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Showing posts from January, 2026

33 कोटि देव ?

🌹33 कोटि देव, 24 विष्णुरूप, 12 सरस्वती स्वरूप, 8 लक्ष्मी, 12 गौरी, 36 तुषित, 7 मारुतगण , 9 ग्रह, 10 दिशा दिग्पाल , स्थानीय देवता, नक्षत्र के अधिपति।। बहुत ही गहन विषय पर लेख।।। कितने देवी देवता है ? 33 कोटि या 33 करोड़ ?  • त्रिदेव : ब्रह्मा, विष्णु, महेश • त्रिदेवी : सरस्वती, लक्ष्मी, काली इनमे से भी भगवान विष्णु के असीमित रूपों में से कुछ रूप हैं।  33 प्रमुख देवता : 12 आदित्य + 8 वसु + 11 रुद्र + 1 इंद्र + 1 प्रजापति (कुछ शास्त्रों में इंद्र और प्रजापति के स्थान पर 2 अश्विनी कुमार स्थित होते हैं।) • 12 आदित्य : 1. अंशुमान, 2. आर्यमन, 3. इंद्र, 4. त्वष्टा, 5. धातु, 6. परजंन्य, 7. पूषा, 8. भगा, 9. मित्रा, 10. वरुण, 11. विवस्वान और 12. विष्णु। • 8 वसु : 1. आप, 2. ध्रुव, 3. सोम, 4. धार, 5. अनिल, 6. अनल, 7. प्रत्यूष और 8. प्रभास। • 11 रुद्र : 1. शंभू, 2. पिनाकी, 3. गिरीश, 4. स्थानु, 5. भरगा, 6. भाव, 7. सदाशिव, 8. शिव, 9. हर, 10. शर्वाः और 11. कपाली। ये 11 रुद्र, यक्षों और दस्युजन के भी देवता हैं तथा कल्प बदलने पर रुद्र और उनके नाम भी बदल जाते हैं। उदहारण,  ये अन्य कल्प के अ...

02. युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-2)

युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-2)  खापें का गोत्र कुल : इसके अलावा सोनी (धुम्रांस), सोमानी (लियांस), जाखेटिया (सीलांस), सोढानी (सोढास), हुरकुट (कश्यप), न्याती (नागसैण), हेडा (धनांस), करवा (करवास), कांकाणी (गौतम), मालूदा (खलांस), सारडा (थोम्बरास), काहल्या (कागायंस), गिरडा (गौत्रम), जाजू (वलांस), बाहेती (गौकलांस), बिदादा (गजांस), बिहाणी (वालांस), बजाज (भंसाली), कलंत्री (कश्यप), चावड़ा (चावड़ा माता), कासट (अचलांस), कलाणी (धौलांस), झंवर (धुम्रक्ष), मनमंस (गायल माता), काबरा (अचित्रांस), डाड़ (अमरांस), डागा (राजहंस), गट्टानी (ढालांस), राठी (कपिलांस), बिड़ला (वालांस), दरक (हरिद्रास), तोषनीवाल (कौशिक), अजमेरा (मानांस), भंडारी (कौशिक), भूतड़ा (अचलांस), बंग (सौढ़ास), अटल (गौतम), इन्नाणी (शैषांश), भराडिया (अचित्र), भंसाली (भंसाली), लड्ढा (सीलांस), सिकची (कश्यप), लाहोटी (कांगास), गदहया गोयल (गौरांस), गगराणी (कश्यप), खटोड (मूगांस), लखोटिया (फफडांस), आसवा (बालांस), चेचाणी (सीलांस), मनधन (जेसलाणी, माणधनी माता), मूंधड़ा (गोवांस), चांडक (चंद्रास), बलदेवा (बालांस), बाल्दी (लौरस), बूब (...

01. युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-1)

युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-1)  संपूर्णा  धरा ब्रह्मा, विष्णु, महेश भगवान के अंश और ऋषि मुनियों की संतानें हैं। इन सभी के पुत्रों और पुत्रियों से ही देव (सुर), दैत्य (असुर), दानव, राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, वानर, नाग, चारण, निषाद, मातंग, रीछ, भल्ल, किरात, अप्सरा, विद्याधर, सिद्ध, निशाचर, वीर, गुह्यक, कुलदेव, स्थानदेव, ग्राम देवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वैताल, क्षेत्रपाल, मानव आदि की उत्पत्ति हुई।  वंश लेखकों, तीर्थ पुरोहितों, पण्डों व वंश परंपरा के वाचक संवाहकों द्वारा समस्त आर्यावर्त के निवासियों को एकजुट रखने का जो आत्मीय प्रयास किया गया है, वह निश्चित रूप से वैदिक ऋषि परंपरा का ही अद्यतन आदर्श उदाहरण माना जा सकता है।  पुराण अनुसार द्रविड़, चोल एवं पांड्य जातियों की उत्पत्ति में राजा नहुष के योगदान को मानते हैं, जो इलावर्त का चंद्रवंशी राजा था।  पुराण भारतीय इतिहास को जलप्रलय तक ले जाते हैं। यहीं से वैवस्वत मन्वंतर प्रारंभ होता है। वेदों में पंचनद का उल्लेख है। अर्थात पांच प्रमुख कुल से ही भारतीयों के कुलों का वि...