मृत्यु के बाद की जीवन यात्रा:

स्यूसाइड कोई तुरंत उठाया गया कदम नहीं, इससे पहले कई रेड फ्लैग नज़र आते हैं, जिन्हें पहचानना है जरूरी

क्या आपका बच्चा उदास है? देखना होगा ये 10 लक्षण तो नहीं

10वीं के स्टूडेंट के ने बच्चों की मेंटल हेल्थ पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसलिए पैरंट्स के साथ-साथ ये जरूरी है कि स्कूल में टीचर्स भी उनकी मनोस्थिति के बारे में जाने कि बच्चा किस दौर से होकर गुजर रहा है।

हमारे लिए यह कहना आसान है कि मेरा पैर टूटा है मगर यह कहना कठिन है कि मेरा मन उदास है या मुझे घबराहट हो रही है, यह समझना जरूरी है। साइकॉलजी एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर हम अपनी खराब मेंटल हेल्थ को बयां करते हैं तो दूसरे को लगता है कि यह कमजोरी की निशानी है या यह बात करना वक्त की बर्बादी है, इसी वजह से बच्चे भी खुलकर अपनी बातें बता नहीं पाते। क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ मोनिका कुमार कहती हैं, मेंटल हेल्थ को एक सामान्य भाषा देनी जरूरी है। इसके लिए स्कूलों में काउंसलिंग, अस्पतालों क्लिनिक में काउंसलिंग की सुविधा जरूरी है और यह सुविधा है तो यह देखना भी जरूरी है कि कितनी बेहतर तरीके से चल रही है। स्कूल में काउंसलर है, मगर उस तक बच्चा पहुंच नहीं पा रहा है, तो यह टीचर्स और स्कूल मैनेजमेंट की कमी के अलावा पैरंट्स की भी अनदेखी है। अगर काउंसलर को काम करने की आजादी दी जाएगी. उसके काम को समझा जाएगा, तो काफी हद तक बच्चों को ही फायदा होगा।

डॉ. मोनिका बताती हैं, स्यूसाइड का कदम कोई तुरंत नहीं उठाता। इससे पहले कई लक्षण नजर आते हैं, जिसे पहचानना जरूरी है। अकेले बैठना, उदास होना, बातचीत कम करना, मन नहीं लगना, जीने का फायदा ही क्या है, ऐसे विचार बच्चे को आ रहे हैं, तो पैरंट्स के साथ-साथ स्कूल मैनेजमेंट को भी अलर्ट होना जरूरी है। इसे गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। जिस तरह से स्कूल में पढ़ाई से लेकर इन्फ्रास्ट्रक्चर का ऑडिट होता है, उसी तरह से मेंटल हेल्थ को लेकर भी सेफ्टी ऑडिट भी जरूरी है।

देखना होगा ये 10 लक्षण तो नहीं
ऐसे पहचानें...

1. व्यवहार में अचानक बदलाव: अपने नेचर से अलग बर्ताव बहुत चुप हो जाना, गुस्सा बढ़ना या पहले जैसी गतिविधियों में दिलचस्पी कम होना।

2. सोच में नकारात्मकता: ने बेकार हूं', 'कोई मुझे नहीं समझता पसंद करता, में होता नहीं होता तो सब ठीक होता, 'जीने का क्या फायदा', 'मन नहीं लग रहा' जैसी बातें कहना।

3. अलग-थलग रहना / सामाजिक दूरी: दोस्तों से पूरी, परिवार के साथ बात ना करना, स्कूल या खेलकूद से बचना, उदासी, बात-बात पर रोना या अकेले रहना।

4. पढ़ाई में गिरावट: पढ़ाई में ध्यान ना लगना, अचानক खराब ग्रेड आना या स्कूल जाने से कतराना, अपने पसंद के काम ना करना।

5. नींद की समस्या: बहुत ज्यादा सोना या नीद ना आना. डरावने सपने आना।

6. खाने की आदतों में बदलाव: भूख कम हो जाना या जरूरत से ज्यादा खाना।

7. सेहत को लेकर शिकायतें: कर-बार सिरदर्द, पेट वर्द. कमजोरी, घबराहट, जबकि डॉक्टर कारण ना बता सकें।

8. डर, बेचैनी या घबराहट: छोटी बातों में भी डर जाना, पैनिक अटैक की तरह सांस फूलना, अचानक रो पड़ना।

9. रिस्क लेने वाला व्यवहार: झूठ बोलना चोरी करना, नारपीट या इंटरनेट सोशल मीडिया पर खतरनाक ट्रेंड फॉले करना, अपने कमरे में बंद रहना, दरवाजा ना खोलना।

10. खुद को नुकसान: खुद को चोट पहुंचाने की कोशिश, हाथ-पैर पर खरोच/कट के निशान, या गुस्से में सिर पटकना, गाली देना, अपनों से ही गलत बर्ताव।

क्या करें...


> वो सेफ है, यह समझाएं: घरक स्कूल में खतरनाक चीजे (दवाइया, ब्लेड, रस्सी, नुकीले सामान) उसकी पहुंच से हटाएं। उसका भरोसा जीते कि आप उसके साथ है।

>‌ किसी प्रोफेशनल से संपर्क करें : अगर बच्चे में कोई लक्षण नजर आए तो बाल मनोवैज्ञानिक काउंसलर या मनोचिकित्सक की मादद लें।

> स्कूल घर कम्युनिकेशन मजबूत रखें: टीचर-पैरंट खुलकर बात करें। अगर स्कूल वाले नहीं समझ रहे हैं या इग्नोर कर रहे है, तो बच्चे को रिस्क में न रखें।

> रूटिन पर ध्यान दें: उसकी नींद स्क्रीन टाइम का ध्यान रखें, हल्की एक्टिविटी मी कराए, ताकि मन ठीक ही। डाट और पेशर से बचें। मावर्स आदि की बातें न करें।

> बच्चे से तुरंत बात करें: शात रहें, घबराएं नहीं। बच्चे से नरमी से पूछें जैसे 'क्या तुम मुझे बताना चाहोगे?', 'चलो बात करते हैं।

> बिना जजमेंट के उसे सुनें: न खांटे, म तुलना करें, न ताना मारें। यह भी न कहें कि ये तो कुछ नहीं है' या 'बड़ी बात नहीं है।

> उसे लेबल न करें: 'यह ती अटेंशन सीकर है', 'कुछ भी बोलता है. ऐसे कमेंट से उसे परेशान न करें बल्कि उसकी भावनाएं समझे।

> बेहतर लगे तो भी नजर रखें: काउंसलिंग के बाद वो बेहतर लग रहा है तो भी नजर रखें।

> बच्चे के साथ समय बिताएं: बच्चे से बातचीत करते रहे. उसे अकेला न छोडे।

★ मृत्यु के बाद की जीवन यात्रा: गरुड़ पुराण के अनुसार

1. प्राण त्याग और यमदूतों का आगमन
जब मनुष्य का अंतिम समय आता है, तो उसके शरीर से प्राण निकलने लगते हैं। गरुड़ पुराण कहता है कि मृत्यु के समय यमराज के दो दूत (यमदूत) आते हैं। वे देखने में अत्यंत भयानक होते हैं। जिस मनुष्य ने जीवन भर पुण्य किए होते हैं, उसे प्राण त्यागने में कष्ट नहीं होता, लेकिन पापी मनुष्य के प्राण बड़ी पीड़ा के साथ निकलते हैं।

2. यमलोक की पहली यात्रा
प्राण निकलने के बाद, आत्मा एक अंगूठे के आकार के सूक्ष्म शरीर में समा जाती है। यमदूत उस आत्मा को पकड़कर यमलोक ले जाते हैं। वहां उसे पहली बार उसके कर्मों का लेखा-जोखा दिखाया जाता है। यह यात्रा मात्र 24 घंटे की होती है, जिसके बाद आत्मा को वापस उसके घर भेज दिया जाता है ताकि वह अपने अंतिम संस्कार और परिजनों द्वारा दिए गए पिंड दान को देख सके।

3. 13 दिनों का प्रवास
मृत्यु के बाद के 13 दिन आत्मा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इन दिनों में परिवार द्वारा किया गया 'पिंड दान' और 'तर्पण' उस आत्मा को वह शक्ति प्रदान करता है जिससे वह आगे की लंबी और कठिन यात्रा तय कर सके। 13वें दिन के बाद, आत्मा यमलोक की अंतिम यात्रा पर निकल पड़ती है।

4. वैतरणी नदी और दुर्गम मार्ग
यमलोक का मार्ग 86,000 योजन लंबा है। इस मार्ग में वैतरणी नदी पड़ती है।

पुण्य आत्मा: जिसने दान-पुण्य किया होता है, उसके लिए यह नदी शांत हो जाती है और वह सुखपूर्वक इसे पार कर लेता है।

पापी आत्मा: जिसने बुरे कर्म किए होते हैं, उसके लिए यह नदी रक्त, मवाद और भयानक जीवों से भरी होती है। उसे इसमें डूबते-उतराते हुए पार होना पड़ता है।

5. धर्मराज का दरबार (न्याय)
एक वर्ष की यात्रा के बाद आत्मा यमराज के दरबार में पहुँचती है। वहां चित्रगुप्त (जो प्रत्येक मनुष्य के कर्मों का रिकॉर्ड रखते हैं) धर्मराज को व्यक्ति के पापों और पुण्यों का विवरण सुनाते हैं।

6. स्वर्ग, नरक या पुनर्जन्म
न्याय के आधार पर आत्मा की अगली गति तय होती है:

स्वर्ग: अत्यधिक पुण्य करने वाले कुछ समय के लिए स्वर्ग के सुख भोगते हैं।

नरक: पाप करने वालों को विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाती हैं ताकि उनके पापों का प्रायश्चित हो सके।

पुनर्जन्म: जब कर्मों का फल भोग लिया जाता है, तब आत्मा को उसके संचित कर्मों के अनुसार पुनः 84 लाख योनियों में से किसी एक में (मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) जन्म लेना पड़ता है।

आध्यात्मिक सार
यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक परिवर्तन है। जैसे हम पुराने वस्त्र त्याग कर नए पहनते हैं, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है। हमारे 'कर्म' ही एकमात्र ऐसी संपत्ति है जो मृत्यु के बाद भी हमारे साथ चलती है।

"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।" (आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है।)

काशी में मणिकर्णिका घाट पर चिता जब शांत हो जाती है तब मुखाग्नि देने वाला व्यक्ति चिता भस्म पर 94 लिखता है।
यह सभी को नहीं मालूम है। खांटी बनारसी लोग या अगल बगल के लोग ही इस परम्परा को जानते हैं। बाहर से आये शवदाहक जन इस बात को नहीं जानते।

जीवन के शतपथ होते हैं। 100 शुभ कर्मों को करने वाला व्यक्ति मरने के बाद उसी के आधार पर अगला जीवन शुभ या अशुभ प्राप्त करता है। 94 कर्म मनुष्य के अधीन हैं। वह इन्हें करने में समर्थ है पर 6 कर्म का परिणाम ब्रह्मा जी के अधीन होता है।हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश- अपयश ये 6 कर्म विधि के नियंत्रण में होते हैं। 

अतः आज चिता के साथ ही तुम्हारे 94 कर्म भस्म हो गये। आगे के 6 कर्म अब तुम्हारे लिए नया जीवन सृजित करेंगे।
अतः 100 - 6 = 94 लिखा जाता है।

गीता में भी प्रतिपादित है कि मृत्यु के बाद मन अपने साथ 5 ज्ञानेन्द्रियों को लेकर जाता है। यह संख्या 6 होती है। मन और पांच ज्ञान इन्द्रियाँ।
अगला जन्म किस देश में कहाँ और किन लोगों के बीच होगा यह प्रकृति के अतिरिक्त किसी को ज्ञात नहीं होता है। अतः 94 कर्म भस्म हुए 6 साथ जा रहे हैं।
विदा यात्री। तुम्हारे 6 कर्म तुम्हारे साथ हैं।

आपके लिए इन 100 शुभ कर्मों का विस्तृत विवरण दिया जा रहा है जो जीवन को धर्म और सत्कर्म की ओर ले जाते हैं एवं यह सूची आपके जीवन को सत्कर्म करने की प्रेरणा देगी......

  100 शुभ कर्मों की गणना धर्म और नैतिकता के कर्म-
1.सत्य बोलना
2.अहिंसा का पालन
3.चोरी न करना
4.लोभ से बचना
5.क्रोध पर नियंत्रण
6.क्षमा करना
7.दया भाव रखना
8.दूसरों की सहायता करना
9.दान देना (अन्न, वस्त्र, धन)
10.गुरु की सेवा
11.माता-पिता का सम्मान
12.अतिथि सत्कार
13.धर्मग्रंथों का अध्ययन
14.वेदों और शास्त्रों का पाठ
15.तीर्थ यात्रा करना
16.यज्ञ और हवन करना
17.मंदिर में पूजा-अर्चना
18.पवित्र नदियों में स्नान
19.संयम और ब्रह्मचर्य का पालन 
20.नियमित ध्यान और योग सामाजिक और पारिवारिक कर्म                                      
21.परिवार का पालन-पोषण
22.बच्चों को अच्छी शिक्षा देना
23.गरीबों को भोजन देना
24.रोगियों की सेवा
25.अनाथों की सहायता
26.वृद्धों का सम्मान
27.समाज में शांति स्थापना
28.झूठे वाद-विवाद से बचना
29.दूसरों की निंदा न करना
30.सत्य और न्याय का समर्थन
31.परोपकार करना
32.सामाजिक कार्यों में भाग लेना
33.पर्यावरण की रक्षा
34.वृक्षारोपण करना
35.जल संरक्षण
36.पशु-पक्षियों की रक्षा
37.सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
38.दूसरों को प्रेरित करना
39.समाज में कमजोर वर्गों का उत्थान
40.धर्म के प्रचार में सहयोग आध्यात्मिक और व्यक्तिगत कर्म                                           
41.नियमित जप करना
42.भगवान का स्मरण
43.प्राणायाम करना
44.आत्मचिंतन
45.मन की शुद्धि
46.इंद्रियों पर नियंत्रण
47.लालच से मुक्ति
48.मोह-माया से दूरी
49.सादा जीवन जीना
50.स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन)
51.संतों का सान्निध्य
52.सत्संग में भाग लेना
53.भक्ति में लीन होना
54.कर्मफल भगवान को समर्पित करना
55.तृष्णा का त्याग
56.ईर्ष्या से बचना
57.शांति का प्रसार
58.आत्मविश्वास बनाए रखना
59.दूसरों के प्रति उदारता
60.सकारात्मक सोच रखना सेवा और दान के कर्म
61.भूखों को भोजन देना
62.नग्न को वस्त्र देना
63.बेघर को आश्रय देना
64.शिक्षा के लिए दान
65.चिकित्सा के लिए सहायता
66.धार्मिक स्थानों का निर्माण
67.गौ सेवा
68.पशुओं को चारा देना
69.जलाशयों की सफाई
70.रास्तों का निर्माण
71.यात्री निवास बनवाना
72.स्कूलों को सहायता
73.पुस्तकालय स्थापना
74.धार्मिक उत्सवों में सहयोग
75.गरीबों के लिए निःशुल्क भोजन
76.वस्त्र दान
77.औषधि दान
78.विद्या दान
79.कन्या दान
80.भूमि दान, नैतिक और मानवीय कर्म                                          
81.विश्वासघात न करना
82.वचन का पालन
83.कर्तव्यनिष्ठा
84.समय की प्रतिबद्धता 
85.धैर्य रखना
86.दूसरों की भावनाओं का सम्मान
87.सत्य के लिए संघर्ष
88.अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना
89.दुखियों के आँसू पोंछना
90.बच्चों को नैतिक शिक्षा
91.प्रकृति के प्रति कृतज्ञता
92.दूसरों को प्रोत्साहन
93.मन, वचन, कर्म से शुद्धता
94.जीवन में संतुलन बनाए रखना

 विधि के अधीन 6 कर्म                                         
95.हानि 
96.लाभ
97.जीवन
98.मरण
99.यश
100.अपयश

🌹कर्म तीन तरह के होते हैं-
क्रियमाण, सञ्चित और प्रारब्ध।🌹

अभी वर्तमान में जो कर्म किये
कर्म तीन तरह के होते हैं-
क्रियमाण, सञ्चित और प्रारब्ध।

अभी वर्तमान में जो कर्म किये जाते हैं, वे 'क्रियमाण' कर्म कहलाते हैं।
वर्तमान से पहले इस जन्म में किये हुए अथवा पहले के अनेक मनुष्य जन्मों में किये हुए जो कर्म संगृहीत हैं, वे 'सञ्चित' कर्म कहलाते हैं।

सञ्चित में से जो कर्म फल देने के लिये प्रस्तुत (उन्मुख) हो गये हैं अर्थात् जन्म, आयु और अनुकूल- प्रतिकूल परिस्थिति के रूप में परिणत होने के लिये सामने आ गये हैं, वे 'प्रारब्ध' कर्म कहलाते हैं।
क्रियमाण कर्म दो तरह के होते हैं- शुभ और अशुभ । जो कर्म शास्त्रानुसार विधि-विधान से किये जाते हैं, वे शुभ कर्म कहलाते हैं और काम, क्रोध, लोभ, आसक्ति आदि को लेकर जो शास्त्र-निषिद्ध कर्म किये जाते हैं, वे अशुभ कर्म कहलाते हैं।
शुभ अथवा अशुभ प्रत्येक क्रियमाण कर्म का एक तो फल- अंश बनता है और एक संस्कार-अंश। 
क्रियमाण कर्म के फल-अंश के दो भेद हैं- दृष्ट और अदृष्ट । इनमें से दृष्ट के भी दो भेद होते हैं- तात्कालिक और कालान्तरिक जैसे, भोजन करते हुए जो रस आता है, सुख होता है, प्रसन्नता होती है और तृप्ति होती है - यह दृष्ट का 'तात्कालिक' फल है और भोजन के परिणाम में आयु, बल, आरोग्य आदि का बढ़ना - यह दृष्ट का 'कालान्तरिक' फल है। 
ऐसे ही जिसका अधिक मिर्च खाने का स्वभाव है, वह जब अधिक मिर्चवाले पदार्थ खाता है, तब उसको प्रसन्नता होती है, सुख होता है और मिर्च की तीक्ष्णता के कारण मुँह में, जीभ में जलन होती है, आँखों से और नाक से पानी निकलता है, सिर से पसीना निकलता है - यह दृष्ट का 'तात्कालिक' फल है और कुपथ्य के कारण परिणाम में पेट में जलन और रोग, दुःख आदि का होना - यह दृष्ट का 'कालान्तरिक' फल है।
इसी प्रकार अदृष्ट के भी दो भेद होते हैं- लौकिक और पारलौकिक ।
 जीते-जी ही फल मिल जाय - इस भाव से यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, मन्त्र जप आदि शुभ कर्मों को विधि- विधान से किया जाय और उसका कोई प्रबल प्रतिबन्ध न हो तो यहाँ ही पुत्र, धन, यश, प्रतिष्ठा आदि अनुकूल की प्राप्ति होना और रोग, निर्धनता आदि प्रतिकूल की निवृत्ति होना - यह अदृष्ट का लौकिक' फल है और मरने के बाद स्वर्ग आदि की प्राप्ति हो जाय - इस भाव से यथार्थ विधि-विधान और श्रद्धा-विश्वास- पूर्वक जो यज्ञ, दान, तप आदि शुभ कर्म किये जाए तो मरने के बाद स्वर्ग आदि लोकों की प्राप्ति होना - यह अदृष्ट का 'पारलौकिक' फल है।
ऐसे ही डाका डालने, चोरी करने, मनुष्य की हत्या करने आदि अशुभ कर्मों का फल यहाँ ही कैद, जुर्माना, फाँसी आदि होना- यह अदृष्ट का 'लौकिक' फल है और पापों के कारण मरने के बाद नरकों में जाना और पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि बनना - यह अदृष्ट का 'पारलौकिक' फल है।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
~(गीता ३।२७)

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥
~(गीता १३ । २९)

जो भी नये कर्म और उनके संस्कार बनते हैं, वे सब केवल मनुष्यजन्ममें ही बनते हैं,
 ~(गीता ४।१२; १५।२),

पशु-पक्षी आदि योनियों में नहीं; क्योंकि वे योनियाँ केवल कर्मफल-भोग के लिये ही मिलती हैं।
यहाँ दृष्ट का 'कालान्तरिक' फल और अदृष्ट का 'लौकिक' फल-दोनों फल एक समान ही दिखते हैं, फिर भी दोनों में अन्तर है।
जो 'कालान्तरिक' फल है, वह सीधे मिलता है, प्रारब्ध बनकर नहीं; परन्तु जो 'लौकिक' फल है, वह प्रारब्ध बनकर ही मिलता है।

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