कर्म क्या है?

#कर्म - 
~~~~~~
#कर्मफल के अनुसार ही पुनर्जन्म प्राप्त होता है। ऋषि दर्शन या  भरतीय-दर्शन के अनुसार "आत्मा" अमर है। इसका कभी भी नाश नहीं होता। कर्मों के अनादि-प्रवाह के कारण आत्मा विभिन्न योनियों को धारण करता रहता है। अनेक जन्मों के संचित कर्म-फलों को एक साथ किसी एक योनि में भोगना संभव नहीं होता, इसलिए उसे बार-बार विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है। अतः उसे एक-एक करके भोगना पड़ता है। इसी कारण जीव को बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र में भ्रमण करते हुए विभिन्न योनियों को धारण करना पड़ता है।

#हमारे ऋषि त्रिकाल दर्शी थे, वे सूक्ष्म बातों को भी स्पष्ट रूप से देख सकते थे। उन्होंने इन सिद्धांतों को कहीं पढ़कर नहीं लिख दिया है, गहराई से कुछ मूलभुत प्रश्नों पर मन को एकाग्र करके इन सिद्धांतों को आविष्कृत किया है। उनके अनुसार कर्म तीन प्रकार के होते हैं,-१.संचित कर्म,२-प्रारब्ध कर्म,३-क्रियमाण कर्म

1- #संचित कर्म : -  अनेक जन्मों के पाप-पुण्यों द्वारा वर्तमान तक अर्जित (एकुमुलेटेड) कर्म " संचित-कर्म" कहलाते हैं।  जिस पर अभी हमारा कोई कंट्रोल नहीं है, वे सब डिपॉज़िट हो चुके हैं । 

2- #प्रारब्ध : - = प्रा = पूर्व, आरब्ध = अर्थात पूर्व संचित कर्म के जिस भाग को हमें चाहे-अनचाहे भोगना ही पड़ता है, वह प्रारब्ध कहलाता है।   संचित कर्मों का ही एक भाग प्रारब्ध के रूप में हर जीव को भोगना पड़ता है। प्रारब्ध कर्म धनुष पर चढ़ा  ऐसा तीर है- जो मनुष्य के हाथ से छूट चुका हैं। अब उसे आप रोक नहीं सकते , शुभ या अशुभ जैसे भी कर्म हुए, वे हो चुके हैं। हम चाहकर भी वापस भूतकाल में नहीं जा सकते जहां जाकर हम उनका सुधार कर सकें। 

3- #क्रियमाण कर्म : -  वर्तमान मे जो कर्म हो रहा है, वह क्रियमाण है। मनुष्य का वर्तमान जीवन अति महत्वपूर्ण है और उससे भी महत्वपूर्ण है केवल मनुष्यों के द्वारा किये जाने वाला पुरुषार्थ अथवा क्रियमाण कर्म ! उनके संबंध में यदि हम कुछ कर सकते हैं तो वर्तमान के क्रियमाण कर्म के रूप में। वर्त्तमान शरीर द्वारा होने वाले प्रत्येक पाप और पुण्यात्मक कर्मो को "क्रियमाण-कर्म" कहते हैं।  जन्म से मृत्यु के बीच का जो हमारा वर्तमान जीवन काल है, इस अवधि में मिलने वाले दुखों से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए? हमें काम्यकर्म करना चाहिये, और निषिद्ध कर्मों से बचना चाहिये।

क्रियमाण कर्म में 6 प्रकार के (क्रियमाण ) कर्म हैं

१. काम्य कर्म, 
२. निषिद्ध कर्म 
३. नित्य कर्म, 
४. नैमितिक कर्म,
५. प्रायश्चित कर्म और 
६. उपासना कर्म 

१.#काम्य कर्म (किसी मकसद से किया हुआ कार्य) : - कुछ लोग किसी खास उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही कर्म करते हैं। स्वर्ग क्या है, कहाँ है- जानते नहीं पर उसमें विश्वास करते हैं। इसलिये स्वर्गप्राप्ति की इच्छा से यज्ञ करते हैं, मंदिर या तालाब बनवाते हैं, दान-पुण्य आदि सद कर्म (धार्मिक अनुष्ठान ) करते हैं। इसे ही काम्य कर्म कहा गया है।

२. #निषिद्ध कर्म (नहीं करने योग्य कर्म) : -  प्रत्येक धर्म शास्त्र में कुछ निषिद्ध कार्यों को नहीं करने के लिये स्पष्ट रूप से (categorically) आदेश दिया गया है। किसी भी प्राणी को दुःख मत पहुँचाओ, डोन्ट हार्म अदर्स ! किन्तु कुछ लोग दूसरों को दुःखी करने , नुकसान पहुँचाने या मार देने तक की इच्छा रखते है या करते  हैं। 

३. #नित्य कर्म (दैनिक कार्य) : -  शास्त्रों में कुछ कार्यों को दैनन्दिन जीवन में अवश्य करने की आज्ञा (injunction) भी दी गयी है। स्नान, संध्या आदि जो हमेशा किए जाने वाले कर्म हैं उन्हें नित्यकर्म कहते हैं। इनके करने से कुछ विशेष फल अथवा अर्थ की सिद्धि नहीं होती, परन्तु न करने से दोष अवश्य लगता है।जैसे महामण्डल में मनुष्य बनने के लिये पाँच नित्य कर्म बताये गए हैं , जिनका अभ्यास हमें प्रतिदिन करना चाहिये। वे क्या हैं ? प्रार्थना, मंसंयोग, व्यायाम, स्वाध्याय और विवेक-प्रयोग ।

४. #नैमित्तिक कर्म : -  परीक्षा में सर्वोत्तम अंक प्राप्त करने के लिए या नौकरी पाने के लिए किया जाने वाला काम नैमित्तिक कर्म है। जैसे वर्षा होने के लिए या पुत्रप्राप्ति के लिए, या पुत्र-पुत्री का विवाह हो जाय, इस इच्छा से यज्ञ करना। नैमित्तिक कर्म वे कहलाते है, जो किसी विशेष निमित्त को लेकर खास-खास अवसरों पर आवश्यकरूप से किये जाते है । जैसे पितृपक्ष ( आश्र्विन कृष्णपक्ष) में पितरो के लिए श्राद्ध किया जाता है।  नैमित्तिक कर्मो को भी शास्त्रों में आवश्यक कर्तव्य बतलाया गया है।  और उन्हें भी कर्तव्य रूप से बिना किसी फलासंधि के करने की आज्ञा दी गयी है; परन्तु उन्हें नित्य करने की आज्ञा नहीं दी है। यह नित्य और नैमित्तिक कर्मो के भेद है | 

५. #प्रायश्चित : - प्रायश्चित का अर्थ छमा है। दंड और प्रायश्‍चित में भेद यह है कि अपने पाप का प्रायश्‍चित करनेवाले व्यक्ति को पश्‍चाताप होता है । प्रायश्‍चित लेनेवाला व्यक्ति, अपनी प्रतिज्ञा से बंधा होता है । वह अपनी प्रतिज्ञा का पूरी लगन से पालन करता है, तदुपरांत सदाचारी बन जाता है ।

६. #उपासना कर्म : - 'BE AND MAKE' ! (बिना किसी स्वार्थ के किया हुआ कार्य),  एक विशेष प्रवृत्तिवाली जीवात्मा ' योग्यं योग्येन युज्यते ' इस नियमानुसार उसी शरीर में जन्म ग्रहण करती है, जो उस प्रवृत्ति के प्रकट करने के लिए सब से उपयुक्त आधार हो । यह विज्ञानसंगत है, क्योंकि विज्ञान हर प्रवृत्ति की व्याख्या आदत से करना चाहता है, और आदत की आवृत्तियों से-अर्थात एक ही कार्य को पुनः पुनः दुहराते रहने से आदत बनती  है, और आदत ही परिपक्व होकर प्रवृत्ति बन जाती है । अतएव नवजात जीवात्मा की नैसर्गिक आदतों की व्याख्या के लिए प्रवृत्ति-निर्माण की प्रक्रिया को समझना अनिवार्य हो जाता है । और चूँकि वे प्रस्तुत जीवन में प्राप्त नहीं होती, अतः वे पिछले जीवनों से ही आयी होंगी । "  

#विशेष 
~~~~~~
गीता में लिखा है - 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

अर्थात 

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं |
इसलिये अच्छा कर्म कीजिए ,क्योंकि-समय तुमको बदले इससे पूर्व तुम ही स्वयं को बदल लो- यही कर्म का मूल सिद्धांत है।

।। जय श्री कृष्ण ।।
~~~~~~~~~~

Comments

Popular posts from this blog

आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार

आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है?

भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है