भी उच्छिष्ठ-सूतक नहीं होता। गुरु या जंगम के भोजन से अवशिष्ट अन्न को प्रसाद कहते हैं। इस प्रसाद के स्वीकार करने में भी उच्छिष्ठ सूतक नहीं है।
बारहवीं शताब्दी के शैव संतों ने जाति-सूतक का भी निषेध किया है। उन्होंने शिवदीक्षा-संपन्न व्यक्ति किसी भी जाति का हो, उनके साथ समता का व्यवहार करने को कहा है।
इस प्रकार धर्मशास्त्र-सम्मत पाँच प्रकार के सूतकों को शैव धर्म में सीमित रूप में ही मान्यता दी गयी है। तब भी लोकव्यवहार में इनका पालन आवश्यक है।
पातक किसे कहते हैं?
जिस तरह जन्म के समय परिवार के सदस्यों पर सूतक लग जाता है उसी तरह परिवार के लिए सदस्य की मृत्यु के बाद सूतक का लग जाता है, जिसे पातक भी कहा जाता है। लेकिन जन्म-मरण दोनों को 'सूतक' शब्द से भी जाना जाता है। गरुण पुराण में सूतक शब्द नहीं प्रयोग करते हुए पातक शब्द का प्रयोग कर दिया गया। तब से लोग सूतक और पातक को अगल अलग मानने लगे। वास्तव में ये दोनों एक है क्योंकि दोनों (जन्म-मरण) में कर्म-धर्म का पालन नहीं किया जाता।
गरुण पुराण के अनुसार जब भी परिवार के किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो घर के सदस्यों को पुजारी को बुलाकर गरुण पुराण का पाठ करवाकर पातक के नियमों को समझना चाहिए। गरुण पुराण के अनुसार पातक लगने के १३वें दिन क्रिया कर के उस दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाना चाहिए। इसके बाद मृत व्यक्ति की सभी नई-पुरानी वस्तुओं (सामान), कपड़ों को गरीब और असहाय व्यक्तियों में बांट देना चाहिए।
जन्म पर सूतक में क्या होता है?
किसी के जन्म होने पर परिवार के लोगों पर १० दिन के लिए सूतक लग जाता है। इस दौरान परिवार का कोई भी सदस्य धार्मिक कार्य नहीं करता है। जैसे मंदिर नहीं जाना, पूजा-पाठ नहीं करना। इसके अलावा बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री का रसोईघर में जाना या घर का कोई काम करना वर्जित होता है। जब घर में हवन हो जाए उसके बाद वो काम कर सकती है।
जन्म के पश्चात सूतक का वैज्ञानिक तर्क
आजकल हर घर की महिलाओं को परिवार के सदस्यों की जरूरतों को पूरा करना होता था। लेकिन बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं का शरीर बहुत कमजोर हो जाता है। इसलिए वो काम करने की स्थिति में नहीं होती। इसलिए उन्हें हर संभव आराम की जरूरत होती है। इसलिए सूतक के नाम पर इस समय उन्हें आराम दिया जाता था ताकि वे अपने दर्द और थकान से बाहर निकल पाएं।
चार वर्ण के लिए सूतक अलग-अलग माना गया है।
जैसा की आप जानते है की जन्म देने के बाद महिलाओं का शरीर बहुत कमजोर हो जाता इसीलिए चार वर्ण में सूतक के दिन भी अलग-अलग है। जैसा की हम जानते है कि ब्राह्मण स्त्री को काम काम है इसलिए ब्राह्मण के लिए यह समय १० दिन का। क्षत्रिय स्त्री क्योंकि वो महारानी होती है इसलिए क्षत्रिय के लिए १५ दिन। वैश्य (व्यापारी) स्त्री के लिए २० दिन और क्योंकि
बच्चे को संक्रमण का खतरा
जब बच्चे का जन्म होता है तो उसके शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी नहीं हुआ होता। वह बहुत ही जल्द संक्रमण के दायरे में आ सकता है, इसलिए १०-३० दिनों की समय में उसे बाहरी लोगों से दूर रखा जाता था, उस बच्चे को घर से बाहर नहीं लेकर जाया जाता है। कुछ लोग सूतक को एक अंधविश्वास मानते है लेकिन इसका उद्देश्य स्त्री के शरीर को आराम देना और शिशु के स्वास्थ्य का ख्याल रखने है।
मृत्यु के पश्चात सूतक या पातक का वैज्ञानिक तर्क
किसी लंबी और घातक बीमारी या फिर दुर्घटना की वजह से या फिर वृद्धावस्था के कारण व्यक्ति की मृत्यु होती है। कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इन सभी की वजह से संक्रमण फैलने की संभावनाएं बहुत हद तक बढ़ जाती हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि दाह-संस्कार के पश्चात स्रान आवश्यक है ताकि श्मशान घाट और घर के भीतर मौजूद कीटाणुओं से मुक्ति मिल सके।
इसके अलावा उस घर में रहने वाले लोगों को संक्रमण का वाहक माना जाता है इसलिए १३ दिन के लिए सार्वजनिक स्थानों से दूर रहने की सलाह दी गई है। जैसा की हम जानते है कि हवन करने से वातावण शुद्ध होता है यह तो वैज्ञानिक भी मानते है। इसलिए घर में हवन होने के बाद, घर के भीतर का वातावरण शुद्ध हो जाता है, संक्रमण की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं, जिसके बाद 'पातक' की अवधि समाप्त होती है।
09:00 हैल्लो फ्रेण्ड्सzzz,
मित्रों, शास्त्रीय प्रमाण के अनुसार सूतक कितने प्रकार का होता है तथा किस प्रकार से हमारे ऊपर दुःप्रभाव डालता है? सूतक का तात्पर्य है अशौच या अशुद्धि। सूतक से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की अशुद्धियाँ होती है। शरीर का सूतक द्रव्य और क्षेत्र के कारण तथा मन राग-द्वेयादी विकारी परिणाम से अशुद्ध होता है इसलिए इस काल में शुभ कार्य करना वर्जित है ।।
क्योंकि एक व्यक्ति कि अशुद्धि से कई व्यक्ति और सम्पूर्ण वातावरण भी प्रभावित हो सकता है। जैसे एक बूंद नींबू के रस से पुरे दूध का स्वरुप परिवर्तित हो जाता है। सूतक भेद के अनुसार पहला है आर्तज अर्थात मृत्यु सम्बन्धी, दूसरा है सौतिक अर्थात प्रसूति सम्बन्धी और तीसरा आर्तव अर्थात ऋतुकाल सम्बन्धी । तत्सन्सर्गज अर्थात सूतक से अशुद्ध व्यक्ति के स्पर्श से भी दोष लगता है ।।
मित्रों, आर्तज अर्थात मृत्यु सम्बन्धी सुतक कैसे और किसके मरण से होता है। जैसे घर में रहने वाले सदस्यों जैसे कुटुम्बी, सेवक और पालतू जानवर के मृत्यु से भी सूतक लगता है। इनके मृत्यु से हुई अशुद्धि को आर्तज सूतक कहते है। अब इसके भी तीन भेद होते हैं, पहला सामान्य मृत्यु अर्थात आयु पूर्ण करके मृत्यु को प्राप्त होना ।।
दूसरा अपमृत्यु अर्थात दुर्भाग्य से जैसे प्राकृतिक आपदा, बाढ़, अग्नि, भूकंप, उल्कापात, बिजली आदि से, सर्पदंश, सिंह, युद्ध एवं दुर्घटना आदि के कारण हुई मृत्यु को अपमृत्यु कहते है। तीसरा आत्मघात से हुई मृत्यु जैसे सती होना, क्रोध वश कुएँ में गिरकर, नदी-तालाब में डूबकर मरना, छत से गिरना, विष खाना, फांसी लगाना, आग लगाना, गर्भपात आदि करवाना आत्महत्या की श्रेणी में ही आता है ।।
मित्रों, इन्ही कारणों से किसी दूसरों के प्राणों का हनन करना हत्या होता है परन्तु ये भी आत्महत्या से हुई मृत्यु की श्रेणी में ही आता है । इसके बाद आता है दूसरा सौतिक सूतक अर्थात प्रसूति सम्बन्धी सूतक । एक घर में रहने वाले सदस्यों कि प्रसूति होने से हुई अशुद्धि को सौतिक सूतक कहते है। इसके भी तीन भेद होते हैं, पहला साव सम्बन्धी सूतक अर्थात गर्भ धारण से तीन-चार माह तक के गर्भ गिरने को स्राव कहते है ।।
दूसरा पात सम्बन्धी सूतक अर्थात गर्भ धारण से पांच-छः मास तक के गर्भ गिरने को गर्भ पात कहते है। तीसरा प्रसूति सम्बन्धी सूतक अर्थात गर्भ धारण से सातवें से दशवें मास में माता के उदर से शिशु के बहार आने को प्रसूति या जन्म कहते है। अब तीसरा सूतक आर्तव अर्थात ऋतुकाल सम्बन्धी सूतक कहा जाता है। सामान्यतः बारह वर्ष से पचास वर्ष तक स्त्रियों का प्रत्येक माह में रक्त स्राव होता है ।।
मित्रों, इससे होने वाली अशुद्धि को आर्तव सूतक कहते है। इसे रजो दर्शन, रजो धर्म, मासिक धर्म भी कहते है। इस अवस्था में स्त्री को रजस्वला कहा जाता है, इसके 'भी २ भेद होते हैं। पहला प्राकृतिक स्राव अर्थात नियमित रूप से निश्चित तिथियों में होने वाला रक्तस्राव जो तीन दिन तक होता है उसे प्राकृतिक स्राव कहा जाता है। दूसरा स्त्रियों को रोगादिक विकार से नियमित काल के पहले रक्त स्राव होना या नियमित काल के बाद रक्त स्राव होना ।।
इस प्रकार अन्य कारणों से असमय में होने वाला रक्त स्राव विकृत साव कहलाता है। चौथा होता है तत्सन्सर्गज सूतक अर्थात अशुद्ध व्यक्ति के स्पर्श से जैसे उनका स्पर्श, उठना, बैठना, भोजन करना, शयन करना आदि से होने वाली अशुद्धि तत्सन्सर्गज सूतक कहलाती है। इसके भी तीन भेद होते हैं, पहला मृत व्यक्ति के स्पर्श से सूतक हो जाता है ।।
मित्रों, शमशान भूमि में अर्थी ले जाने से, साथ में जाने से, श्मशान भूमि में जाने वाले व्यक्ति के स्पर्श से एवं मरण सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग से होने वाली अशुद्धि। दूसरा प्रसूता स्त्री और बालक के स्पर्श से और प्रसूता स्त्री द्वारा उपयोग कि गयी वस्तु का स्पर्श प्रसूति सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों का संसर्ग करने से होने वाली अशुद्धि । तीसरा रजस्वला स्त्री का स्पर्श या उसके द्वारा उपयोग की गयी वस्तु को स्पर्श करने से होने वाली अशुद्धि ।।
इस प्रकार इतने कारणों से सूतक लगती है, परन्तु अशुद्धि का काल कितना होगा इसके बारे में विभिन्न शास्त्रों, आचार्यों, विद्वानों एवं लोक परंपरा के अनुसार मत-मतान्तर है जो अपने क्षेत्र की परम्परानुसार मानना चाहिए। सूतक वृद्धि एवं हानि से युक्त होता है, यह जन्म सम्बन्धी दस दिन तथा मरण सम्बन्धी बारह दिन का होता है ।।
मित्रों, प्रसूति स्थान की शुद्धि सूतक काल से लेकर एक मास में होती है जबकि गोत्रीजन की शुद्धि सूतक काल के बाद स्नान मात्र से हो जाती है। कुटुम्बीजनों की सूतक से शुद्धि १२ दिन बाद होती है। इसके बाद ही वो भगवान का अभिषेक, पूजन तथा पात्रदान आदि कर सकते है। प्रसूता स्त्री ४५ दिन में शुद्ध मानी जाती है, रजस्वला तीन दिन बाद शुद्ध होती है परन्तु धार्मिक कार्य हेतु पांचवे दिन के बाद ही शुद्ध मानी जाती है ।।
परन्तु शास्त्र कहता है, कि पर पुरुष के साथ व्यभिचार रत स्त्री जीवन पर्यन्त शुद्ध नहीं मानी जाती है। मित्रों, उपरोक्त अशुद्धि काल की सामान्य स्थिति है परन्तु सूतक किस-किस को लगेगा कितनी पीढ़ी तक लगेगा, कितने दिन तक लगेगा। इसके बारे में परम्परानुसार ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उनमें कुछ भेद है। जिसका पालन लोकरीति के अनुसार करना चाहिए ।।
मित्रों, कुटुम्बी जन अर्थात ३ पीढ़ी तक के बंधुओं को मृत्यु एवं प्रसूति का सूतक कमशः १२ दिन एवं १० दिन ही लगता है। चौथी से दशवी पीढ़ी तक यह सूतक १-१ दिन कम होता जाता है और दशवीं पीढ़ी का सूतक मात्र स्नान से ही निवृत्त हो जाता है। अब थोड़ी सी बात कर लेते हैं, कि ये सूतक आखिर लगता ही क्यों है ? किसी भी प्राणी की जब मृत्यु होती है, तब वह भय एवं पीड़ा से आतंकित होता है ।।
अति पीड़ा के इन क्षणों में शरीर की स्थिति अति उत्तेजित होती है । जिस से मस्तिष्क, हृदय, नाडी तंत्र प्रभावित होता है। इस प्रक्रिया में विकारी तत्व प्रभावित होने के साथ पसीना एवं मल मूत्र भी निष्काषित होता है। इस प्रक्रिया में कई विकारी तत्व रोग के कीटाणु भी शरीर से उत्सर्जित होते है। आभा मंडल विकृत होने के साथ वायोप्लाज्मा "organic Chemical" के कारण विकृत हो जाता है ।।
मित्रों, प्राणांत के बाद व्यक्ति के मरण स्थान पर बायोप्लाज्मा विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में विद्यमान रहता है। जिसका अपघटन तीन दिन में होता है, इसलिए तीन दिन की विशेष अशुद्धि मानी गयी है। मृत शरीर में असंख्य जीव उत्पन्न हो जाते है जिनका नाश शव जलने से होता है। अतः यह विशेष हिंसा का कारण माना गया है। इसलिए यह सूतक देहांत के बाद से १२ दिन तक माना गया है ।।
यही स्थिति प्रसूति के समय माता की होती है। प्रसव के समय उनकी मानसिक स्थिति विकृत हो जाती है। आर्त-रौद्र स्थितियों से नकारात्मक उर्जा उत्पन्न होती है। प्रसव के समय शारीरिक उत्तेजना से विकारी पदार्थ पसीने के साथ उत्सर्जित होते है। विकृत आभा मंडल की विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा अपघटित होने में तीन दिन लगते है। अतः सौरी "प्रसव स्थल का कार्यकाल तीन दिन का माना गया है ।।
आयुर्वेद के अनुसार प्रसव के समय झिल्ली तथा नाल के कुछ अवयव गर्भाशय में अशुद्धि के रूप में रह जाते है। जो दोषमुक्त रक्त स्राव के साथ तीन दिन तक बाहर निकलते रहते है। इसके बाद गर्भाशय के स्राव का वर्ण कुछ पीलापन लिए होता है जो गर्भाशय के दोष के रूप में दस दिन तक रिसता है। इस दोष को रजस्वला के रक्तस्राव के सामान ही अशुद्ध माना गया है ।।
जिस प्रकार रजस्वला स्त्री तीसरे दिन के बाद चौथे दिन शुद्ध होती है, उसी प्रकार प्रसूता ग्यारहवें दिन शुद्ध होती है। इसके बाद गर्भाशय को पूर्व स्थिति में आने में छः सप्ताह का समय लगता है। इसलिए प्रसूता की प्रसूता अवस्था आयुर्वेद के साथ साथ एलोपैथी भी छः सप्ताह मानता है ।।
प्रायश्चित्त संग्रह /153
ब्राह्मणक्षत्रियविड्शूद्रादिनैः शुद्धयंति पंचभिः।
दश-द्वादशभिः पंचादश व संख्याप्रयोगतः । 153।
ब्राह्मण पाँच दिन में, क्षत्रिय दश दिन में, वैश्य बारह दिन में, और शूद्र पंद्रह दिनों में पातक के दोष से शुद्ध होते हैं।
संसारी जीव संयोग और वियोग के तानो वानों से कर्म जाल बुनता है यही जाल उसके पतन का हेतु बनता है। संयोग से हर्षातिरेक में रागोत्पादक, वाही वियोग में विषादातिरेक में विकारी परिणामो को उदेव्लित करता है। अतिरेक, अविवेक और प्रमाद की और ले जाता है जो कि शारीरिक मानसिक भावनात्मक हिंसा का कारण बन जाता है।
जन्मसमय हर्ष, मरणसमय विषाद इस प्रकार जन्म और मरण दोनों स्थितियों में हर्ष और विषाद होना स्वाभाविक है इसकी तीव्रता तथा काल रागादिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जन्म समय पर सूतक एवं मरण समय पर पातक विचार माना गया है। सूतक की अवस्था में श्रावक आहारदानादि कार्य का निषेध किया है, अर्थात अशुद्ध माना गया है।
महापुराण वर्णन अनुसार
शास्त्रों में नवमी शताब्दी में जिनसेनाचार्य द्वारा रचित महापुराण में, तत्पश्चात आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती दशमी तथा आचार्य जयसेन ग्यारहवीं शताब्दी में रचित ग्रंर्थो में सूतक के समय निषेध रूप में वर्णित किया गया है।
शास्त्रीय प्रमाण के बाद देखना है की सूतक कितने प्राकर से हमारे ऊपर प्रभाव डालता है। सूतक का दोष कब तक और कितने समय तक रहता है।
सूतक तात्पर्य
सूतक का तात्पर्य है अशोच या अशुद्धि। सूतक से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की अशुद्धियाँ होती है। शरीर सूतक द्रव्य और क्षेत्र से तथा मन राग-द्वेषादी विकारी परिणाम से अशुद्ध होता है। इस काल में शुभ कार्य करना वर्जित है।
क्योंकि एक व्यक्ति कि अशुद्धि से कई व्यक्ति और सम्पूर्ण वातावरण भी प्रभावित हो सकता है। जैसे एक बूंद नींबू के रस से पुरे दूध को परिवर्तन हो जाता है।
१. आर्तज मरण सम्बन्धी
२. सौतिक प्रसूति सम्बन्धी
३. आर्तव ऋतुकाल सम्बन्धी
४. तत्सन्सर्गज सूतक से अशुद्ध व्यक्ति का संसर्ग
आर्तज मरण सम्बन्धी (पातक)
घरमे निवास करने वाले प्राणियों (कुटुम्बी, सेवक और पालतू जानवर) के मरण से हुई अशुद्धि को आर्तज सूतक कहते है। इसके तीन भेद है।
अ) सामान्य मरण: आयु पूर्ण करके मरण को प्राप्त होना। ब.) अपम्रत्यु अथवा दुर्भाग्य प्राकृतिक आपदा, बाढ़, अग्नि, भूकंप, उल्कापात, बिजली आदि से, सर्पदंश, सिंह, युद्ध एवं दुर्घटना के कारण मरण को अपम्रत्यु मरण कहते है।
स) आत्मघात मरणः- सती होना, क्रोध केवश कुएँ में गिरना नदी-तालाब में डूबकर मरना, छत से गिरना, विष खाना फांसी लगाना, आग लगाना, गर्भपात करवाना आत्म घात मरण ही है। इन्ही कारणों से अन्य के प्राणों का हनन करना भी आत्म घात मरण ही है।
सौतिक प्रसूति सम्बन्धी
घर में निवास करने वाले प्राणियों कि प्रसूति होने से हुई अशुद्धि को सौतिक सूतक कहते है। इसके तीन भेद है-अ) स्राव सम्बन्धी गर्भ धारण से तीन-चार माह तक के
गर्भ गिरने को स्राव कहते है। ब.) पात सम्बन्धी : गर्भ धारण से पांच-छः मास तक के
गर्भ गिरने को गर्भ पात कहते है। स) प्रसूति सम्बन्धी :- गर्भ धारण से सातवे से दशवे मास में माताके उदार से शिशु के बहार आने को प्रसूति या जन्म कहते है।
आर्तव ऋतुकाल सम्बन्धी सामान्यतः बारह वर्ष से पचास वर्ष तक स्त्रियों में प्रत्येक माह में रक्त स्राव से होने वाली अशुद्धि को आर्तव कहते है। इसे रजो दर्शन, रजो धर्म, मासिक धर्म भी कहते है। इस अवस्था में स्त्री को राजस्वला कहलाती है। इसके २ भेद है अ) प्रकृत स्राव : नियमित रूप से नियमित तिथियों में होने वाला रक्तस्राव जो तीन दिन तक होता है, प्रकृत स्राव कहलाता है।
ब) स्त्रियों को रोगादिक विकार से नियमित काल के पहले रक्त स्राव होना या नियमित काल के बाद रक्त स्राव होना। योवन अवस्था में भी नियमित काल के पहले रक्त स्राव हो सकता है. इस प्रकार अन्य कारणों से असमय होने वाला रक्त स्राव विकृत स्राव कहलाता है।
तत्सन्सर्गज सूतक से अशुद्ध व्यक्ति का संसर्ग सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग (स्पर्श, उठना, बैठना, भोजन करना, शयन करना आदि) से होने वाली अशुद्धि तत्सन्सर्गज सूतक कहलाती है। इसके तीन भेद है। अ) मृत व्यक्ति के स्पर्श से शमशान भूमि में अर्थी ले जाने से, साथमे जाने से, श्मशान भूमि में जाने वाले व्यक्ति के स्पर्श से एवं मरण सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग से होने वाली अशुद्धि।
ब) प्रसूता स्त्री और बालक का स्पर्श, प्रसूता स्त्री द्वारा उपयोग कि गयी वस्तु का स्पर्श प्रसूति सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों का संसर्ग करने से होने वाली अशुद्धि।
स) रज स्वला स्त्री का स्पर्श या उसके द्वारा उपयोग की गयी वस्तु को स्पर्श करने से होने वाली अशुद्धि। इस प्रकार इतने कारणों से सूतक अशुद्धि होती है, परन्तु अशुद्धि का काल कितना होगा इसके बारे में विभिन्न शास्त्रों , आचार्यों, विद्वानों एवं लोक परंपरा के अनुसार मत-मतान्तर है जो क्षेत्र की परम्परानुसार मानना चाहिए।
सूतक काल
सूतक वृद्धि एवं हानि से युक्त होता है, यह जन्म सम्बन्धी दस दिन तथा मरण सम्बन्धी बारह दिन का होता है। प्रसूति स्थान की शुद्धि सूतक काल के बाद एक मास में होती है जबकि गोत्रीजन सूतक काल की बाद मात्र स्नान मात्र से शुद्धि हो जाती है। कुटुम्बीजनों की सूतक से शुद्धि १२ दिन बाद होती है। इसके बाद वह भगवान् का अभिषेक, पूजन
तथा पात्रदान कर सकते है। प्रसूता स्त्री ४५ दिन में शुद्ध मानी गयी है, रजस्वला तीन दिन बाद शुद्ध होती है परन्तु धार्मिक कार्य हेतु पांचवे दिन ही शुद्ध मानी जाती है, पर पुरुष के साथ व्यभिचार रत स्त्री जीवन पर्यन्त शुद्ध नहीं मानी जाती है। यह अशुद्धि काल की सामान्य स्थिति है
सूतक किसको लगेगा
सूतक किस किस को लगेगा कितनी पीढ़ी तक लगेगा, कितने दिन तक लगेगा। इसके बारे में परम्परानुसार ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उनमे कुछ भेद है, जिसका पालन लोकरीति अनुसार करना चाहिए ।
कुटुम्बी जन या आसन्न (३ पीढ़ी तक के बंधुओं को मरण एवं प्रसूति का सूतक कमशः १२ दिन एवं १० दिन का होता है।
अनासन्न कुटुम्बी जन (चोथी से दशवी पीढ़ी) तक यह सूतक चार्ट में दर्शाए अनुसार १-१ दिन कम होता जाता है और दशवीं पीढ़ी मात्र स्नान से शुद्ध हो जाती है।
पातक पालन रहस्य अब हम सूतक की स्थिति पर विचार करे। जब प्राणी का मरण हो होता है तब वह भय एवं पीड़ा से आतंकित होता है, जिससे वह आर्त रौद्र परिणामो के कारण खोटी लेश्या मय हो जाता है अति पीडा के इन क्षणों में शरीर की स्थिति अति उत्तेजित होती है, जिस से मस्तिष्क, हृदय, नाडी तंत्र प्रभावित होता है, इस प्रक्रिया में विकारी तत्व प्रभावित होने के साथ पसीना एवं मल मूत्र भी निष्काषित हो जाता है।
मानव विचारो एवं भावना स्तिथि क्षत विक्षत होती है। इस प्रक्रिया में कई विकारी तत्व रोग के कीटाणु भी शरीर से उत्सर्जित होते है। आभा मंडल विकृत होने के साथ वयोप्लाज्मा भी विकृत हो जाता है। प्राणांत के बाद व्यक्ति के मरण स्थान पर बायोप्लाज्मा विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा के रूप में विद्यमान रहता है जिसका अपघटन तीन दिन में होता है। इसलिए तीन दिन की विशेष अशुद्धि मानी गयी है। मृत देह में अंतर्मुहूत में असंख्य जीव उत्पन्न हो जाते है जिनका घात शव जलने से होता है। अतः यह विशेष हिंसा का कारण माना गया है। इसलिए सूतक देहांत से बाद १२ दिन तक माना गया है।
सूतक पालन रहस्य यही स्थिति प्रसूति के समय माता की होती है, प्रसव के समय उनकी मानसिक स्थिति विकृत हो जाती है, आर्त रोद्र परिणामो से खोटी लेश्या हो जाती है। प्रसव के समय शारीरिक उत्तेजना से विकारी पदार्थ पसीने के साथ
उत्सर्जित होते है, विकृत आभा मंडल की विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा अपघटित होने में तीन दिन लगते है। अतः सोर का कार्यकाल तीन दिन का माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार प्रसव के समय झिल्ली तथा नाल के कुछ अवयव गर्भाशय में अशुद्धि के रूप में रह जाते है। जो दोषमुक्त रक्त स्राव के साथ तीन दिन तक बाहर निकलते रहते है। इसके बाद
गर्भाशय के स्राव का वर्ण कुछ पीलापन लिए होता है जो गर्भाशय के दोष के रूप में दस दिन तक रिसता है। इस दोष को रज स्वला के स्राव के सामान ही अशुद्ध मानते है, जिस प्रकार रज स्वला चोथे दिन शुद्ध हो जाती है उसी
प्रकार प्रसूता ग्यारहवें दिन शुद्ध होती है। इसके बाद गर्भाशय को पूर्व स्थिति में आने ने छ सप्ताह का समय लगता है। इसलिए प्रसूता की प्रसूता अवस्था आयुर्वेद के साथ साथ एलोपैथी भी छः सप्ताह मानता है।
१ जन्म का सूतक दस दिन तक माना जाता है।
1 Janma kā sūtaka dasa dina taka mānā jātā hai |
२. यदि स्त्री का गर्भपात (पाँचवें छठे महीने में) हो, तो जितने महीने के गर्भ का पात हो, उतने दिन का सूतक माना जाता है।
2. Yadi strī kā garbhapāta (pārmcavērm-chathē mahīnē mēm) hō, tō jitanë mahīnē kē garbha kā pāta hō, utanë dina kā sūtaka mānā jātā hai |
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३. प्रसूता स्त्री को ४५ दिन का सूतक होता है, कहीं-कहीं चालीस दिन का भी माना जाता है। प्रसूति स्थान एक मास तक अशुद्ध है।
3. Prasūtā strī kō 45 dina kā sūtaka hötä hal, kahīrm-kahīm cālīsa dina kā bhī mānā jātā hail Prasūtisthāna ēka māsa taka aśud'dha hai |
४. रजस्वला स्त्री चौथे दिन पति के भोजनादि के लिये शुद्ध होती है, परन्तु देव-पूजन, पात्रदान के लिये पाँचवें दिन शुद्ध होती है । व्यभिचारिणी स्त्री के सदा ही सूतक रहता है।
4. Rajasvalā strī cauthë dina pati kē bhōjanādi kë liyē śuddha hōtī hai, parantu dēva-pūjana, pātradāna kē liyē pāmcavēm dina śuddha hōtī hai. Vyabhicāriņī strī kē sadā hĩ sūtaka rahatā hai |
५. मृत्यु का सूतक तीन पीढ़ी तक १२ दिन का माना जाता है। चौथी पीढ़ी में छह दिन का, पाँचवीं-छठी पीढ़ी तक चार दिन का, सातवीं पीढ़ी में तीन दिन, आठवीं पीढ़ी में एक दिन-रात, नवमी पीढ़ी में स्नान-मात्र में शुद्धता हो जाती है। 5. Mṛtyu kā sūtaka tīna pīṛhī taka 12 dina kā mānā jātā hai. Cauthī pīṛhī mēm chaha dina kā, pārmcavīm-chathī pīrhī taka cāra dina kā, sātavīm pīṛhī mēṁ tīna dina, athavīri pīshī mēṁ ēka dina-rāta, navamī pīſhĩ mēm snäna-mätra mērṁ śud'dhatā hō jātī hai |
६. जन्म तथा मृत्यु का सूतक गोत्र के मनुष्य का पाँच दिन का होता है। तीन दिन के बालक की मृत्यु का दस दिन (माता-पिता को), आठ वर्ष के बालक की मृत्यु पर दस दिन परिवार को माना जाता है। इसके आगे बारह दिन का सूतक माना जाता है।
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6. Janma tathā mṛtyu kā sūtaka gōtra kē manuşya kā pāmca dina kā hōtā hai | Tinadina kë bālaka kī mṛtyu kā dasa dina (mātā-pitā kō), ātha varşa kē bālaka kī mṛtyu para dasa dina parivāra kō mānā jātā hai | Įsakē āgē bāraha dina kā sūtaka mānā jātā hai |
७. अपने कुल के किसी गृहत्यागी का संन्यासमरण या किसी कुटुंबी का संग्राम में मरण हो जाय, तो एक दिन का सूतक माना जाता है। 7. Apanë kula kë kisĩ gṛhatyāgī kā sann'yāsamaraņa ya kisī kutumbī kā sańgrāma mēm maraņa hō jāya, tō ēka dina kā sūtaka mānā jātā hai |
८. यदि अपने कुल का कोइ देशांतर में मरण करे और १० दिन के भीतर खबर सुने, तो शेष दिनों का ही सूतक मानना चाहिये । यदि १० दिन पूर्ण हो, गये हों तो स्नान-मात्र सूतक जानो ।
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8. Yadi apanē kula kā kōi dēśāntara mēṁ maraņa kare aura 10 dina kē bhītara khabara sunē, tō śēşa dinōm kā hĩ sūtaka mānanā cāhiyēļ Yadi 10 dina pūrņa hồ, gayẽ hôm tō snāna-mātra sūtaka jānō |
९. गौ, भैंस, घोड़ी आदि पशु अपने घर में जने, तो एक दिन का सूतक और घर के बाहर जने, तो सूतक नहीं होता ।
9. Gau, bhainsa, ghōrī ādi paśu apanē ghara mēṁ janë, tō ēka dina kā sūtaka aura ghara kē bāhara janë, tō sūtaka nahīm hōtā |
१०. बच्चा हुए बाद भैंस का दूध १५ दिन तक, गाय का दूध १० दिन तक, बकरी का ८ दिन तक अभक्ष्य (अशुद्ध) होता 1월 10. Bacca hu'ē bāda bhainsa kā dūdha 15 dina taka, gāya kā dūdha 10 dina taka, bakarī kā 8 dina taka abhakşya (aśuddha) hōtā hai |
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देश-भेद से सूतक-विधान में कुछ न्यूनाधिक भी होता है, परन्तु शास्त्र की पद्धति मिलाकर ही सूतक मानना चाहिए । Dēśa-bhēda sē sūtaka-vidhāna mēṁ kucha n'yūnādhika bhī hōtā hai, parantu śāstra kĩ pad'dhati milākara hī sūtaka mānanā cāhi'ē |
10:03J.
: क्या मनुष्य अपनी योनि का निर्धारण स्वयं कर सकता है ?
क्या है इसका वायो वैज्ञानिक रहश्य ?
यह सत्य है कि मनुष्य का जीवन बहुत पुण्य कर्म से मिलता है। मनुष्य की म्रत्यु के समय यह निर्धारित हो जाता है कि मनुष्य कौन सी योनि में जन्म लेगा ।
मरते समय आत्मा शरीर के 9 द्वारो मे से किसी एक द्वार से बाहर जाती है। और 10वा द्वार ब्रह्मरंध्र होता है
1- अगर आत्मा लिंग या योनि के रास्ते से बाहर जाता है तो मनुष्य को जन्म उन योनियो मे मिलता है जो जीने और मरने में लगी रहती है। जो एक दिन मे जन्म भी लेती है और मर भी जाती है।
2- अगर आत्मा गुदा के रास्ते से बाहर जाता है तो ऐसे मनुष्य को नरकीय योनि प्राप्त होती है। नरकीय योनि वो होती है जो हमेशा अंधेरे में रहती है। उनको कभी सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता है।
3- अगर आत्मा मुख के रास्ते से बाहर जाता है तो ऐसे मनुष्य को विषेले जीव जन्तु कीड़े की योनि की प्राप्त होती है। जैसे साँप विछू गुहेरा इत्यादि ।
4- अगर आत्मा नाक के रास्ते से बाहर जाता है तो ऐसे मनुष्य को मनुष्य की योनि ही प्राप्त होती है। नाक के दो स्वर होते है एक चन्द्र स्वर और दूसरा सूर्य स्वर होता है। अगर चन्द्र स्वर से आत्मा जाता है तो तमोगुण
प्रधान जीवन और सूर्य स्वर से जाता है तो सतोगुण प्रधान जीवन मिलता है। 5- अगर आत्मा कानो के रास्ते बाहर जाता है तो ऐसे मनुष्य को पक्षी योनि प्राप्त होती है।
6- अगर आत्मा नेत्रो के रास्ते बाहर जाता है तो ऐसे मनुष्य को जलचर योनि प्राप्त होती है।
7- अगर आत्मा ब्रह्मरंध्र के रास्ते बाहर जाता है तो ऐसे मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होता है।
आखिर इन सब बातों का कोई वैज्ञानिक आधार है।
जी हाँ आप इसको एक वैज्ञानिक उहारण के माध्यम से समझ सकते हो । जब आपके कोप्प्पुटर की हार्ड डिस्क फुल् हो जाती है तो कम्प्युटर हैंग हो जाता है। और मरने की स्थिति में आ जाता है और कोप्प्पुटर काम नहीं करता है। फिर आप उसकी मेमोरी मे से कुछ चीज़ों को फोरमिट कर देते है । अब ध्यान देने वाली बात यह है कि आपने कम्प्युटर मे से क्या चीज़ फोर्मिट की है उसी के आधार पर कम्प्युटर जीवित हो जाता है। अगर आपने गाने फोर्मिट किए है तो गाने के कारण ही आपका कम्प्युटर का पुनर्जन्म हो
सका है। आप अपना महत्वपूर्ण डाटा कभी नहीं फोर्मिट करते है। अगर आपने महत्वपूर्ण डाटा फोर्मिट किया है तो कम्प्युटर का पुनर्जन्म अच्छे डाटा के कारण हुआ है।
ऐसे ही मनुष्य जब म्रत्यु को प्राप्त होने की स्थिति में होता है तो मनुष्य की हार्ड डिस्क यानि चित मे जो सबसे ज्यादा संख्या मे चीज़ संचित होती है उनके आधार पर पुनर्जन्म मिलता है। अगर मनुष्य की डाटा फ़ाइल मे पाप का डाटा ज्यादा संचित है तो कीड़े मकोड़े और पुण्य का डाटा संचित है तो मोक्ष प्राप्त होता है।
मरते समय आत्मा शरीर के उन कर्मो को साथ लेकर बाहर निकलती है जो सबसे ज्यादा मात्रा मे मनुष्य ने अपने जीवन मे किए होते है। और कर्मो के कारण आत्मा का बाहर निकालने का द्वार निर्धारित होता है। इसलिए मनुष्य को पुण्य का डाटा संचित करना चाहिए। अगर आपने पुण्य कर्म का डाटा संचित किया है तो आपको अपनी इच्छा के अनुसार ही पुनर्जन्म मिलेगा
मेरा ये मानना हे की यदि ऊपर के कोई भी रन्ध्र से आत्मा निकलती है तो वो मनुष्य की योनि को ही प्राप्त होगा केवल ब्रम्हरन्धर से निकली आत्मा का ही मोक्ष होता हे और निचे के कोई भी रन्ध्र से निकली आत्मा ही पशु पक्षी या और कोई अधोगति means मनुष्य की योनि नही व् दूसरी कोई योनि मिल सकती है।। ये मेरी सोच हे।। गलती हो तो क्षमा करे।
astrologer ramdeo pandey द्वारा 30th October 2015 पोस्ट किया गया
OCT
30
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सुतक
◆◆ सुतक-पसूतक लग गया, अब मंदिर नहीं जाना तक ऐसा कहा-सुना तो बहुत बार, किन्तु अब इसका अर्थ भी समझ लेना ज़रूरी है !!!
सूतक
◆◆- सूतक का सम्बन्ध "जन्म के" निम्मित से हुई अशुद्धि से है!
जन्म के अवसर पर जो नाल काटा जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप "सूतक" माना जाता है !
◆◆- जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता :-
10:04.
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जेनरल नालेज
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सिख धर्म 'सूतक' और 'पातक' के पालन को मना करता है: जन्म और मृत्यु के कारण होने वाली अशुद्धता
07. 2014.05:55
सिख धर्म 'सूतक' और 'घातक' के पालन की मना करता है: जन्म और मृत्यु के कारण होने वाली अशुद्धता
डॉ अमृत कौर
सूतक शब्द की जड़ें 'कालिख और' परसूत है जिसका अर्थ है जन्म लेना या छुड़ाना। पातक शब्द का मूल 'पात' है जिसका अर्थ है उखाड़ फेंकना या समाप्त करना।
डॉ अमृत कौर
हिंदू शास्त्रों के अनुसार सूतक का अर्थ है बच्चे के जन्म के कारण होने वाली अशुद्धता या अनुष्वान अशुद्धता और पातक का अर्थ है किसी व्यक्ति की मृत्यु के कारण होने वाली अशुद्धता या अनुष्ठान अशुद्धता।
सूतक और पातक का पालन करने वाले सिख अज्ञानी हैं। उपरोक्त चर्चा यह स्पष्ट करती है कि सिख धर्म हमें सभी प्रकार के अंधविश्वासों से दूर रहने की आज्ञा देता है। सिख धर्म अपने आप में एक अनूठा और आधुनिक धर्म है जो अन्य सभी धर्मों से अलग है। इन पवित्र ग्रंथो के अनुसार सूतक की अवधि अर्थात वह
मल जो सभी
सगे
सम्बन्धियों को अपवित्र करता है, जातक की जाति पर निर्भर करता है। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के लिए इस अपवित्रता की अवधि लगातार 11 दिन, 13 दिन, 17 दिन और 30 दिन है।
मनुस्मृति के अनुसारकिसी व्यक्ति की मृत्यु के कारण होने वाली अशुद्धता पितृ पक्ष में सीधे वंश में सभी व्यक्तियों को प्रभावित करती है जो सात पीढ़ी ऊपर और सात पीढ़ी नीचे हैं। दूसरे शब्दों में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो एक ओर उसके (1) पिता (ii) दादा-दादी (1) पिता के दादा-दादी (IV) उसके दादा-दादी के दादा-दादी (V) परदादा-
अपने परदादा के पिता (vi) अपने परदादा के परदादा और (vii) अपने परदादा के परदादा के परदादा। दूसरी ओर, यह मलिनता उसके (1) पुत्र (a) पौत्र (1) उसके पुत्र के पौत्र (iv) उसके पौत्र के पौत्र (V) उसके पौत्र के प्रपौत्र से चिपक जाती है (vi) अपने परपोते के परपोते और (vii). अपने परपोते के परपीते के परपोते।
लघु अत्रे संहिता के अनुसार जब कोई व्यक्ति परिवार में मृत्यु या पुत्र के जन्म के बारें में सुनता है तो वह जहां कहीं भी होता है, पानी में डूब जाता है। (अध्याप 5)
Hoy इसका मतलब यह है कि जब कोई व्यक्ति परिवार में मृत्यु या पुत्र के जन्म के बारे में सुनता है, बाहे वह कहीं भी हो, भले ही वह विदेश में हो, पूरे कपड़े पहने हुए पानी में डूब जाना चाहिए क्योंकि सूतक और पातक रहते हुए भी उससे चिपके रहते हैं। एक विदेशी देश
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि स्मृतियों हिन्दुओं के वे धार्मिक ग्रंथ हैं जिन्हें तपस्वियों ने अपने पूर्वजों के उपदेशों की स्मृतियों के आधार पर लिखा है। ये पवित्र ग्रंथ कई हजार साल पुराने हैं। वे असंख्य हैं लेकिन इनमें से मुख्म 31 स्मृतियों में मनुस्मृति, लघुस्मृति, अत्रे, वृद्ध अत्रे, विष्णु, लघुहरीत और वृद्ध हरीत शामिल हैं।
अत्रे स्मृति शास्त्र के अनुसार पातक की अवधि अर्थात परिवार में मृत्यु के कारण जो अशुद्धता होती है वह इस प्रकार है: ब्राह्मण 10 दिन, क्षत्रिय 12 दिन, वैश्य 15 दिन और शूद्र 30 दिन। कुछ स्मृतियों में इन जातियों की अपवित्रता की अवधि क्रमशः 12 दिन, 13 दिन, 17 दिन और 30 दिन बताई गई है।
हिंदू धर्म में मुख्म मृत्यु अनुष्ठानों में से एक सिर मुंडवाना है.
जिसमें मृतक का बेटा अपना सिर मुंडवाता है। इसके बिना अन्य मृत्यु अनुष्ठान शुरू नहीं किए जा सकते। ऐसा माना जाता है कि सिर मुंडवाने कसे वह रास्ता साफ हो जाता है जिससे मृतक की आत्मा की यात्रा करनी पड़ती है। कभी-कभी, परिवार में एक से अधिक पुरुष सदस्य अपना सिर मुंडवा लेते हैं। लेकिन वर्तमान में कार्यालय जाने वाले व्यक्ति इस अनुष्ठान का पालन नहीं करते हैं। ब्राह्मण मृत व्यक्ति के घर में भोजन करना पाप मानते हैं।
सिख धर्म में, न तो बच्चे का जन्म और न ही परिवार में मृत्यु को किसी भी तरह के अपवित्रता का कारण माना जाता है। मनुस्मृति के अध्याय 5 में सूतक और पातक के कई सिद्धांतों
को सूचीबद्ध किया गया है। इसमे शामिल है। दस दिन के बाद ब्राह्मण बारह के बाद क्षत्रिय, पंद्रह के बाद वैश्य और एक महीने के बाद एक शूद्र शुद्ध हो जाता है। (अध्याय 5. श्री
83)
चूंकि मृत्यु के कारण यह अशुद्धता (सभी) सपिन्दों के लिए निर्धारित है. [1] वैसे ही इसे जन्म पर (धारण) उन लोगों द्वारा किया जाएगा जो पूरी तरह से शुद्ध होने की इच्छा रखते हैं। (अध्याय 5, श्री 67)
(या जबकि) मृत्यु के कारण अशुद्धता सभी (सपिंडों) के लिए आम है, जो केवल माता-पिता पर जन्म (गिरने) के कारण होती है. (या) यह केवल माता पर गिरेगा, और पिता स्नान करने से बुद्ध हो आएगा (अध्याय 5. श्री 62)
यह सपिन्दों में मृत्यु के कारण अशुद्धता (यह) दस दिन, (या) हड्डियों को एकत्र किए जाने तक (या) केवल तीन दिन या एक दिन के लिए ठहराया जाता है। (अध्याय 5, श्री 59)
जो मनुष्य (सपिंडा) रिश्तेदार की मृत्यु के बारे में सुनता है, या दस दिन (अशुद्धता बीतने के बाद) के बाद पुत्र के जन्म के बारे में सुनता है. वह अपने वस्त्रों को पहनकर स्नान करके पवित्र हो जाता है। (अध्याप 5, श्री 77)
जब (एक बच्चा) दांत वाले मर जाता है, या कि दांत निकलने से पहले (संस्कार) मुंडन (कुदकरण) या (दीक्षा का), सभी रिश्तेदार (बच्चे) अशुद्ध हो जाते हैं, और जन्म पर (एक बच्चे का) वही (नियम) निर्धारित है। (अध्याय 5, श्री 58)
(मृत्यु होने पर) जिन बच्चों का मुंडन (कुड़ाकर्मण) नहीं किया गया है, (सपिंडा) को एक (दिन और रात में पवित्र घोषित किया जाता है (मृत्यु पर) जिन्होंने मुण्डन प्राप्त किया है (लेकिन दीक्षा नहीं, कानून) तीन दिनों के बाद शुद्धिकरण (होता है) का आदेश देता है। (अध्याय 5. श्री 67)
यह जो सुन सकता है कि दूर देश में रहने वाले (एक रिश्तेदार) की मृत्यु हो गई है. दस से पहले उसकी मृत्यु के बाद दिन बीत चुके हैं। शेष दस (दिन और) रातों की अवधि के लिए अशुद्ध होगा। (अध्याय 5. एसएच 75)
यदि दस दिन बीत गए, तो वह तीन (दिन और रातों में अशुद्ध रहे, लेकिन अगर एक साल बीत गया (मृत्यु के बाद से, तो वह केवल स्नान करने से ही पवित्र हो जाता है। (अध्याय 5. श्री 763
यदि कोई शिशु (जिसके दांत नहीं हैं), या (वयस्क रिश्तेदार जो सपिंडा नहीं है, किसी दूर देश में मर जाता है. तो व्यक्ति अपने कपड़ों में स्नान करने के बाद एक बार शुद्ध हो जाता है। (अध्याय 5, श्री 78) सूतक और पातक के अलावा मनु ने कुछ अन्य अशुद्धियों को
सूचीबद्ध किया है।
जिस ब्राद्वाण ने मनुष्य की हड्डी को छू लिया है, जिस पर ची लगी रहती है, वह स्नान करने से पवित्र हो जाता है। अगर वह चीं से मुक्त हो, पानी की चुस्की लेने से और गाय को छूने (बाद में) या सूरज को देखने से। (अध्याय 5, एसएच 87)।
सिख धर्म सुल्क' और घाटक में विश्वास को त्याग देता है और उन्हें शुद्ध अंधविश्वास मानता है। सिया गुरुओं ने स्पष्ट किया है कि यह कल्पना करना कि जन्म और मृत्यु किसी भी अशुद्धि का कारण है. विशुद्ध रूप से अंधविश्वास पर आधारित है। श्री गुरु नानक देव जी ने घोषणा की है कि.
जे कर सूतक मन्त्रिया सब ताई सूतक हो।
गोहे अताई लकरी और कीरा हो।
जेटे दाने एन के जिया बज न कोए। पहली पानी जियो है जीत हरिया सब कोई। सूतक कीओ कर राखियां सूतक पवई स्सी। नानक सूतक एव न उतराई जियान उतरे थो ||1||
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 472)
इसका अर्थ यह है कि यदि कोई अपवित्रता की अवधारणा को स्वीकार करता है तो हर जगह अपवित्रता है। गोबर और लकड़ी में कीड़े होते हैं। मकई के सभी अनाज में जीवन होता है। पहला, जल में ही जीवन है जिससे बाकी सब कुछ हरा-भरा हो जाता है। शुद्धता कैसे बनी रह सकती है? यह हमारी रसोई को छूता है। इस प्रकार अर्थात् अन्धविश्वास में लिप्त होकर अशुद्धता को दूर नहीं किया जा सकता।
केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही इसे थी सकता है।
मन का सूतक लोभ है जिल्ला सूतक कुर।
अखिल सूतक वैखना पर तारिया पर धन रूप।
कच्ची सूतक कन्न पाई लाईतबारी खाही। नानक हंसा आदमी बढ़े जाम पुर जाही ||2|| (श्री गुरु ग्रंथ साहिब, पृह 472)
अर्थात् लोभ से मन अशुद्ध होता है, असत्य से जीभ अशुद्ध होती है, दूसरे की पत्नी और उसके धन को देखने से आंखें अशुद्ध होती हैं. दूसरों की निन्दा सुनने से कान अशुद्ध होते हैं और जो व्यक्ति इन सभी कृत्यों से अपवित्र होते हैं वे नरक में जाते हैं।, मौत के शहर से बंधे और बंधे हुए, भले ही वे हंसों की तरह सुंदर हों।
सबो सूतक भरम है दुजाई लगाय
जमान मरना हुकम है भनई अवाई जाएं खाना पीना पचितर है दिनों रिजक संभाही
नानक जिन्ही गुरुमुख बुझिया तिन्हा सूतक नहीं ||3|| (श्री गुरु ग्रंथ साहिन, पृष्ठ 472)
श्री गुरु नानक देव जी घोषणा करते हैं कि सभी प्रकार की
अशुद्धियाँ अंधविश्वास और द्वैत से उत्पन्न होती है। जन्म और मृत्यु ईश्वर की आज्ञा से होते हैं। उनकी मर्जी से ही हम इस दुनिया में आते हैं और यहां से चले जाते हैं। पीने और खाने की चीजें शुद्ध हैं क्योंकि भगवान सभी को पोषण देते हैं। गुरुमुखों अर्थात गुरुमुखी व्यक्तियों से अशुद्धता नहीं चिपकती क्योंकि वे इन तथ्यों को समझते हैं।
श्री गुरु अमर दास जी ने घोषणा की है किः
मन का सूतक दूजा भाओ।
भरे भूले आओ जाओ ||1||
मनमुख सूतक कब न जाए।
जिचार सबद नाभिजय. हर काई ||1||
सबो सूतक जेता मोह आकार।
मार मार जामई वरो बार ||2||
सूतक अगन पौनई पानी माही।
सूतक भोजन जेता किसी ||3||
सूतक करम न पूजा हो।
नम रेट मैन निर्मल हो। ||4||
सतगुर सेवई सूतक जाए।
मराई ना जन्माई काल ना खाए ||5||
(श्री गुरु ग्रंथ साहिम, पृष्ठ 229)
इसका अर्थ है कि द्वैत का प्रेम मन का प्रदूषण है। संदेह से मोहग्रस्त होकर लोग पुनर्जन्म में आते हैं और चले जाते हैं। मनमुखों (स्व-इच्छुक व्यक्तियों) के मन का प्रदूषण तब तक दूर नहीं होगा जब तक वे सबंद और भगवान के नाम पर ध्यान नहीं देते। सभी निर्मित प्राणी भावनात्मक लगाव से दूषित होते हैं, वे मरते हैं और बार-बार मरने के लिए ही जन्म लेते हैं। मनमुख के लिए अग्नि, वायु और जल प्रदूषित होते हैं और वे जो भोजन करते हैं वह भी प्रदूषित होता है। कोई भी कर्मकांड या देवताओं की पूजा करने से उस व्यक्ति के मन को शुद्ध नहीं
किया जा सकता है जो भ्रम से ग्रस्त है। नाम के साथ जुड़ने पर मन बेदाग हो जाता है, प्रभु का नाम। सच्चे गुरु की सेवा करने से प्रदूषण का नाश होता है और फिर मृत्यु का भक्षण नहीं होता है और इस तरह जन्म और मृत्यु के कष्टों को सहन नहीं करना पड़ता है।
कबीर साहब ने घोषणा की है।
जल है सूतक थाल है सूतक सूतक ओपत होई।
जनमें सूतक मुए फन सूतक सूतक परज बिगोई।
कहो रे पांडिया कौन पवित्रा। ऐसा जियान जपहू मेरे मीता ||1|| नैन्ड सूतक बैहु सूतक सूतक सरवानी होई।
उठ बैठा सूतक लगा सूतक पराई रसोई ||2||
फसन की बिध सभा को जाना छुटान की इक कोई। कही कबीर राम रिदाई बिचारै सूतक तीनै न हो ||3||41||
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब, पृष्ठ 331)
कबीर साहब ने स्पष्ट किया है कि यदि जन्म और मृत्यु से अपवित्रता उत्पन्न होती है तो जल और भूमि में भी मलिनता है अर्थात् यह हर जगह मौजूद है क्योंकि जन्म और मृत्यु लगातार हो रही है। सारा विश्व हर क्षण अपवित्र हो रहा है। मुझे बताओ, हे पंडितहे धार्मिक विद्वाना मुझे बताओ कौन शुद्ध और शुद्ध है। ऐसे आध्यात्मिक ज्ञान पर ध्यान लगाओं, हे मेरे मित्रा आंखों से दिखाई देने वाले जीव ही नहीं मर रहे हैं, बल्कि हमारी वाणी आदि से जीव भी मर रहे हैं। तो इसका अर्थ है
कि जीभ, कानों में मलिनता है और हम अपने में अशुद्ध हो रहे हैं। बैठने और खड़े होने की क्रिया। यहां तक कि किचन भी अपवित्र हो गया है। कबीर साहेब ने समझाया है कि अपवित्रता के अंधविश्वास में कैसे
फँसना तो सभी जानते हैं लेकिन इससे बचना शायद ही कोई जानता हो। जो लोग अपने हृदय में प्रभु का ध्यान करते हैं, वे अपवित्र नहीं होते। इस श्लोक में कबीर साहेब ने समझाया है कि यदि जन्म और मृत्यु घर्त को दूषित करते हैं तो दुनिया में कोई भी स्थान पवित्र नहीं है क्योंकि जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया एक सतत प्रक्रिया है।
ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिनमें सिख गुरुओं ने हमें सूतक और पातक में विश्वास करने से मना किया है। श्री गुरु नानक देव जी ने भाई मरदाना जी के दाह संस्कार के बाद उनके आजीवन अनुमाई संगत को
करह प्रसाद यानि पवित्रा प्रसाद वितरित किया। अभी तक सिखों के बीच एक परंपरा है कि एक व्यक्ति के दाह संस्कार के बाद सभी लोग एक गुरुद्वारे में जाते हैं जहां अरदास (प्रार्थना) के बाद करह प्रसाद वितरित किया जाता है।
सूतक और पातक का पालन करने वाले सिख अज्ञानी हैं। उपरोक्त चर्चा यह स्पष्ट करती है कि सिख धर्म हमें सभी प्रकार के अंधविश्वासों से दूर रहने की आज्ञा देता है। सिख धर्म अपने आप में एक अनूठा और आधुनिक धर्म है जो अन्य सभी धर्मों से अलग है। *डॉ अमृत कौर सेवानिवृत्त हैं। प्रोफेसर, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला, पंजाब, भारत।
[1]। सथिन्द का अर्थ है सात पीढी ऊपर और सात पौडी नीचे सीधे वंध में रिश्तेदार।
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