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Showing posts from February, 2026

कर्म क्या है?

#कर्म -  ~~~~~~ #कर्मफल के अनुसार ही पुनर्जन्म प्राप्त होता है। ऋषि दर्शन या  भरतीय-दर्शन के अनुसार "आत्मा" अमर है। इसका कभी भी नाश नहीं होता। कर्मों के अनादि-प्रवाह के कारण आत्मा विभिन्न योनियों को धारण करता रहता है। अनेक जन्मों के संचित कर्म-फलों को एक साथ किसी एक योनि में भोगना संभव नहीं होता, इसलिए उसे बार-बार विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। अतः उसे एक-एक करके भोगना पड़ता है। इसी कारण जीव को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र में भ्रमण करते हुए विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। #हमारे ऋषि त्रिकाल दर्शी थे, वे सूक्ष्म बातों को भी स्पष्ट रूप से देख सकते थे। उन्होंने इन सिद्धांतों को कहीं पढ़कर नहीं लिख दिया है, गहराई से कुछ मूलभुत प्रश्नों पर मन को एकाग्र करके इन सिद्धांतों को आविष्कृत किया है। उनके अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं,-१.संचित कर्म,२-प्रारब्ध कर्म,३-क्रियमाण कर्म 1- #संचित कर्म : -  अनेक जन्मों के पाप-पुण्यों द्वारा वर्तमान तक अर्जित (एकुमुलेटेड) कर्म " संचित-कर्म" कहलाते हैं।  जिस पर अभी हमारा कोई कंट्रोल नहीं है, वे सब डिपॉज़िट हो चुके हैं ।...

द्वादश ज्योतिर्लिंग

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द्वादश ज्योतिर्लिंग सर्वव्यापी शंकरजी ज्योतिर्लिंग वाराणसी में बारह स्थानों पर स्थित हैं। शिव महापुराण के अनुसार जो कोई द्वादश ज्योतिर्लिंग का दर्शन एवं स्पर्श करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। शिव महापुराण के अनुसार भगवान शिव के सभी शिवलिंगों में से प्रमुख ज्योतिर्लिंग निम्नलिखित हैं: 1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग 2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग 3. महाकाल ज्योतिर्लिंग 4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग 5. बैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंग 6. भीमेश्वर ज्योतिर्लिंग 7. रामेश्वर ज्योतिर्लिंग 8. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग 9. विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग 10. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग 11. केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग 12. घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् लघु स्तोत्रम् सौराष्ट्रे सोमनाधंच श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालं ॐकारेत्वमामलेश्वरम् ॥ पर्ल्यां वैद्यनाधंच ढाकिन्यां भीम शंकरम् । सेतुबंधेतु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥ वारणाश्यांतु विश्वेशं त्रयंबकं गौतमीतटे । हिमालयेतु केदारं घृष्णेशंतु विशालके ॥ एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः । सप्त जन्म क...

क्या चक्रव्यूह में केवल अभिमन्यु ही मारा गया था ?

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आप केवल इतना भर जानते हैं कि #चक्रव्यूह में #अभिमन्यु मारा गया था या फिर #कौरव महाबलियों ने उसे घेर कर मार दिया था? तो फिर आप रुकिये ..  #श्रीकृष्ण जिसके #गुरु हों और जो स्वंय #केशव ही का #भांजा भी हो। उसके शौर्य को फिर आधा ही जानते हैं आप तब। कुछ तथ्यों से आप वंचित हैं। क्योंकि उस लड़ाई में #अभिमन्यु ने जिन वीरपुत्र योद्धाओं को मार कर वीरगति पाई थी उनको भी जान लीजिये .. ●#दुर्योधन का पुत्र #लक्ष्मण ●कर्ण का छोटा पुत्र.  ●अश्मका का बेटा ●शल्या का छोटा भाई ●शल्या के पुत्र रुक्मरथ ● दृघलोचन Drighalochana ● कुंडवेधी Kundavedhi ● सुषेण Sushena ● वसत्य Vasatiya ● क्रथा और कई योद्धा ... और ये तब था जब ... उस चक्रव्यूह को जिसे अभिमन्यु को भेदना था ..उसके प्रत्येक द्वार - पहले से लेकर सातवें  पर योद्धाओं को देखिये - १) #अश्वथामा २) #दुर्योधन ३)#द्रोणाचार्य 4) #कर्ण ५) #कृपाचार्य ६) #दुशासन 7) #शाल्व (दुशासन के पुत्र) अभिमन्यु के प्रवेश के बाद ही #जयद्रथ ने प्रथम प्रवेशद्वार पर #पांडवों के प्रवेश को रोक दिया था। चक्रव्यूह जो कि #कुरुक्षेत्र के सबसे खतरनाक युद्ध तंत्र म...

भगवान ब्रह्मा की आयु

वेदों के अनुसार भगवान ब्रह्मा की आयु.. ये हमारे पुराणों में वर्णित सबसे रोचक जानकारियों में से एक है। चलिए इसे सरल भाषा में समझाने का प्रयास करता हूँ। पहली बात तो पुराणों की गणना के अनुसार 360 दिनों का एक वर्ष होता है, 365 दिनों का नही। इसे हम मानव वर्ष कहते हैं। जब मनुष्यों का एक वर्ष पूरा होता है तब देवताओं और दैत्यों का 1 दिन पूरा होता है। देवताओं और दैत्यों के दिन समान होते हैं पर उल्टे होते हैं। मतलब जब देवताओं का दिन होता है तो दैत्यों की रात्रि होती है। देवों और दैत्यों के एक वर्ष को दिव्य वर्ष कहा जाता है। मतलब 360 मानव वर्ष = 1 दिव्य वर्ष। हमारा समय चार युगों में बंटा है - सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलियुग। सतयुग का कुल कालखंड 4800 दिव्य वर्षों का होता है। अर्थात 1728000 मानव वर्ष। त्रेता का कुल कालखंड 3600 दिव्य वर्षों का होता है। अर्थात 1296000 मानव वर्ष। द्वापर का कुल कालखंड 2400 दिव्य वर्षों का होता है। अर्थात 864000 मानव वर्ष। कलियुग का कुल कालखंड 1200 दिव्य वर्षों का होता है। अर्थात 432000 मानव वर्ष। इन चारों को मिला दिया जाए तो उसे चतुर्युग या महायुग कहते हैं। वो ह...

मृत्यु : अंत नहीं, एक प्रक्रिया

🔱 मृत्यु : अंत नहीं, एक प्रक्रिया (वेद, योग, आयुर्वेद और पुराणों की दृष्टि से) भारतीय दर्शन में मृत्यु को अचानक घटित होने वाली घटना नहीं माना गया है, बल्कि यह एक दीर्घ प्रक्रिया है। योग और आयुर्वेद के अनुसार, चाहे मृत्यु काल मृत्यु हो या अकाल मृत्यु, उसकी तैयारी शरीर और चेतना में लगभग छह माह पूर्व आरंभ हो जाती है। जहाँ जन्म लेने में नौ माह लगते हैं, वहीं शरीर के क्षय की यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम समय—लगभग छह माह—में पूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि भारतीय योग परंपरा कहती है कि स्थूल शरीर में रोग प्रकट होने से पहले, वही विकार सूक्ष्म शरीर में जन्म ले चुका होता है। यदि उस अवस्था में साधना, संयम, आयुर्वेद और ध्यान द्वारा उपचार हो जाए, तो कई रोगों और अकाल मृत्यु को टाला जा सकता है। ⸻ 🌿 जन्म–मृत्यु का चक्र और चिरंजीवी की अवधारणा हिंदू शास्त्रों में जन्म और मृत्यु को एक अनवरत चक्र बताया गया है—जो कर्म के नियम से संचालित होता है। फिर भी पुराणों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ कुछ महापुरुषों ने इस चक्र को साधना से चुनौती दी। चिरंजीवी माने जाने वाले प्रमुख नाम हैं—  • भगवान परशुराम  • ...

शालिग्राम क्या है? भगवान विष्णु का साक्षात् स्वरूप

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🕉️ शालिग्राम क्या है? — भगवान विष्णु का साक्षात् स्वरूप 🌿 सनातन धर्म में शालिग्राम केवल एक पत्थर नहीं, बल्कि भगवान विष्णु का जीवंत, स्वयं-प्रकट (स्वयंभू) स्वरूप माना जाता है। जिस प्रकार शिवलिंग शिव का प्रतीक नहीं बल्कि स्वयं शिव हैं, उसी प्रकार शालिग्राम स्वयं नारायण हैं। 🌊 शालिग्राम की उत्पत्ति शालिग्राम मुख्यतः गंडकी नदी (नेपाल) से प्राप्त होते हैं। पुराणों के अनुसार:  • गंडकी नदी स्वयं तुलसी माता का रूप हैं  • शालिग्राम विष्णु का रूप हैं  • इसलिए तुलसी और शालिग्राम का संबंध दांपत्य जैसा माना गया है इसी कारण शालिग्राम पूजन तुलसी पत्र के बिना अधूरा माना जाता है। ⸻ 🔱 शास्त्रीय मान्यता पद्म पुराण में कहा गया है: “शालिग्राम शिला यत्र, तत्र सन्निहितो हरिः” जहाँ शालिग्राम है, वहाँ स्वयं हरि (विष्णु) निवास करते हैं।  • शालिग्राम की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं करनी पड़ती  • यह सदैव पूज्य होता है  • गृहस्थ के लिए यह सबसे सरल और पूर्ण विष्णु पूजा मानी जाती है 🌸 शालिग्राम के प्रकार (संक्षेप में) शास्त्रों में 12, 24, 108 तक शालिग्रामों का वर्णन...