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Showing posts from January, 2026

स्नान कब कैसे और क्यों करें...!!

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🌹स्नान कब कैसे और क्यों करें...!!🌹 --स्नान किये विना जो पुण्यकर्म किया जाता है वह निष्फल होता है।उसे राक्षस ग्रहण करते है।। --दुःस्वप्न देखने,हजामत बनवाने (क्षोरकर्म)वमन होने स्त्री संग करने और श्मशान भूमि में जाने पर वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए। --तेल लगाने के बाद ,श्मशान से लौटने पर, स्त्रीसंग करने पर ,क्षोरकर्म करने के बाद जब तक मनुष्य स्नान नही करता ,तब तक बह चांडाल बना रहता है।।   --यदि नदी हो तो जिस ओर से उसकी धारा आती हो उसी ओर मुंह करके तथा दूसरे जलाशय में सूर्य की ओर मुंह करके स्नान करना चाहिए। ----कुएं से निकाले हुए जल की अपेक्षा झरने का जल पवित्र होता है।उससे पवित्र सरोवर का,उससे भी पवित्र नदी नद का जल बताया गया है।तीर्थ का जल उससे भी पवित्र होता है ओर गङ्गा का जल तो सबसे पवित्र माना गया है। ---भोजन के बाद,रोगी रहने पर,महानिशा(रात्रि के मध्य दो पहर)में बहुत वस्त्र पहने हुए और अज्ञात जलाशय में स्नान नही करना चाहिए।। --रात्रि के समय स्नान नही करना चाहिए,सन्ध्या के समय भी स्नान नही करना चाहिए। >> परन्तु---सूर्यग्रहण अथवा चंद्रग्रहण के समय रात्रि में भी ...

अस्त्र और 'प्रत्यस्त्र'

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प्राचीन ग्रंथों में अस्त्रों से बचाव की तकनीकें उतनी ही उन्नत बताई गई हैं जितने कि स्वयं अस्त्र थे। इसे 'प्रत्यस्त्र' (Counter-Astra) या रक्षात्मक युद्धनीति कहा जाता था। यह केवल ढाल के पीछे छिपना नहीं था, बल्कि यह आने वाली ऊर्जा (तरंग) को दूसरी ऊर्जा से काटकर बेअसर करने का विज्ञान था। यहाँ कुछ प्रमुख प्राचीन रक्षा तकनीकें और उनकी आधुनिक विज्ञान से तुलना दी गई है: 1. प्रत्यस्त्र सिद्धांत (The Concept of Interceptors) युद्ध में नियम था कि हर अस्त्र का एक "काट" (Counter) होता था। एक विशिष्ट आवृत्ति (Frequency) की तरंग को शांत करने के लिए विपरीत प्रकृति की तरंग छोड़ी जाती थी।  * वरुणास्त्र बनाम आग्नेयास्त्र:    जब कोई आग्नेयास्त्र (Fire/Heat weapon) चलाता था, तो उसे रोकने के लिए वरुणास्त्र (Water/Cooling weapon) का प्रयोग होता था।    * आधुनिक तुलना: यह आधुनिक बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम (जैसे S-400 या Iron Dome) जैसा है। जैसे ही रडार दुश्मन की मिसाइल (ऊर्जा) को आते देखता है, वह उसे हवा में ही नष्ट करने के लिए अपनी 'एंटी-मिसाइल' छोड़ देता है। 2. ब्रह...

आदि-अंत का रहस्य (काली तंत्र कृत)

आदि-अंत का रहस्य (काली तंत्र कृत) आदि-अंत का रहस्य (काली तंत्र कृत) देव्युवाच आदिदेव महादेव आद्यन्त गौपनं वद । यदि नो कथ्यते देव विमुचामि तदा तनुम् ॥ भावार्थः पार्वती बोलीं, हे देवाधिदेव महादेव। अब आप आदि व अंत का रहस्य बताएं अन्यथा मैं देह का त्याग कर दूंगी। ईश्वरोवाच आर्थात गोपन सूक्ष्म कथं तत् कथयाम्यहम्। जबूद्विपस्य वर्णेषु कलौ लोकाधमाः स्मृताः ॥ गुरु भक्ति विहीनाश्च भविष्यंति गृहे गृहे । दुष्क्रियाचां रताः सर्वे परमज्ञान वर्जिताः ॥ लौकिकाचारिणः सर्वे भविष्यंति गुहे-गृहे । विना शब्द परिज्ञानं मंत्रदाता द्विजो भवेत् ॥ मम सः श्रीमती मंत्रः संसारोद्भव बंधनात् । कथ्यते देव देवेशि मंत्र सर्वत्र सिद्धिदः । जायते तेन मे शंका कथं में प्राणवल्लभे ॥ भावार्थः महादेव बोले, हे देवी। आदि-अंत का रहस्य अतिगुप्त व सूक्ष्म है। उसका बखान में कैसे कर सकता हूं। कलियुग में जंबूद्वीप में जो लोक हैं उसके प्रत्येक गृह में गुरुभक्तों का अभाव है और सभी मनुज दुष्कर्मों में लिप्त होकर परम ज्ञान से वंचित हैं। उन गृहों में लोकाचार ही प्रधान है तथा जिन्हें परिज्ञान (पराज्ञान) नहीं है वह मंत्र उपदेष्टा हैं। हे देव...

मृत्यु के बाद की जीवन यात्रा:

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स्यूसाइड कोई तुरंत उठाया गया कदम नहीं, इससे पहले कई रेड फ्लैग नज़र आते हैं, जिन्हें पहचानना है जरूरी क्या आपका बच्चा उदास है? देखना होगा ये 10 लक्षण तो नहीं 10वीं के स्टूडेंट के ने बच्चों की मेंटल हेल्थ पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसलिए पैरंट्स के साथ-साथ ये जरूरी है कि स्कूल में टीचर्स भी उनकी मनोस्थिति के बारे में जाने कि बच्चा किस दौर से होकर गुजर रहा है। हमारे लिए यह कहना आसान है कि मेरा पैर टूटा है मगर यह कहना कठिन है कि मेरा मन उदास है या मुझे घबराहट हो रही है, यह समझना जरूरी है। साइकॉलजी एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर हम अपनी खराब मेंटल हेल्थ को बयां करते हैं तो दूसरे को लगता है कि यह कमजोरी की निशानी है या यह बात करना वक्त की बर्बादी है, इसी वजह से बच्चे भी खुलकर अपनी बातें बता नहीं पाते। क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ मोनिका कुमार कहती हैं, मेंटल हेल्थ को एक सामान्य भाषा देनी जरूरी है। इसके लिए स्कूलों में काउंसलिंग, अस्पतालों क्लिनिक में काउंसलिंग की सुविधा जरूरी है और यह सुविधा है तो यह देखना भी जरूरी है कि कितनी बेहतर तरीके से चल रही है। स्कूल में काउंसलर है, मगर उस तक बच्चा पहुंच नहीं प...

33 कोटि देव ?

🌹33 कोटि देव, 24 विष्णुरूप, 12 सरस्वती स्वरूप, 8 लक्ष्मी, 12 गौरी, 36 तुषित, 7 मारुतगण , 9 ग्रह, 10 दिशा दिग्पाल , स्थानीय देवता, नक्षत्र के अधिपति।। बहुत ही गहन विषय पर लेख।।। कितने देवी देवता है ? 33 कोटि या 33 करोड़ ?  • त्रिदेव : ब्रह्मा, विष्णु, महेश • त्रिदेवी : सरस्वती, लक्ष्मी, काली इनमे से भी भगवान विष्णु के असीमित रूपों में से कुछ रूप हैं।  33 प्रमुख देवता : 12 आदित्य + 8 वसु + 11 रुद्र + 1 इंद्र + 1 प्रजापति (कुछ शास्त्रों में इंद्र और प्रजापति के स्थान पर 2 अश्विनी कुमार स्थित होते हैं।) • 12 आदित्य : 1. अंशुमान, 2. आर्यमन, 3. इंद्र, 4. त्वष्टा, 5. धातु, 6. परजंन्य, 7. पूषा, 8. भगा, 9. मित्रा, 10. वरुण, 11. विवस्वान और 12. विष्णु। • 8 वसु : 1. आप, 2. ध्रुव, 3. सोम, 4. धार, 5. अनिल, 6. अनल, 7. प्रत्यूष और 8. प्रभास। • 11 रुद्र : 1. शंभू, 2. पिनाकी, 3. गिरीश, 4. स्थानु, 5. भरगा, 6. भाव, 7. सदाशिव, 8. शिव, 9. हर, 10. शर्वाः और 11. कपाली। ये 11 रुद्र, यक्षों और दस्युजन के भी देवता हैं तथा कल्प बदलने पर रुद्र और उनके नाम भी बदल जाते हैं। उदहारण,  ये अन्य कल्प के अ...

02. युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-2)

युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-2)  खापें का गोत्र कुल : इसके अलावा सोनी (धुम्रांस), सोमानी (लियांस), जाखेटिया (सीलांस), सोढानी (सोढास), हुरकुट (कश्यप), न्याती (नागसैण), हेडा (धनांस), करवा (करवास), कांकाणी (गौतम), मालूदा (खलांस), सारडा (थोम्बरास), काहल्या (कागायंस), गिरडा (गौत्रम), जाजू (वलांस), बाहेती (गौकलांस), बिदादा (गजांस), बिहाणी (वालांस), बजाज (भंसाली), कलंत्री (कश्यप), चावड़ा (चावड़ा माता), कासट (अचलांस), कलाणी (धौलांस), झंवर (धुम्रक्ष), मनमंस (गायल माता), काबरा (अचित्रांस), डाड़ (अमरांस), डागा (राजहंस), गट्टानी (ढालांस), राठी (कपिलांस), बिड़ला (वालांस), दरक (हरिद्रास), तोषनीवाल (कौशिक), अजमेरा (मानांस), भंडारी (कौशिक), भूतड़ा (अचलांस), बंग (सौढ़ास), अटल (गौतम), इन्नाणी (शैषांश), भराडिया (अचित्र), भंसाली (भंसाली), लड्ढा (सीलांस), सिकची (कश्यप), लाहोटी (कांगास), गदहया गोयल (गौरांस), गगराणी (कश्यप), खटोड (मूगांस), लखोटिया (फफडांस), आसवा (बालांस), चेचाणी (सीलांस), मनधन (जेसलाणी, माणधनी माता), मूंधड़ा (गोवांस), चांडक (चंद्रास), बलदेवा (बालांस), बाल्दी (लौरस), बूब (...

01. युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-1)

युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-1)  संपूर्णा  धरा ब्रह्मा, विष्णु, महेश भगवान के अंश और ऋषि मुनियों की संतानें हैं। इन सभी के पुत्रों और पुत्रियों से ही देव (सुर), दैत्य (असुर), दानव, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, वानर, नाग, चारण, निषाद, मातंग, रीछ, भल्ल, किरात, अप्सरा, विद्याधर, सिद्ध, निशाचर, वीर, गुह्यक, कुलदेव, स्थानदेव, ग्राम देवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वैताल, क्षेत्रपाल, मानव आदि की उत्पत्ति हुई।  वंश लेखकों, तीर्थ पुरोहितों, पण्डों व वंश परंपरा के वाचक संवाहकों द्वारा समस्त आर्यावर्त के निवासियों को एकजुट रखने का जो आत्मीय प्रयास किया गया है, वह निश्चित रूप से वैदिक ऋषि परंपरा का ही अद्यतन आदर्श उदाहरण माना जा सकता है।  पुराण अनुसार द्रविड़, चोल एवं पांड्य जातियों की उत्पत्ति में राजा नहुष के योगदान को मानते हैं, जो इलावर्त का चंद्रवंशी राजा था।  पुराण भारतीय इतिहास को जलप्रलय तक ले जाते हैं। यहीं से वैवस्वत मन्वंतर प्रारंभ होता है। वेदों में पंचनद का उल्लेख है। अर्थात पांच प्रमुख कुल से ही भारतीयों के कुलों का वि...