02. युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-2)
युगों से चली आ रही आपकी पीढ़िया और वंश।।(भाग-2)
खापें का गोत्र कुल : इसके अलावा सोनी (धुम्रांस), सोमानी (लियांस), जाखेटिया (सीलांस), सोढानी (सोढास), हुरकुट (कश्यप), न्याती (नागसैण), हेडा (धनांस), करवा (करवास), कांकाणी (गौतम), मालूदा (खलांस), सारडा (थोम्बरास), काहल्या (कागायंस), गिरडा (गौत्रम), जाजू (वलांस), बाहेती (गौकलांस), बिदादा (गजांस), बिहाणी (वालांस), बजाज (भंसाली), कलंत्री (कश्यप), चावड़ा (चावड़ा माता), कासट (अचलांस), कलाणी (धौलांस), झंवर (धुम्रक्ष), मनमंस (गायल माता), काबरा (अचित्रांस), डाड़ (अमरांस), डागा (राजहंस), गट्टानी (ढालांस), राठी (कपिलांस), बिड़ला (वालांस), दरक (हरिद्रास), तोषनीवाल (कौशिक), अजमेरा (मानांस), भंडारी (कौशिक), भूतड़ा (अचलांस), बंग (सौढ़ास), अटल (गौतम), इन्नाणी (शैषांश), भराडिया (अचित्र), भंसाली (भंसाली), लड्ढा (सीलांस), सिकची (कश्यप), लाहोटी (कांगास), गदहया गोयल (गौरांस), गगराणी (कश्यप), खटोड (मूगांस), लखोटिया (फफडांस), आसवा (बालांस), चेचाणी (सीलांस), मनधन (जेसलाणी, माणधनी माता), मूंधड़ा (गोवांस), चांडक (चंद्रास), बलदेवा (बालांस), बाल्दी (लौरस), बूब (मूसाइंस), बांगड़ (चूडांस), मंडोवर (बछांस), तोतला (कपिलांस), आगीवाल (चंद्रास), आगसूंड (कश्यप), परतानी (कश्यप), नावंधर (बुग्दालिभ), नवाल (नानणांस), तापडिया (पीपलांस), मणियार (कौशिक), धूत (फाफडांस), धूपड़ (सिरसेस), मोदाणक्ष (सांडास), देवपुरा (पारस), मंत्री (कंवलांस), पोरवाल/परवाल (नानांस), नौलखा (कश्यप गावंस), टावरी (माकरण), दरगढ़ (गोवंस), कालिया (झुमरंस), खावड (मूंगास), लोहिया, रांदड (कश्यप) आदि। इसके अलावा महेश्वरी समाज की और भी खापें और खन्ने हैं जैसे दम्माणी, करनाणी, सुरजन, धूरया, गांधी, राईवाल, कोठारी, मालाणी, मूथा, मोदी, मोह्त्ता, फाफट, ओझा, दायमा आदि।
इसके अलावा मधेशिया, मधेशी, रोनियार, दौसर, कलवार, भंडारी, पटेल, गनिया तेली (कर्नाटक), गनिया गान्दला कर्नाटक, पटवा, माहेश्वरी, चौरसिया, पुरवाल (पोरवाल), सरावगी, ओसवाल, कांदु, माहुरी, सिंदुरिया या कायस्थ बनिया, वाणी महाराष्ट्र और कर्नाटक, ओमर, उनई साहू, कपाली बंगाल, गंध बनिया बंगाल, माथुर, वानिया चेट्टियार तमिलनाडु, केसरवानी, खत्री, बोहरा, कपोल, मोढ्ह, तेलगु, आर्य आंध्र तमिल और कर्नाटक, असाती, रस्तोगी, विजयवर्गी, खंडेलवाल, साहू तेली, अग्रोहा, अग्रसेन, अग्रवाल, लोहाना, महाजन, अरोरा, अग्रहरी, सोनवाल सिहारे, कमलापुरी, घांची, कानू, कोंकणी, गुप्त, गदहया (गोयल) आदि सभी वर्तमान में वैश्य से संबंध रखते हैं। नभागाजी माहेश्वरी वैश्यों के प्राचीन पुरुष हैं।
इसके अलवा कालांतार में व्यापार के आधार पर यह उपनाम रखें गए- अठबरिया, अनवरिया, अरबहरया, अलापुरिया, ओहावार, औरिया, अवध, अधरखी तथा अगराहरी, कसेरे, पैंगोरिया, पचाधरी, पनबरिया, पन्नीवार, पिपरैया, सुरैया, सुढ़ी, सोनी, संवासित, सुदैसक, सेंकड़ा, साडिल्य, समासिन साकरीवार, शनिचरा, शल्या, शिरोइया, रैपुरिया, रैनगुरिया, रमपुरिया, रैदेहुआ, रामबेरिया, रेवाड़ी, बगुला, बरैया, बगबुलार, बलाईवार, बंसलवार, बारीवार, बासोरिया, बाबरपुरिया, बन्देसिया, बादलस, बामनियां, बादउआ, विरेहुआ, विरथरिया, विरोरिया, गजपुरिया, गिंदौलिया, गांगलस, गुलिया, गणपति, गुटेरिया, गोतनलस, गोलस, जटुआ, जबरेवा, जिगारिया, जिरौलिया, जिगरवार, कठैरिया, काशीवार, केशरवानी, कुटेरिया, कुतवरिया, कच्छलस, कतरौलिया, कनकतिया, कातस, कोठिया, गुन्पुरिया, ठठैरा, पंसारी, निबौरिया, नौगैया, निरजावार, मोहनियॉं, मोदी, मैरोठिया, माठेसुरिया, मुरवारिया महामनियॉं, महावार, माडलस, महुरी, भेसनवार, भतरकोठिया, भभालपुरिया, भदरौलिया, चॉदलस, चौदहराना, चौसिया, लघउआ, तैरहमनिया, तैनगुरिया, घाघरवार, खोबड़िया, खुटैटिया, फंजोलिया, फरसैया, हलवाई, हतकतिया, जयदेवा, दोनेरिया, सिंदुरिया आदि।
अग्रोहा : अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। सूर्यवंश के बारे में हम पहले ही लिख आएं हैं। अत: यह समाज भी सूर्यवंश से ही संबंध रखता है। वैवस्वत मनु से ही सूर्यवंश की स्थापना हुई थी। महाराजा अग्रसेन ने प्रजा की भलाई के लिए कार्य किया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। वर्तमान 2016 के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5187 साल पहले हुआ था।
अपने नए राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेड़िए के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और मां वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है।
महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे।
अग्रवाल कुल गोत्र:- गर्ग, गोयल, गोयन, बंसल, कंसल, सिंहल, मंगल, जिंदल, तिंगल,
ऐरण, धारण, मधुकुल, बिंदल, मित्तल, तायल, भन्दल, नागल और कुच्छ्ल।
पोरवाल समाज : माना जाता है कि राजा पुरु के वंशज पोरवाल कहलाए। राजा पुरु के चार भाई कुरु, यदु, अनु और द्रुहु थे। यह सभी अत्रिवंशी है क्योंकि राजा पुरु भी अत्रिवंशी थे। बीकानेर तथा जोधपुरा राज्य (प्राग्वाट प्रदेश) के उत्तरी भाग जिसमें नागौर आदि परगने हैं, जांगल प्रदेश कहलाता था। जांगल प्रदेश में पोरवालों का बहुत अधिक वर्चस्व था। विदेशी आक्रमणों से, अकाल, अनावृष्टि और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने के कारण अपने बचाव के लिए एवं आजीविका हेतू जांगल प्रदेश से पलायन करना प्रारंभ कर दिया। अनेक पोरवाल अयोध्या और दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गए। मध्यकाल में राजा टोडरमल ने पोरवाज जाति के उत्थान और सहयोग के लिए बहुत सराहनीय कार्य किया था जिसके चलते पोरवालों में उनकी कीर्ति है।
दिल्ली में रहने वाले पोरवाल 'पुरवाल' कहलाए जबकि अयोध्या के आसपास रहने वाले 'पुरवार' कहलाए। इसी प्रकार सैकड़ों परिवार वर्तमान मध्यप्रदेश के दक्षिण-प्रश्चिम क्षेत्र (मालवांचल) में आकर बस गए। यहां ये पोरवाल व्यवसाय/व्यापार और कृषि के आधार पर अलग-अलग समूहों में रहने लगे। इन समूह विशेष को एक समूह नाम (गौत्र) दिया जाने लगा और ये जांगल प्रदेश से आने वाले जांगडा पोरवाल कहलाए। राजस्थान के रामपुरा के आसपास का क्षेत्र और पठार आमद कहलाता था। आमदगढ़ में रहने के कारण इस क्षेत्र के पोरवाल आज भी आमद पोरवाल कहलाते हैं।
श्रीजांगडा पोरवाल समाज में उपनाम के रुप में लगाई जाने वाली 24 गोत्रें किसी न किसी कारण विशेष के द्वारा उत्पन्न हुई और प्रचलन में आ गई। जांगलप्रदेश छोड़ने के पश्चात् पोरवाल समाज अपने-अपने समूहों में अपनी मानमर्यादा और कुल परम्परा की पहचान को बनाए रखने के लिए आगे चलकर गोत्र का उपयोग करने लगे।
जैसे किसी समूह विशेष में जो पोरवाल लोग अगवानी करने लगे वे चौधरी नाम से सम्बोधित होने लगे। जो लोग हिसाब-किताब, लेखा-जोखा, आदि व्यावसायिक कार्यों में दक्ष थे वे मेहता कहलाए। यात्रा आदि सामूहिक भ्रमण, कार्यक्रमों के अवसर पर जो लोग अगुवाई करते और अपने संघ-साथियों की सुख-सुविधा का ध्यान रखते थे वे संघवी कहलाए। मुक्त हस्त से दान देने वाले दानगढ़ कहलाए। असामियों से लेन-देन करने वाले, धन उपार्जन और संचय में दक्ष परिवार सेठिया और धन वाले धनोतिया पुकारे जाने लगे। कलाकार्य में निपुण परिवार काला कहलाए, राजा पुरु के वंशज् पोरवाल और अर्थ व्यवस्थाओं को गोपनीय रखने वाले गुप्त या गुप्ता कहलाए। कुछ गौत्रें अपने निवास स्थान (मूल) के आधार पर बनी जैसे उदिया-अंतरवेदउदिया (यमुना तट पर), भैसरोड़गढ़ (भैसोदामण्डी) में रुकने वाले भैसोटा, मंडावल में मण्डवारिया, मजावद में मुजावदिया, मांदल में मांदलिया, नभेपुर केनभेपुरिया, आदि।
इस तरह ये गोत्र निर्मित हो गए- सेठिया, काला, मुजावदिया, चौधरी, मेहता, धनोतिया, संघवी, दानगढ़, मांदलिया, घाटिया, मुन्या, घरिया, रत्नावत, फरक्या, वेद, खरडिया, मण्डवारिया, उदिया, कामरिया, डबकरा, भैसोटा, भूत, नभेपुरिया, श्रीखंडिया। प्रत्येकगोत्र के अलग- अलग भेरुजी होते हैं। जिनकी स्थापना उनके पूर्वजों द्वारा कभी किसी सुविधाजनक स्थान पर की गई थी।
दोसर समाज : ऋषि मरीचि के पुत्र कश्यप थे। डॉ. मोतीलाल भार्गव द्वारा लिखी पुस्तक 'हेमू और उसका युग' से पता चलता है कि दूसर वैश्य हरियाणा में दूसी गांव के मूल निवासी हैं, जो कि गुरुगांव जनपद के उपनगर रिवाड़ी के पास स्थित है।
खंडेलवाल समाज : खंडेलवाल के आदिपुरुष हैं खाण्डल ऋषि। एक मान्यता के अनुसार खंडेला के सेठ धनपत के 4 पुत्र थे। 1.खंडू, 2.महेश, 3.सुंडा और 4. बीजा इनमें खंडू से खण्डेलवाल हुए, महेश से माहेश्वरी हुए सुंडा से सरावगी व बीजा से विजयवर्गी। खण्डेलवाल वैश्य के 72 गोत्र है। गोत्र की उत्पति के सम्बंध में यही धारणा है कि जैसे जैसे समाज में बढ़ोतरी हुई स्थान व्यवसाय, गुण विशेष के आधार पर गोत्र होते गए।
दलित कुल वंश : वैसे हम दलितों के कुल के बारे में उपर लिख आएं हैं यह तो महज टिप्पणी भर है। आज जितने भी दलित है वे सभी एक काल विशेष में ब्राह्मण या छत्रिय कर्म करने वाले थे। वर्तमान में अधिकतर दलित लोग खुद को दिति के कुल का मानते हैं, जो कि पूर्णत: सही नहीं है। सभी के अलग अलग कुल है। हिन्दू धर्मग्रंथों में दलित नाम का कोई शब्द नहीं है और न ही हरिजन नाम का। यह शब्द वर्तमान राजनीति की देन है। शूद्र या क्षुद्र शब्द धर्मग्रंथों में प्रचलित है। शूद्र किसी जाति विशेष का नाम नहीं बल्कि ऐसे व्यक्ति को कहा जाता था जो खोटे या छोटे कर्म करता था या जो नीच कर्म करता था। इसी तरह पिशाच, चांडाल और निशाचर और रात्रि के कर्म करने वाले तांत्रिकादि को शूद्र कहा जाता था। दास शब्द बहुत बाद में प्रचलन में आया। दासप्रथा के पूरे इतिहास को जानना जरूरी है, क्योंकि यह हर देश धर्म और काल में भिन्न-भिन्न रूप में रही है।
वर्तमान की जातिवादी व्यवस्था गुलाम काल की देन होने के साथ ही पिछले 70 वर्षों की विभाजनकारी राजनीति की देन है। भारतीय इतिहास और धर्म को अच्छे से नहीं जानने के कारण मतभेद और भ्रम है। जातियों के उत्थान और पतन के इतिहास को नहीं जानने के कारण ही कुछ लोग और संगठन हिन्दू धर्म के खिलाफ नफरत का प्रचार करते हैं।
हमारे-आपके पूर्वजों ने जिन 'भंगी' और 'मेहतर' जाति को अस्पृश्य करार दिया, जिनके हाथ का छुआ तक नहीं खाते, असल में वे सभी मुगलकाल में ब्राह्मण थे। मुगल काल में ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर जो अत्याचार हुए उसकी दास्तां कम ही लोग जानते हैं। उस काल में ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के सामने दो ही रास्ते दिए गए थे- या तो इस्लाम कबूल करो या फिर हम मुगलों और मुसलमानों का मैला ढोओ।
आप किसी भी मुगल किले में चले जाइए वहां आपको शौचालय नहीं मिलेगा। क्यों?
क्योंकि मुगल जहां से आए थे वहां शौचालय नहीं होते थे वे इसी तरह मैला फिंकवाते थे। हिंदुओं की उन्नत सिंधु घाटी सभ्यता में रहने वाले कमरे से सटा शौचालय होता था, जबकि मुगल बादशाह के किसी भी महल में चले जाइए, आपको शौचालय नहीं मिलेगा। ऐसे में मुगलों ने ब्राह्मणों और क्षत्रियों से ये काम कराया।
भारत में 1000 ईस्वी में केवल एक फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या-14 फीसदी से ज्यादा हो गई। आपने सोचा कि ये 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी मुगल शासन में कैसे हो गई। इसके बाद अंग्रेजों ने इस ऊंच और नीच की व्यवस्था को और बढ़ावा दिया।
कैसे और किस तरह यह एक अलग विषय है।
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