धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

प्रस्तावना एवं आशीवाद

श्रीमद्भगवद्‌गीता के प्रथम श्लोक में सर्वप्रथम लिखे दो शब्द 'धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र' स्वयमेव पूर्ण हैं एवं समस्त गीता का दिव्य सन्देश संजोए हुए हैं। वह दिव्य संदेश है 'क्षेत्रे क्षेत्रे धर्म कुरु' अर्थात आप जहाँ भी हों, जिस स्थिति में हों धर्म को अपनाएँ। धर्म का तात्पर्य हिन्दु सिख, ईस्लाम, जैन या पारसी धर्मानुयायी होना नहीं अपितु धर्म कार्य करना है अपना कर्तव्य निभाना है जिरा का विस्तृत क्षेत्र है मानव सेवा।

प्रभु ने हमें मानव जीवन एक अमूल्य रत्न दिया है और उस के बदले में हमारा भी कुछ कर्तव्य है कि हमने प्रभु कार्य, कितना किया। दूसरे शब्दों में हम यूं भी कह सकते हैं कि हरि गभी में आत्मस्वरुप व्याप्त है तो हम मानव मानव के लिए क्या धर्म कार्य कर रहे हैं।

'मानव धर्म है- मानव सेवा'। मानव सेवा द्वारा ही समाज सेवा एवं देश सेवा संभव हो सकती है। इस प्रकार मानवसेवा देश सेवा हेतु प्रथम सोपान है। यदि हम मानव सेवा का संकल्प लेते हैं तो अन्य रोवांए अवश्य फलीभूत होंगी। इसी आशय को सार्थक बनाने हेतु मेरे द्वारा मानव धर्म मिशन की स्थापना की गई थी। इस मिशन के मुख्य उद्देश्य हैं नैतिक मूल्यों का निर्माण, आत्मिक एंव आध्यात्मिक विकास के लिए साहित्य सृजन सत्संग साधना एवं उपयुक्त धार्मिक स्वंयसेवी संस्थाओं द्वारा एवं पूजास्थलों की स्थापना। श्री ढल जी द्वारा विरचित पुस्तक मिशन के इन्हीं सिद्धान्तों को प्रतिपादित करती है।

सदसाहित्य मानव के आध्यात्मिक विकास एवं नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा हेतु नितान्त आवश्यक है। भगवद् प्रेमी वही होते हैं जो उस की सृष्टि से अपना नाता जोड़ कर एक हो जाते हैं और सब के सुःख दुःख के भागी होते हैं। वे भाग्यशाली दूसरों की सहायता हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। इसी उद्देश्य को सार्थक करने हेतु मानव धर्म मिशन के अन्र्तगत स्वंय गेवी संस्था श्री भारतीय सनातन धर्म महावीर दल का शुभारम्भ 1972 में किया गया तब से ही श्री ढल जी दल के सक्रिय कार्यक्रर्ता एंव महामन्त्री हैं। अस्तु इन के द्वारा धर्मक्षेत्र एवं समीचीन है। धार्मिक परम्पराओं एवं नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा में इन की गहरी अभिरुचि है और ससाहित्य का सृजन आज के विकराल समय की मांग है। ऐसे कलिकाल में मानव संवा हेतु कुछ दिशा बोध संभव हो सकता है तो केवल मात्र सद्साहित्य द्वारा ही हो सकता है। श्री ढल जी का यह प्रयास वास्तव में प्रशंसनीय है। मुझे विश्वास है कि इस प्रकार प्रभुद्ध लेखन कार्य वे भविष्य में भी करते रहेंगे। मेरा आर्शीवाद सदैव उनके साथ है।

मानव भवन

कुरुक्षेत्र

गुलजारी लाल नंदा संस्थापक मानव धर्म मिशन
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

दो शब्द

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पावन पुनीत धरा से मेरा लगभग 44 वर्षों से निकट एवं गहन सम्वन्ध रहा है। प्रस्तुत रचना इसी गहन सम्बन्ध, धार्मिक निष्ठा एवं अटूट विश्वास का फल है। वर्ष 1947 से ही हम पश्चिमी पाकिस्तान से यहाँ आए तो पूज्य गोलोकवासी गुरुवर श्रद्धेय स्वामी दुर्गागिरि जी महाराज एवं पूज्य माता स्वर्गीय श्रीमति सुमित्रादेवी जी का यही स्वप्न था कि इस पावन धरा का यशोगान मुग्ध कण्ठ से किया जाए। उन्होंने संभवतः कुरुक्षेत्र की पावन महिमा को हृदयरत्त किया हुआ था। महाराज श्री उच्चकोटि के संत ही नहीं थे एवं सर्वदा परोपकार के लिए तत्पर रहते थे। उन्हीं के चरणों में बैठकर मुझे भी कई वर्षों तक उनके सत्संग प्रवचन एवं संकीर्तन श्रवण करने का सौभग्य प्राप्त हुआ। श्री हनुमान मंदिर सब्जी मण्डी जिस का विवरण 'कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध मंदिर' शीर्षक के अन्तर्गत किया गया है पूज्य महाराज जी * के चरणों के प्रताप का जीता जागता उज्जवल स्वरूप है। यहाँ पहले एक छोटी सी हनुमान जी की प्रतिमा, शिव लिङ्ङ्ग तथा पीपल का वृक्ष था, परन्तु आज जनता जनार्दन के सहयोग से श्री हनुमान मंदिर कम्पलैक्स का भव्य निर्माण हो चुका है जिस के अन्तर्गत भगवान शंकर-पार्वती, दुर्गा माँ, श्री हनुमान जी की भव्य प्रतिमायें स्थापित की जा चुकी हैं। सुन्दर संत निवास, वाचनालय तथा निःशुल्क औषाधालय का निर्माण भी हो चुका है। अतः संतजनों के पावन आर्शीवाद का फल है इस पुस्तक की संरचना जो पाठक के हाथ में है।

प्रस्तुत पुस्तक किसी पूर्णाता का दावा नहीं करती। कारण ज्ञान का सागर असीम एंव अगाध है और त्रुटियों का रहना संभव है। श्री मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में भूल इस भाव में मनुष्य से होती है और अंत में सुधारता है वही। इस सम्बन्ध में अधिकारी एवं प्रतिष्ठित विद्वान जो भी सुझाव प्रदान करेंगे उन का सहर्ष स्वागत है। पुस्तक प्रणयन में अनेक विद्वानों की कृतियों का उन के लेखों एवं सुझावों को समाहित किया गया है उन सब के प्रति लेखक हृदय से आभारी है। पुस्तक की प्रस्तावना के रुप में परम श्रद्धेय राजार्षि श्री गुलजारी लाल नंदा संस्थापक मानव धर्म मिश्न भूत पूर्व अध्यक्ष कुरुक्षेत्र विकास मण्डल को वस्तुतः अपना आर्शीवाद प्रदान किया है जिनका मैं सदैव आभारी रहूंगा।

कुरुक्षेत्र

गीता जयन्ति (16 XII. 1991)

के. एल. ढल

2

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

भारत में ही नहीं विश्व भर में कुरुक्षेत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। कुरुक्षेत्र प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक चिन्तन का उद्गम स्त्रोत रहा है। कुरुक्षेत्र की लोकप्रियता एवं प्रसिद्धि पर दृष्टिपात करें तो इस की पावन गरिमा की श्रृंखला इस प्रकार बनती है-

सर्वप्रथम स्वंयभू प्रजापति ब्रहमा को ज्ञानस्वरुप वेद भगवान का दर्शन इसी स्थान पर हुआ। इस प्रकार वैदिक संस्कृति का प्रादुर्भाव इसी पावन धरा पर हुआ। कुरुक्षेत्र भूमि का कण कण स्वयं में एक तीर्थ रुप है। इसके समीपवर्ती भाग में प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति जन्मी फूली एवं विश्व भर में ख्याति को प्राप्त हुई। अस्तु विश्व रचना का आधः स्थल कुरुक्षेत्र को ही माना जाता है।

तैतरीय ब्राह्मण के अनुसार दैवा वै सत्रामासत् तेषां कुरुक्षेत्र वेदि आसीत " अर्थात देवताओं ने पुण्यमयी सरस्वती के पावन पट पर यज्ञ किये और उन की वेदि कुरुक्षेत्र में ही थी। शतपथ ब्राह्मण ग्रन्थ में भी ऐसा उल्लेख मिलता है कि देवताओं ने यहीं पर सैंकड़ों यज्ञ किए

" अविभुक्तंवै कुरुक्षेत्रं देवानां देवयजनं "

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पावन पुनीत धरा पर ही योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने मानवता को श्रीमद्भगवद्‌गीता का दिव्य सन्देश प्रदत्त किया। यह दिव्य सन्देश समस्त भारतीय चिन्तन एवं दर्शन का सार है। इस अलौकिक ज्ञान ने मानव पर जो हृदयस्पर्शी छाप छोड़ी है उसे विश्वभर में असंख्य प्रशंसक दर्शन का अनुपम एवं सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ मानते हैं।

शास्त्रों के अनुसार कुरुक्षेत्र द्वादश योजन अठतालीस कोस अथवा लगभग एक सौ भाठ किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में फैला महाजनपद प्रदेश है। (केवल मात्र थानेसर तहसील अभवा कुरुक्षेत्र ज़िला नहीं) एवं यह प्रदेश अत्यन्त पवित्र माना जाता है।

महाभारत वन पर्व के अनुसार कुरुक्षेत्र सरस्वती नदी के दक्षिण में तथा इषद्वती नदी के उत्तर में स्थित है। इस का आदि नाम ब्रहमावर्त अथवा ब्रह्मवेदि था, आगे चलकर नागध्द, रामहृद, समन्तपंचक और पुनः राजा कुरु के भूमि कर्पण के पश्चात कुरुक्षेत्र सर्वप्रतिष्ठित हुआ।

आद्यं ब्रह्मसरं पुण्यं ततो नागहृदं स्मृतम्। 
कुरुणां ऋषिणा कृष्टं कुरुक्षेत्र ततः स्मृतम् ।।

3

कुरुक्षेत्र की रक्षा चारों दिशाओं में चार यक्ष करते हैं। -
तरन्तुक (वर्तमान रतगल ग्राम में स्थित है)
अरन्तुक (बहिर ग्राम में स्थित है)
रामहद (वर्तमान राम राय में स्थित है)
मचकुक (वर्तमान सींख गांव में स्थित है)

विभिन्न पुराणों में कुरुक्षेत्र की महिमा का यशोगान कुछ इस प्रकार किया गया हैः

जो लोग इस क्षेत्र की रक्षा करते हैं, यहां के सरोवरों में स्नान करते हैं अथवा क्षण भर के लिए भी यहां रहते हैं अथवा इस क्षेत्र में शरीर छोड़ते हैं वे मृत्युपरान्त सीधे स्वर्ग को जाते हैं। इस पावन भूमि का नाम लेना भी एक महान पुण्य कार्य है। नारद पुराण में तो यहां तक कहा गया कि कुरुक्षेत्र के समान न तो कोई (स्थान) हुआ न होगा। यहां सेवन करने वाला मनुष्य पुनः मृत्युलोक में नहीं आता।

कुरुक्षेत्र सम तीर्थं न भूतं न भविव्यति। 
तत्र द्वादश यात्रास्तु कृत्वा भूयो न जन्मयाक ।।

बामनपुराणानुसार कुरुक्षेत्र में वायु वेग से उड़ी हुई धूलि भी यदि शरीर से स्पर्श कर आए तो बुरे कर्मों के पाप स्वमेव नष्ट होकर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुनासमुदीरताः 
महा दुष्कृत कर्माणः प्राप्यन्ति परं पदम।।
वायु पु० 45/33/

अपवित्र अथवा पवित्र अथवा सशर्वास्या प्राप्त जो भी व्यक्ति कुरुक्षेत्र का स्मरण करे तो वह बाहर तथा भीतर अर्थात मन एवं शरीर से पवित्र हो जाता है।

अपवित्र पवित्रो वा सर्वांवस्थां गतोऽपि वा
यः स्मरेत् कुरुक्षेत्रं स बाहाभ्यन्तरः शुचि ।
वामन 12/61

दूर रहते हुए भी जो मनुष्य 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊंगा', 'वहां निवास करूंगा', इस प्रकार सदा कहता है, वह सभी पापों से छूट जाता है।

दूरस्थोऽपि कुरुक्षेत्रे गच्छामि च वसाभ्यहम्। 
एवः यः सततं नुयात् सोऽपि पापै प्रमुच्यते ।।

4

कुरुक्षेत्रे गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्। 
सः एव सततं ब्रूयात सर्व पापैः प्रमुच्यते ।।
वाम० 12/7

कुरुक्षेत्र जाऊंगा और मैं कुरुक्षेत्र में निवास करुगा, इस प्रकार का वचन कहने वाला मनुष्य सब पापों से छूट जाता है।

ब्रहज्ञानं गया श्रद्धं गो गृहे मरणं तथा 
वासः पुसां कुरुक्षेत्रे मुक्ति रुक्ता चतुर्विधाः।
वामन 12/8

मनुष्य के लिए ब्रह्मज्ञान, गया में श्राद्ध, गौ की रक्षा हेतु मृत्यु एवं कुरुक्षेत्र में निवास, बार प्रकार की मुक्ति बतलाई गई है। महाभारत वनपर्व एवं पद्मपुराण में उल्लेख आया है कि पृथ्वी पर नेभिपारण्य तीर्थ, अन्तरिक्ष में पुष्कर तीर्थ श्रेष्ठ है परन्तु तीनों लोकों में कुरुक्षेत्र सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है

पृथ्थ्यां नैमियं तीर्थ अन्तरिक्षे च पुष्करम्। 
त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते ।।
वन 83/202/ मतस्य 108/3 पहा 27/87

मत्स्य पुराण के अनुसार कुरुक्षेत्र सर्व श्रेष्ठ तीर्थ है। एवं महापुण्यशाली कुरुक्षेत्र में प्रयागादि तीर्थ समाहित है-

संगमे यत्र तिष्ठति गंगायां पितरः सदा। 
कुरुक्षेत्र महापुण्यं सर्व तीर्थ समन्वितम्।।
मत्स्य 22/8

कुरुक्षेत्र पुण्य भूमि पर काम्यक् अदित्ति, व्यास, फल्कि, सूर्य, मधु और सीवन (शिव) इन नामों से सात वन हैं। सरस्वती दृषद्वती, वैतरणी, गंगा, मंदाकिनी, मध्रस्वा, कौशिकी एवं हिरण्यवती सात ही पवित्र नदियां हैं।

थानेसर, जींद, सफीदों, कैथल, कलायत, पुण्डरी, पेहोवा सात प्रसिद्ध नगर हैं। इसमें चार प्रसिद्ध कूप हैं। - देवीकूप (शक्तिकूप), चन्द्रकूप, विष्णुकूप तथा रुद्रकूप।

5

आधुनिक नगर थानेसर में चार प्रसिद्ध धाम है। श्री गीताधाम, श्रीकृष्णधाम, श्रीवेदधाम एवं मानवधाम। सोमावती अमावस्या एवं सूर्यग्रहण के अवसर पर भारी पर्व रुप में यहां विशाल मेला लगता है जिसमें श्रद्धालु स्नान ध्यान द्वारा अपने को कृतकृत्य करते हैं। सूर्यग्रहण के अवसर पर सन्निहित तीर्थ पर स्नान का महत्व महाभारत वन पर्व में इस प्रकार मिलता है:-

सन्निहित्या मुप स्पृश्य राहु ग्रस्ते दिवाकरे। 
अश्वमेधं शतं तेन इष्टं भवति शाश्वतम्।।
वनपर्व० 81/67

सूर्यग्रहण के अवसर पर इस तीर्थ का स्पर्शमात्र करने से सौ अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

कुरुक्षेत्र के पांच प्रसिद्ध सर हैं ब्रह्मसर, सत्रिहित, ज्योति, स्थाणु तथा कालेसर । कुरुक्षेत्र के पवित्र शिव तीर्थ हैं स्थाणेश्वर, कालेश्वर, दुःखभंजनेश्वर, सर्वेश्वर एवं संगमेश्वर।

कुरुक्षेत्र के दर्शनीय स्थल है बिरला मंदिर, बाणगंगा, (भीष्मकुण्ड), मंदिर श्रीलक्ष्मी-नारायण, मंदिर कौरव पांडव, गीताभवन, श्री हनुमान मंदिर इत्यादि।

यात्रियों के निवास हेतु यहां धर्मशालाएं हैं जिनमें प्रमुख श्रीसंतराम अरोड़ा धर्मशाला (श्रीकृष्णधाम), सैनीसमाज, जाट धर्मशाला, काली कमली, पालगडरिया एवं श्री ब्राह्मण धर्मशाला, ताराचन्द धर्मशाला तथा अरोड़ा धर्मशाला इत्यादि।

कुरुक्षेत्र में एवं समीपवर्ती स्थानों में विभिन्न पुराणों में वर्णित तीन सौ पैंसठ तीर्थ हैं जिनकी सूचि परिशिष्ट में दी गई है। प्रसिद्ध स्थानों का विवेचन यथास्थान किया गया है।

अस्तु कुरुक्षेत्र वास्तव में भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का उद्‌गम स्त्रोत है। इस पावन पुनीत एवं ऐतिहासिक स्थल को जीवित एवं पुर्नर्जागरण करने का श्रेष जाता है, कुरुक्षेत्र विकास मंडल के वर्तमान अध्यक्ष, माननीय श्री गुलज़ारीलाल जी नंदा को जिन के तत्वाधान में सरोवरों की नवीन छवि एवं मन्दिरों की प्रतिष्ठा स्पष्टतया उभर कर सामने आई है। इस भूमि के पग पग पर तीर्थ हैं। कण कण में गीता का उदघोष है। आवश्यकता है तो बस श्रद्धा एवं विश्वास की, इस स्थल के पूर्ण खोज की ताकि हम इस विश्व प्रसिद्ध धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की नैसर्गिक प्रतिभा एवं अलौकिक सम्पदा को मानव मात्र को समर्पित कर राकें।

यहां किया हुआ पुण्य कार्य तेरह दिन तक तेरह गुणा बढ़ता है तभी तो भगवान ने गीता के प्रथम अध्याय में ही " धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र" कह कर सम्बोधित करवाया है।

कुरुक्षेत्र को पुण्य एवं पावन घरा, मन्दिरों एवं तीर्थों की धरती कहा जाता है। यह अठतालीस कोस की धरती लगभग तीन सौ पैसठ तीथों से सुशोभित है। यहीं वह धर्मक्षेत्र है जहां आज से

6

पांच हज़ार वर्ष पूर्व योगेश्वर भगवान कृष्ण ने सर्व वेदों एवं उपनिपदों का सार श्रीमद्भगवद्‌गीता का उपदेश समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए प्रक्ष्त किया। गीता का अमर सन्देश "कर्मयोग" सारे विश्व के लिए प्रेरणा का सन्देश है। इसलिए इसे लगभग विश्व की सभी भाषाओं में अनुदित किया जा चुका है। ऐसी पावन पुनीत घरा जो आज भी मनुष्य को सुकर्म एवं सुधर्म की प्रेरणा देती है, वास्तव में अर्चनी है, वन्दनीय है। दिव्य ज्ञान की प्रदायिनी यह धरती मानव मूल्यों की पोपक है, ज्ञान विज्ञान की उद्‌घोषक है, शस्यश्यामला एवं रमणीय है।

धर्म की परिभाषा का विवेचन करते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं:-
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं ध्रुवम् । 
परोपकार पुण्याय पापाय परपीड़नम्।।

परोपकार के समान कोई धर्म अथवा पुण्य नहीं एवं दूसरे को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं। श्रीरामचरित मानस के प्रणेता कविवर तुलसी ने यही भाव इस प्रकार दोहराया है-

परहित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधभाई।।

जीवन के इस कर्मक्षेत्र में धर्म का पालन करने से ही पुण्य प्राप्त होता है। अतः हम मन, वाणी एवं कर्म से किसी प्रकार भी किसी जीव को कष्ट न दें। हृदय क्षेत्र में प्रेमतत्व को बसाकर ही हम ब्रहमक्षेत्र में जा सकते हैं। मन में सद्भाव अपनावें। कुभावों का परित्याग करें। जगन में जैसा भाव हम जीवन के प्रति रखेंगे वैसा ही प्रतिभाव हमें प्राप्त होगा। कुभाव मन को बिगाड़ता है, रा‌द्भाव उसे युद्ध बनाता है। अतः मानव में मागध को जानकर सदा ही सेवाभाव से मन को प्रसन्न रखना चाहिए। अतः जीवन में पुण्यकार्यों का संचय ही धर्म है सद्भाव, कर्तव्यपरायणता एवं मानव मात्र से प्रेम इत्यादि स‌द्भाव जब हमारे हृदय क्षेत्र में बस जाएंगे तो ब्रह्मक्षेत्र जाने में अर्थात भगव‌द्माप्ति में तनिक भी बाधा न होगी।

एक कवि ने इसी भाव को बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है--
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में
याद दिलाता है हम को,
धर्म से ही बढ़ना है आगे हम को,
धर्म से ही निभाना है प्रेम हम को। हृदय क्षेत्र में बसाकर सब को,
ब्रह्मक्षेत्र में पहुंचना है हम को।

7

कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यूं कहा जाता है इसका विवरण हमें श्रीमद्भगवद्‌गीता, महाभारत एवं विभित्र पुराणों में इस प्रकार मिलता है

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । 
मामकाः पाण्डवाश्रचैव किमकुर्वत संजय ।। गीता 1/1

कुरुक्षेत्र गमिष्यामि कुरुक्षेत्र वसाम्यहम्। 
इत्येव वाचसुत्सृज्य सर्व पाप प्रभुच्यत ।।
महाभारत वनपर्व 83/21

" मैं कुरुक्षेत्र जाऊंगा और मैं कुरुक्षेत्र में निवास करुगा।" इस प्रकार का वचन कहने में ही मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

देवता ऋष्य | सिद्धा | सेवन्ते कुरुजांगलम्। 
तस्य से सेवनानित्यं ब्रह्म चात्त्मनि पश्यति।।
वामन सरो 2/13

देवता श्रपि एवं सिद्ध पुरुष सदा कुरुक्षेत्र का सेवन करते हैं। वहां नित्य रहने से मनुष्य अपने भीतर ब्रह्म का दर्शन करता है।

ग्रह नक्षत्र ताराणां कालेन पतनाद्भयम्। 
कुरुक्षेत्रे मृताणां च पतन नैव विद्यते ।।

समय आने पर ग्रह नक्षत्र तारागण आदि को भी पतन का भय होता है किन्तु कुरुक्षेत्र में भरने वालों का कभी पतन नहीं होता।

अस्तु इस महान पवित्र स्थल की महिमा इतनी अधिक है वि. जिस में उड़ी हुई धूलि का कण अति निकृष्ट व्यक्ति को पवित्र बनाने की क्षमता रखता है तो धार्मिक एवं सदाधारी बनकर रहने से तो निश्चय ही परमतत्त्व की प्राप्ति हो सकती है। कुरुक्षेत्र के नामोच्चरण से ही कुल पवित्र हो जाता है धर्मनिष्ट बनकर यहां निवास करने से हमें कितना पुण्य होगा इसका अनुमान लगाना कठिन है।

8
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

नामकरण

कुरुक्षेत्र से शाब्दिक अर्थ है कुरु का क्षेत्र अर्थात कुरु के नाम से ही इस क्षेत्र का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा । कुरु भरतवंशी महाराज संवरण के पुत्र थे। सूर्यकन्या तपती उनकी माता थी। कुरु की शुभांगी तथा वाहिनी नाम की दो स्त्रियां थी। वाहिनी के पांच पुत्र थे जिसमें कनिष्ट का नाम जनमेजय था जिसके वंशज धृतराष्ट्र एवं पाण्डु हुए। कुरु के अन्य पुत्रों के नाम विदूग्ध, अश्वरत, अभिष्यत्, चैत्ररथ तथा मुनि और जनमेजय हैं। इस प्रकार कुरु कौरवों एवं पाण्डवों के पूर्वज थे इनका वंश भी इन्हीं के नामानुसार "कुरु" नाम रो प्रसिद्ध हुआ। राज्य भार ग्रहण करने के बाद इन्होंने पृथ्वी पर भ्रमण करना प्रारंभ किया। जब वे समन्तपंचक पहुंचे तो कुरु ने उस क्षेत्र को महाफलदाया बनाने का निश्चय करते हुए सोने के हल से यहां कृषिकार्य प्रारम्भकिया और अनेक वर्षों तक इस क्षेत्र को बार बार कर्पित किया। इस प्रकार उन्हें कृषि कार्य में प्रवृत्त देखकर इन्द्र ने उनसे जाकर कठोर परिश्रम का कारण पूछा। कुरु ने कहा, "जो भी व्यक्ति यहां मरेगा, यह पुण्य लोक मे जाएगा।" इन्द्र उनका परिहास करते हुए चले गये। इन्द्रलोक जाकर उन्होंने इस बात को सभी देवताओं को भी बतलाया। देवताओं ने इन्द्र से कहा यदि संभव हो तो कुरु को अपने अनुकूल बना लो, अन्यथा यदि लोग वहां यज्ञ करते हुए हमारा भाग दिये बिना ही स्वर्गलोक चले गये तो हमारा भाग नष्ट हो जायेगा। तब इन्द्र ने पुन । कुरु के पास जाकर कहा, " नरश्रेष्ठ तुम व्यर्थ ही इस प्रकार का कष्ट कर रहे हो। यदि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य निराहार रह कर अथवा युद्ध करके यहां मारा जायेगा तो ग्वर्ग का भागी होगा।" कुरु ने यह बात मान ली

यावेदतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्र तदस्तु च
वामनपुराण । 23/33/1

आदि काल से " कुरुक्षेत्र" नाम हमें विभित्र वेदों ब्राह्मणग्रन्थों एवं पुराणों में मिलता है। पुराणों के अनुसार यह क्षेत्र ब्रह्मवेदि के नाम से जाना जाता था। पुनः इस क्षेत्र का नाम समन्तपंचक हुआ और अन्त में कुरुक्षेत्र। महाभारत से पूर्व इस क्षेत्र का नाम कुरुक्षेत्र के साथ-साथ प्रजापति की वेदी पंचविश ब्राह्मण में भी प्राप्त होता है।

वामन पुराण में ब्रह्मा की पांच वेदियों को ब्रहावेदी कहा गया है। पांचों वेदियों में प्रयोग मध्यवेदि है। अनन्त फल दायिनी बिरजा दक्षिण वेदी है। तीन कुण्डों में सुशोभित पुष्कर पश्चिम वेदी है। अव्यय समन्तपंचक उत्तरवेदी है तथा पूर्ववेदी "गया" है।

प्रयागो मध्यमा वेदि गया शिरः । 
विरजा दक्षिणा वेदिरनन्त फल दायिनी।।

9

प्रतीची पुष्करावेदिस्त्रिभिः कुण्डैरंलकृता। 
समन्तपंचका चौक्ता वेदि रे तीत्तराव्यया।।
वामनपुराण। 23/20

महाभारत एवं पुराणों में समन्तपंचक और उतरवेदी को एक ही क्षेत्र कहा गया है।
समन्तपंचके युद्धं कुरुपाण्डव सेनयोः
महा० आदिपर्व 12/13

महाकवि भास ने भी अपने काव्य उरुभंग में महाभारत युद्ध के उपरान्त समन्तपंचक में र।र्वत्र राजाओं के मृत शरीर का वर्णन किया है
राजां शरीर समाकीर्णे समन्तपंचके ।
उरुभंग। 7

इस प्रकार कुरु के कर्पण सम्बन्धी कार्य से पूर्व कुरुक्षेत्र का नाम समन्तपंचक, ब्रह्मवेदि इत्यादि नामों से मिलता है, किन्तु कुरु की तपस्या एवं प्रताप के कारण इस का नाम कुरुक्षेत्र कहलाया जो कि आज भी अपरिवर्तित है। इसमें सन्देह नहीं किः अनेकानेक राजाओं ने इस प्रदेश पर शासन किया किन्तु कुरुक्षेत्र का नाम आज भी शाश्वत है। जीवनमूल्यों की महान परम्परा, अर्थात् पितृ सेवा, श्राद्ध, तर्पण, नारायण बलि इत्यादि जो धार्मिक अनुष्ठान कुरुकाल से निरन्तर यहां प्रवाहित हो रही है उसमें तनिक भी अन्तर दिखाई नहीं पड़ता। असत्य पर सत्य की विजय अर्थात कौरवों पर पाण्डवों की विजय, कर्मयोग का महान सन्देश जो सार्वभौम, एवं सार्वकालिक है आज भी इसी क्षेत्र के साथ जुड़ा हुआ है। धर्म को कर्म के साथ जोड़कर भगवान ने धर्म को अत्यन्त महान बना दिया है। गीता के अनुसार धर्म धारण करने की वस्तु है। कोई भी कार्य जो परहित के लिए किया गया है धर्म है। धर्म कोई हिन्दु, मुसलमान या सिख के अपनाने का नाम नहीं अपितु समस्त मानव जाति को एक सूत्र में बाधंन का परिचायक है। धर्म वह इन्सान बनाता है जो मानवता के गुण रखता हो। जो केवल अपने लिए न जिए वरन् देश धर्म एवं मानव सेवा के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हो।

इस प्रकार कुरुक्षेत्र धर्मभूमि है, कर्मभूमि है। एक अत्यन्त पवित्र स्थल है। पितामह ग्रह्मा की तपोभूमि होने के कारण सृष्टि की रचना का सौभाग्य भी इसे प्राप्त हुआ। वैदिक श्रृपियों ने अपनी महान यज्ञ साधना इसी क्षेत्र में सरस्वती के पावन तट पर बैठ कर की। अपनी तप साधना द्वारा इसे तपोभूमि बनाया। विश्वामित्र श्रषि ने तो क्षत्रिय धर्म त्याग कर ब्राह्मण धर्म को अपनाना स्वीकार कर लिया। महाभारत, विभिन्न पुराण एवं तत्कालीन संस्कृत साहित्य कुरुक्षेत्र के धार्मिक सन्दर्भों से ओत प्रोत हैं। शताब्दियों से भारतीय चिन्तन धारा को अपूर्व

10

मोड़ देने वाली इस कुरुक्षेत्र भूमि को जहां कुरु राजा ने कर्षण किया, ऋषि मुनियों ने अपने योग बल से इसे आप्लिवित किया। आयतन सस्यस्यामला रुपी यह भूमि समस्त भारत के लिए मां अन्नपूर्णा अथवा धान्य साम्राज्ञी कहीं जाए तो अतिश्योक्ति न होगी।

जबालोपनिषद् के अनुसार यह ब्रह्मसदन देवभूमि कुरुक्षेत्र सब प्राणियों के लिए मुक्तिदायिनी है। इसलिए इसे अविमुक्त क्षेत्र भी कहते हैं। वामनपुराण के अनुसार अपवित्र या पवित्र अथया सशर्वास्था प्राप्त व्यक्ति भी यदि कुरुक्षेत्र का स्मरण करे तो वह बाहर तथा भीतर (शरीर एवं अन्तःकरण) से पवित्र हो जाता है।

अपवित्र पवित्रो वा सर्वास्थां गतोऽपिवा। 
यः स्मरेत कुरुक्षेत्रं स वाह्याभ्यन्तरः शुचि ।।

11
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

तीर्थ यात्रा का महत्व

तन एवं मन की शुद्धि हेतु ही श्रद्धालु जन तीर्थ यात्रा करते हैं। आत्मोद्वार की भावना ही उन का मुख्य उद्देश्य होता है। तीर्थ पर हमारे जाने का एकमात्र उद्धेश्य संसार के मोहमाया से दूर रहकर आत्म रांयम एवं सत्संग द्वारा अपने जीवन का उद्धार करना है। जगत में ब्रह्म ही भत्य है बाकी सब नश्वर है। अतः हम इस नश्वरता को छोड़कर, संसार असार के प्रति मोहमाया का त्याग कर, भगवद् भक्ति में मन को लगावें। महापुरुपों का सत्संग करें तभी इस जीवन को कल्याणमय बनाया जा सकता है। तीर्थ तीन प्रकार के माने गये हैं-

जंगमतीर्थ, स्थावरतीर्थ एवं मानसतीर्थ।

स्वधर्म निष्ट आदर्श संत महात्मा एवं ब्राह्मण जंगम तीर्थ हैं जो कि अपने सत्संग से दूसरे के पाप को हर लेते हैं। इनके दर्शनमात्र से ही सम्पूर्ण कामनायें सफल हो जाती हैं।

मानसतीर्थ के अन्तर्गत सत्य, क्षमा, दया, इन्द्रियनिग्रह, ऋजुता, दान, मनोविग्रह, सन्तोप, ब्रह्मचर्य, विवेक, धृति, तपस्या आदि श्रेष्ठ गुण आते हैं जिन को अपनाने एवं धारण करने से परमगति प्राप्त होती है। वामनपुराण में कहा भी है कि आत्मा नदी है, रायम पुण्यतीर्थ है, उन में शील समाधि सत्य रुपी जल है। इस जल में स्नान करने वाले संत महात्मा प्रकाश में चंद्रमा के समान विराजमान होते हैं।

आत्मानदी संयम पुण्यतीर्था, सत्योदकम् शील समाधि युक्ता। तन्त्र स्नातः प्रयत्रः संयमात्मा विराजवेदिति सेमोययैव ।।
वामन । 43/25

स्थावर तीर्थ के अन्तर्गत पृथ्वी के यह असंख्य पवित्र स्थान, सागर, नदियां, सरोवर, कूप एवं जलाशय हैं जो किसी पौराणिक आधार पर भगवान के लीला क्षेत्र रहे हैं। ऐसी पावन पवित्र भारत भूमि में तीर्थराज प्रयागराज, पुष्कर, नेमीषारण्य, कुरुक्षेत्र, काशी, उज्जैन, मधुरा, हरिद्वार एवं चारों धाम स्थावर तीर्थ के अन्तर्गत आते हैं। इन सभी तीर्थों में कुरुक्षेत्र अति पवित्र एवं पुण्य है
कुरुक्षेत्र महापुण्यं सर्व तीर्था निषेवितम् ।

कू'र्भपुराण में तीर्थ की परिभाषा इस प्रकार की गई है -

न तीर्थतां जलस्याहु मरुसथलस्य वनस्य वा अध्यासितं महदिभ्यत तीर्थ विदु बुधा ।

12

अर्थात साधारण जल स्थल वन को ही तीर्थ नहीं कहते वरन् वह स्थान तीर्थ है जहां सेवा, तप इत्यादि से महाऋषियों अथवा देवों ने सिद्धि प्राप्त की है।

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

तीर्थ क्यों जाना चहिए।

पद्मपुराण के अनुसार मानव जीवन का प्रमुख उद्देश्य एवं परम ताभ है भगवद् प्राप्ति। मनुष्य के शरीर में चाहे झुरियां पड़ गई हों, सिर के बाल पक गये हों, अथवा वह अभी नवयुत्रक हो, मृत्यु से कोई टाल नहीं सकता। अतः ऐसा जानकर परमपिता परमात्मा की शरण में आना चाहिए। भगवान के कीर्तन, वन्दन, श्रवण में मन लगाना चाहिए। सांसारिक वस्तुयें क्षणभगुर है। अतः दुःखदायी हैं। परन्तु भगवान जरा जन्म, मृत्यु से परे हैं, वे नित्य, सत्य एवं सनातन हैं, सच्चिदानन्द हैं। उन के चिन्तन में ही मन को लगाना चाहिए। कवि ने कहा भी है:-

क्षणभुंगर जीवन की कालिका कल प्रातः को जाने खिली न खिली, मलयागिरि की शुचि शीतल मंद सुगंध समीर चली न चली, कलिकाल कुठार लिए फिरता तन नम्र है चोट झिली न झिली,

कहले हरिनाम अरि रसना, जाने अंत समय में हिली न हिली।

उस भगवान का, उनके स्वरुप का ज्ञान (तत्व गुण लीला) होता है साधुसंग से। जिनकी कृपा से मनुष्य दु । ख से दूर हो जाते हैं, उन के दर्शन मात्र से पाप छूट जाते हैं। ऐसे जीवनमुक्त महापुरुषों का सत्संग तीर्थ जाने पर ही संभव हो सकता है। अतः भगवद् प्राप्ति के लिए जहां महापुरुपों का गंग आवश्यक है वहां उनके दर्शन हेतु तीर्थ पर जाना अति आवश्यक है। काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि विकारों को छोड़ कर जो मनुष्य तीर्थ में प्रवेश करता है उसे तीर्थयात्रा से कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती।

13
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

धर्मशास्त्रों में कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र अत्यन्त पुनीत स्थल है। इसका इतिहास पुराणों में समा सा गया है। ऋगवेद में त्रस्दस्यु के पुत्र कुरुश्रवण का उल्लेख मिलता है जिसका अर्थ है कुरु की भूमि में सुना गया। अथर्ववेद में भी एक कौरण्य पति की चर्चा की गई है। ब्राह्मण ग्रन्थों में भी कुरुक्षेत्र पवित्र तीर्थस्थल के रूप में उल्लिखित है। शतपथब्राह्मण में उल्लेख है कि देवों ने कुरुक्षेत्र में एक यज्ज्ञ किया था जिसमें उन्होंने दोनों अश्विनों को पहले यज्ञ भाग से वंचित कर दिया था। मैत्रायणी संहिता में "देवा वै सत्रमासत" तेपां कुरुक्षेत्र वेदिरासीत् का कथन है कि देवों ने कुरुक्षेत्र में सत्र का सम्पदान किया। इस प्रकार ब्राह्मणग्रन्थों के काल से ही कुरुक्षेत्र एक धार्मिक भूमि, यज्ञवेदि एवं वैदिक संस्कृति का केन्द्र माना जाता है। देवों को देवकीर्ति इसी स्थान से प्राप्त हुई जिससे उन्होंने धर्म, यज्ञ एवं तप का पालन किया।

निरुक्त में व्याख्या के अन्तर्गत देवापि एवं शान्तनु ऐतिहासिक व्यक्ति थे और कुर के राजा ऋष्टिपेण के पुत्र थे।

महाभारत में कुरुक्षेत्र का अत्यधिक उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि सरस्वती नदी के दक्षिण में एवं दृपद्वती के उत्तर की भूमि कुरुक्षेत्र में थी और जो लोग यहां निवास करते थे वे स्वर्ग में रहते थे।

दाक्षिणेन सरस्वत्या दृषद्वत्यूत्तरेण चाये।
वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे ।।
महा० वनपर्व। 8.3/3/204

वामनपुराण के अनुसार भी कुरुक्षेत्र को ब्रह्मावर्त कहा गया है। सरस्वती एवं द्रुपद्धती के बीच का क्षेत्र कुरुजांगल था। मनु ने सरस्वती एवं दृपद्वती नामक पवित्र नदियों के मध्य में बनाया है। आर्यावर्त में ब्रह्मावर्त सर्वोत्तम देश था और कुरुक्षेत्र से ही बहुत अंशों में इस की समानता थी। सरस्वती अत्यन्त प्राचीन पुनीत नदी थी जो कि कुरुक्षेत्र से होकर बहती थी।

प्रारम्भ में कुरुक्षेत्र ब्रह्मा की यज्ञवेदी कहा जाता है। आगे चलकर इसे समन्तपंचक कहा गया जबकि परशुराम ने अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध में क्षत्रियों के रक्त से पांच कुण्ड बना डाले जो पितरों के आशीर्वाद से बाद में पांच पवित्र जलाशयों में परिवर्तित हो गये। बाद में यही भूमि कुरु राजा के कर्पण से कुरुक्षेत्र कहलाई। कुरु ने इन्द्र से नरभांग कर इस भूमि को धर्मक्षेत्र में परिवर्तित किया।

14

यावदेन्तन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तुवः 
स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलंत्विह ।
वाम० 22/33/34

श्रीमद्भगवद्‌गीता के प्रथम श्लोक में "धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रे" कहा जाना इसी तथ्य का द्योतक है कि यह भूमि अत्यनत पावन है। वायु एवं कूर्धपुराण में आया है कि श्राद्ध के लिए कुरुजांगल एक योग्य प्रदेश है। महाभारत वनभर्व एवं वामनपुराण में कुरुक्षेत्र का विस्तार पांच योज। में कहा गया है
यथा तरन्तुक एवं कारन्तुक तथा मचकुक

(यज्ञ प्रतिभा) एवं रामदों के बीच की भूमि ही कुरुक्षेत्र या समन्तपंचक एवं उतर ब्रह्म-दि है। इस प्रकार कुरुक्षेत्र कई नामों से अभिव्यक्त रहा है।

कनिंघम के शब्दों में
प्राचीन काल में वैदिक लोगों की संस्कृति एवं कार्यकलापों का केन्द्र कुरुक्षेत्र था।

15

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

श्रीमद्भगवद्गीता एवं कुरुक्षेत्र

श्रीमद्भगवद्‌गीता का महात्म्य वाणी द्वारा वर्णन करना असंभव है क्यूंकि यह एक परम रहस्यमय ग्रंथ है। इसमें सम्पूर्ण वेदों एवं उपनिपदों का सार संग्रहित है। संस्कृत भाषा में होते हुए भी थोड़ा अभ्यास करने से मनुष्य इसे सहज में ही समझ सकता है, परन्तु इस का आशय इतना गम्भीर है कि आजीवन अभ्यास करने पर भी उस का अन्त नहीं होता। वेदव्यास जी ने महाभारत में गीता का वर्णन करते हुए कहा है -
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः । 
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता ।।

गीता सुगीता करने योग्य है अर्थात श्रीगीता जी को भली प्रकार पढ़ कर अर्थ और भावस हेत अन्त: करण में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है, जो कि स्वयं भी पद्मनाभ | भगवान विष्णु के मुखारविन्ट से प्रस्फुटित हुई है, फिर अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन है ?

गीता को गंगा की तरह पवित्र कहा जाता है। गंगा में जो स्नान करता है उसका कोई भी धर्म हो, गंगा उसे स्वच्छ एवं निर्मल बना देती है। गीता मानव मात्र की दर्शक है। मानव मात्र का कल्याण करने वाली है। कर्म, भक्ति एवं ज्ञान की त्रिवेणी है। कतिपय विद्धानों ने गीताविषयक जो वचन कहे हैं, दृष्टव्य हैं:-

गीता हमारी सदगुरु है, माता रुप है, और हमें विश्वास होना चाहिए कि उसकी गोद में सर रखकर हम सही सलामत पार हो जाएंगे।
(गांधी जी)

भगवद्‌गीता ऐसा असाधारण ग्रन्थ है जिसे प्रत्येक धर्म का मनुष्य आदर के साथ पढ़ सकता है और उसमें अपने धर्म के तत्व देख सकता है।
(गांधी जी)

जो मनुष्य गीता का भक्त होता है उस के लिए निराशा की कोई जगह नहीं है। वह हमेशा आनन्द में रहता है।
(गांधी जी)

गीता हमारे धर्म ग्रन्थों का एक अत्यन्त तेजस्वी निर्मल हीरा है। (लोकमान्य तिलक)

गीता जीवन के सर्वोच्च लक्ष्यों को हृदयंगम करने में महत्वपूर्ण सहायता देती है।
(डा० राधाकृष्णन)

जैसे अन्धेरे में लालटेन प्रकाश देती है और हमें ठीक मार्ग बताती है, ठीक उसी प्रकार गीता भी हमें कर्तव्य एवं अकर्तव्य का ज्ञान कराती है। यह हमें आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों का ऊंचे से ऊंचा उपदेश देती है।
(महामना मालवीय जी)

16

गीता संसार का अनमोल रत्न है। है और इसके एक एक अध्याय में कितने कितने रत्न भरे पड़े हैं। इसके पद पद और अक्षर अक्षर से अमृत की धारा बहती है।
(मालवीय जी)

गीता हिन्दु दर्शन और नीतिशास्त्र के सब से प्रामाणिक ग्रन्थों में से एक है। सभी सम्प्रदायों ने उसे इसी रुप में स्वीकार किया है। हमारे युवक और युवतियां यदि इसके चुने हुए श्लोकों का भी अध्ययन कर लें और उसका मनन करें तो अपने पूर्वजों के धर्म को समझ सकेंगे।
(चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य)

गीता उपनिपदों का भी उपनिषद है। क्योंकि समस्त उपनिषदों को दुहकर यह गीता रुपी दुग्ध भगवान ने अर्जुन को निमित्त बना कर संसार को दिया है। जीवन के विकास के लिए आवश्यक प्रायः प्रत्येक विचार गीता में आ गया है। इसलिए अनुभवी पुरुषों ने यथार्थ ही कहा है कि गीता धर्मज्ञान का एक कोष है।
(विनोबाभावे)

कुरुक्षेत्र को गीतास्थली कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। कौरव एवं पाण्डवों के बीच जो महाभारत संग्राम हुआ उस का युद्धस्थल कुरुक्षेत्र ही था। कुरुक्षेत्र महाभारत एवं गीता तीनों ही शब्द बहुत व्यापक अर्थ संजोए हुए हैं। आइए इसके प्रतीक अर्थ पर भी विचार कर लिया जाए। कुरुक्षेत्र का युद्ध प्रतीक है उस आन्तरिक युद्ध का जो मानव देह में सक्रिय है। हमारा शरीर कुरुक्षेत्र है तथा धर्मक्षेत्र भी है। यदि इसे हम ईश्वर का निवास स्थान मान लें और सद्गुणों को अपनावें तो धर्मक्षेत्र है। क्योंकि नरदेह से ही धर्म की, आत्मदर्शन की साधना हो सकती है। इस शरीर के अन्दर भले बुरे विचारों की, सदगुणों एवं दुर्गणों की लड़ाई हमेशा चलती रहती है। दुर्गणों का प्रबल होना कौरवों की जीत है। सदगुणों का प्रबल होना पाण्डवों की जीत है। जब तक जीवन है यह युद्ध समाप्त नहीं होता। युद्ध चलता रहता है जीवन संग्राम में जब मनुष्य राग द्वेष के कारण अपने पराये का भेदभाव करने लगता है तो अपने कर्तव्य कर्म का निर्णय नहीं कर पाता। अस्थिर चित, अशान्त मन, विपाद युक्त (अर्जुन) को गीता माता की शरण में आकर ही परम शान्ति मिलती है।

भगवान कृष्ण ने कौरव एवं पाण्डवों की सेना के मध्य जाकर रथ का खड़ा किया एवं उन्होंनें अर्जुन से कहा- हे पार्थ, यहां युद्ध की इच्छा से इकड्ढे हुए कौरवों को देख लो। अर्जुन को मोह हुआ और यहीं पर भगवान कृष्ण ने गीतारुपी अमृत वाणी का ज्ञान अर्जुन को दिया। इस स्थान की खोज हेतु हमें दो बातें जानना आवश्यक है -
(1) महाभारत कालीन कुरुक्षेत्र की स्थिति।
(2) पाण्डव कौरव सेना तथा शिविर की स्थिति।

श्री वृन्दावन कानूनगो अपने एक लेख में एतदर्थ विचार करते हुए लिखते हैं कि कुरुक्षेत्र हिरण्यवती, दृपद्धती और सरस्वती नदी के मध्य का क्षेत्र है। जिसको ब्रह्मवेदी, समन्तपंचक

17

एवं कुरु के कर्पन उपरान्त कुरुक्षेत्र कहने लगे। तरन्तुक से मरन्तुक यज्ञ तक, रामहद से मचक्रंक तक बीस योजन विस्तार अर्थात 107 मील का प्रदेश था। हिरण्यवती के तट पर श्री कृष्ण ने खाई खुदवाकर पाण्डवों के शिविर लगाए थे।

महाभारत उभोगपर्व अध्याय तेरह में भी लिखा है कि आगे कैकेय, अनुविन्द, द्रोणाचार्य, उन के पीछे अश्वत्थामा, भीप्म पितामह, जयद्रथ, शकुनि, कृतवर्मा, शल्य, ब्रह्मदत नथा दुर्योधन चलकर कुरुक्षेत्र के मैदान में पश्चिम अर्धभाग में स्थित हुए। इस प्रकार कारव कुरुक्षेत्र के पश्चिम भाग में एवं पाण्डव पूर्वभाग में अर्थात कुरुक्षेत्र के समीप ही पड़ाव आले हुए थे।

वामनपुराण के अन्तर्गत "कुरुक्षेत्रद्वार का भी वर्णन आया है।
कुरुक्षेत्रस्य तन्द्वारं विश्श्रुतं पुण्यवर्धनम्

इस द्वार का उल्लेख वामनपुराण में पुण्डरीक तीर्थ के बाद आया है, इस प्रकार यह निश् चय ही वर्तमान पुण्डरी के निकट बनाया गया होगा। यही कुरुक्षेत्र का द्वार पुण्यों की वृद्धि करने वाला है। कुरुक्षेत्र यात्रा के अन्त। वामनपुराण अध्याय 34/37 तक कुरुक्षेत्र का विरतृत विवरण प्राप्त होता है जिसमें कुरुक्षेत्र के वन, नदियों अर्थात काभ्यक वन, अदिति धन, व्यासवन, कलकीवन सूर्यवन, मधुवन, शीतवन आदि सात वन एवं नौ नदियों, सरस्वती, दृपद्धती, वैतरणी, आपगा, मन्दाकिनी, कौशिकी आदि का अल्लेख है। इस प्रकार यह क्षेत्र निश्चय ही अत्यन्त पुण्यमय प्रदेश रहा है। सरोवर महात्म्य के अन्तर्गत भी कुरुक्षेत्र को तपोभुमि कहकर इस की महानता को दर्शाया गया है। सरस्वती नदी को पापनाशिनी कह कर इस का महत्व अत्यन्त अलौकिक एवं अद्भुत बना है।

कुरुक्षेत्र के समीपवर्ती तीर्थ भी इरा बात का द्योतक हैं कि यह अत्यन्त पावन धर्मभूमि एवं तपोभूमि है। ज्योतिसर तीर्थ पर ही गीता ज्योति का आर्विभाव माना जाता है। भगवान का विराट दर्शन एवं यहां स्थित अक्षयवट इस बात की पुष्टि करते हैं कि गीता का ज्ञान यहीं पर प्रस्फुटित हुआ। आज के वैज्ञानिक मतानुसार भी अक्षयवट लगभग 6000 वर्ष पुराना है। सरस्वती प्राची, पृथुदक फलकीवन, ब्रहमसर, सन्निहित तीर्थ, स्थाणु तीर्थ, इत्यादि भी कुरुक्षेत्र में स्थित हैं। सो गीतास्थली कुरुक्षेत्र एक शाश्वत सत्य है जो स्वयं के मुख से गोता के प्रथम श्लोक में भगवान ने प्रतिपादित करवाया है।

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । 
मामकाः पाण्डवाश्चैव किम कुर्वत संजय ।।

इस प्रकार कुरुक्षेत्र मैदान बीस गोजन विस्तार में था। पांच योजन घेरे में कौरव एवं पाण्डवों की सेना चारों ओर पड़ाव डाले हुए थी। मध्य में दोनों सेनाओं के बीच का भाग खाली था।

दोनों ओर की सेनायें भिन्न-भित्र भागों में पड़ाव डाले थीं। मुख्यद्वार कुरुक्षेत्र ही था या इनके समीप ही था। कौरव एवं पाण्डव दिन में युद्ध करते थे किन्तु रात्रि में एकत्रित भी होते थे। रात्रि को युद्ध नहीं होता था। भगवान कृष्ण द्रौपदी को रात्रि में ही नंगे पांव भीष्म पितामह के पास ले गये थे। इससे यह भी अनुमान लगता है कि कौरव एवं पाण्डवों के शिविर पास पास ही थे।

18

19

कुरुक्षेत्र के सरोवर तीर्थ

ब्रह्मसरोवर

वामनपुराण में ब्रह्मसर तीर्थ का उल्लेख करते हुए महर्षि लोमहर्पण कहते हैं समस्त तीथों के विषय में वर्णन करने से पहले मैं ब्रह्मा जी, ईश, कमलासन पर स्थित विष्णु, रुद्रदेव एवं तीर्थबर ब्रह्मसर को सिर के बल प्रणाम करता हूँ।

ब्रहमाणमीशं कमला सनस्थं विष्णुं च लक्ष्मी सहित तथैव ।
रुद्र च देव प्रणिपत्य मूर्धना तीर्थ वरं ब्रह्मसरः प्रवक्षये।।
वामन । 22/50

इस प्रकार तीर्थ का महत्व त्रिदेव के समान ही वर्णित है। महाभारत तथा पुराणों में वर्णित लेखों के अनुशार ब्रह्मसरोवर प्राचीनकाल में आठ मील लम्बा तथा इतना ही चौड़ा था। यहाँ स्वयं ब्रह्मा जी ने सतयुग के आदि में यज्ञ किया जिस से इसका नाम ब्रहमसर हुआ। महर्षि परशुराम ने अनेक बार पितृ तर्पण हेतु यहाँ यज्ञ किए जिससे इसका नाम समन्तपचंक हुआ। इसी क्षेत्र में जब महाराजा कुरु ने अर्पण किया तो इसे कुरुक्षेत्र के नाम से ख्याति प्राप्त हुई।

ब्रहमसर लगभग 3680 फुट लम्बा एवं 18610 फुट चौड़ा है। प्राचीन समय में तालाब के चारों ओर सीढ़ियों की लम्बी श्रृंखलाएं थीं परन्तु ये उत्तरी किनारे पर पाई जाती थीं नथा तालाय के मध्य एक बड़े तथा एक छोटे द्वीप ने उस की सुन्दरता को बढ़ा रखा था और इसे यात्रियों के लिए आकर्षक बना रखा था। इन द्वीपों में पौराणिक तथा ऐतिहासिक महत्व के मन्दिर तथा स्थान हैं। छोटा द्वीप एक पुल के द्वारा सर्वेश्वर महादेव से जुड़ा हुआ था और बड़ा द्वीप एक अन्य पुल से जुड़ा हुआ था जो कि उत्तरी किनारे पर मध्य भाग से प्रारम्भहोतां है और तालाब को दो भागों में बांट देता है। बड़े द्वीप पर कुछ खण्डहर स्थित हैं जिन के बारे में कहा जाता है कि वे बादशाह औरंगजेब के छोटे किले थे। यहां हथियारबंद सैनिकों की नियुक्ति की गई थी जो आने बाले तीर्थ यात्रियों से जज़िया वसूल करते थे। मुगलपुरा जो कि आजकल पुरोपत्तम बाग के नाम से जाना जाता है एक ऐसा ही अवशेष है। कहा जाता है कि एक लोटा पानी के लिए एक रुपया तथा स्नान के लिए पांच रुपया कर के रूप में वसूल किया जाता था।

सन् 1850 ई० में थानेसर के जिलाधीश श्री लारकिन ने इस तीर्थ को खुदवाया एवं इस का पुनर्निर्माण किया । किन्तु तीर्थ को वर्तमान स्वरूप देने का श्रेय परम आदरणीय श्रद्धेय श्री गुलज़ारीलाल नंदा, अध्यक्ष कुरुक्षेत्र विकास मण्डल को जाता है। इनके तत्वाधान में विधास मण्डल की स्थापना 1968 में हुई। सर्वप्रथम इसी सरोवर का विकास कार्य प्रारम्भ हुआ। सरांवर की गहरी खुदाई हुई। चारों ओर से सरोबर को छोटा किया गया, पुराने घाटों को तुड़वाकर कर नए घाट बनाये गये। यात्रियों के ठहरने हेतु रैन बसेरे बनवाये गये। स्नानहेतु, सरांवर

20

पर 20 फुट चौड़ा पलेटफार्म बनवाया गया। सरोवर को 15 फुट गहरा किया गया। अब इस समय इसमें स्वच्छ जल भरा रहता है। सरोवर के मध्य में भगवान सर्वेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर स्थित है जो सरोवर के उतरी तट से एक पुल द्वारा जोड़ा गया है।

सन्निहित सरोवर तीर्थ

यह सरोवर कुरुक्षेत्र ब्रह्मसरोवर की अपेक्षा बहुत ही छोटा है। इस की लम्बाई 500 वर्गगज़ एवं चौड़ाई 1.50 वर्गगज़ है। इस सरोवर का पुनर्निर्माण भी कुरुक्षेत्र विकास मण्डल द्वारा किया गया एवं इसके तीनों ओर सुन्दर व पक्के घाट बनाये गये हैं। पुरोहित यात्रियों से श्राद्ध तर्पण इसी स्थान पर करवाते हैं। धर्मशास्त्रों में इस पावन क्षेत्र को ही सत्रिहित की संज्ञा दी गई है। विद्वानों का मत है कि ऋगवेद शर्मण बल तथा शतपथ का अदतः प्लक्ष सर कुरुक्षेत्र में विद्यमान आज का सत्रिहित सरोवर ही है। इस प्रकार यह सरोवर अपने आप में उतना ही पुराना है जितना ऋगवेद।

भागवत पुराण में कहा गया है कि पुरुखा ने उर्वशी को कुरुक्षेत्र में सरस्वती के तट पर देखा तो वह सरस्वती का तट सन्निहित सर ही है क्यूंकि नारद‌पुराण में सरस्वती को सन्निहित सर से ही होकर पश्चिम में बहने ली नदी बतलाया गया है। वामन पुराण के इस श्लोक से भी इरा सरोबर की प्राचीनता एवं विशालता का वर्णन मिलता हैः-
सर० सन्निहितं प्रोकं ब्रहमणा पूर्वमेवतु। 
कलि द्वापरथोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना ।।

अर्थात कलि और द्वापर के मध्य में महात्मा वेदव्यास जी ने इसी सर को प्रमाणित बतलाया है जिसे सतयुग में स्वयं ब्रह्मा जी ने निर्मित किया था। इस प्रकार ब्रहमसर तथा सन्निहित सरोवर में कोई अन्तर दिखलाई नहीं पड़ता।

वामनपुराण के अनुसार यह सरोवर अत्यन्त पुण्यमय एवं महान बृद्धिद्योतक है। देववर विश्वेश्वर से पावनी सरस्वती है, उसी के निकट यह सत्रिहित कहलाने वाला तीर्थ चारों ओर अर्धयोजन के प्रमाण वाला बतलाया गया है। इसी का आश्रय करने वाले ऋषिगण देव वृंद यहां आकर सभी मुक्ति की कामना हेतु यहां तीर्थ का सेवन करते हैं। प्रजा का सृजन करने की कामना से प्रजापति ब्रह्मा ने इसका सेवन किया। भगवान विष्णु ने भी हरि रुप से जगत की स्थिति (पालन पोषण) की कामना लेकर इस तीर्थ का सेवन किया, भगवान शिव ने इस सर के मध्य प्रवेश करके महान तेजस्वी देव के रुप मे इसका सेवन किया। तभी से वह भगवान स्थाणुत्व को प्राप्त हुए और स्थाणेश्वर महादेव के रुप में नगर के इष्ठदेव कहलाने लगे।

21

ब्रहमणा सेवितं इदं सृष्टि कामेन योगिना 
विष्णुना स्थिति कामेन हरिरुपेण सेवितम् 
रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना 
सेव्य तीर्थ महातेजाः स्थाणुत्व प्राप्त वान्हरः
वामन पु० 22/57-58

अनुरिहान बराह मिहिर जिनका समय लगभग ईस्वी पूर्व दूसरी शती है कहते हैं कि सूर्यग्रहण के अवसर पर सभी सरोत्ररों का जल कुरुक्षेत्र के सत्रिहित सरोवर में आता है। जस से कि स्नान करने वाला एक समय में ही सभी सरोवरों में किए गये स्नान का फल प्राप्त कर लेता है।

धर्मशास्त्रों में इस पावन क्षेत्र को ही सत्रिहित की संज्ञा दी गई है जिसके अन्तर्गत ब्रहमगर, कालेसर, स्थाणेसर, ज्येतिसर आदि प्रमुख सरोवर आ जाते हैं। प्रत्येक मास की अमावस्या को ब्रहमादि देव, ऋषिगण तथा समस्त पृथ्वी के तीर्थ यहां इसी स्थान पर एकत्रित होते हैं। स्वयं भगवान विष्णु यहां सदैव निवास करते हैं। इस तीर्थ में स्नान कर भगवान विष्णु का पूजन करने से सहस्त्र अवश्मेध यज्ञ का फल मिलता है तथा बैकुण्ठ लोक की प्राप्ति भोती है।

सूर्यग्रहण के अवसर पर सत्रिहित तीर्थ में दान एवं स्नान का अक्षय पुण्य हैः-
ब्रहमवेदि कुरुक्षेत्रे पुण्य सन्निहित सरः
सेवमाना नरा नित्यं प्राप्नुवन्ति परं पदम्
पुनः सन्निहित्यां वै कुरुक्षेत्रे विशेषतः
अर्चयेच्य पितृस्तत्र स पुत्र रुत्वनृणो भवेत

कुरुक्षेत्र ब्रहभवेदि में सन्निहित सरोवर है। जो मनुष्य उस में नित्य स्नान करता है उसे परम पद की प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र में जो रात्रिहित तीर्थ है उसमें श्राद्ध त्रपर्ण करने वाला पितृ ऋणों से उऋण हो जाता है।

वामनपुराणानुसार सन्निहित सरोवर की सीमा विश्वेश्वर से अस्तिपुर तक, वृद्ध कन्या जरदगवी से आधवती तक बतलाई गई है।
विश्वेश्वराद्धस्तिपुरं तथा कन्या जरग्दवी ।
यावदोधवती प्रोत्मा तावत्सन्निहितं सदः ।
वामन 122/53

वामनपुराण में सत्रिहित की उत्पत्ति के सम्बन्ध में महर्षि मार्केण्डेय ने कहा हैः-

22

पूर्व समय में यह सम्पूर्ण विश्व चराचर नष्ट हो गया था और केवल मात्र समुद्र ही दिखलाई पड़ता था। उस समय में एक बृहत अण्ड निकला जो प्रजाओं के बीजोत्पादक रुप वाला था । ब्रहमा उस अण्ड में स्थिर होकर सोने लगे। एक सहस्त्र वर्ष तक वह क्रमशः सतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग में सोते रहे। जब वे एक सहस्त्र युग तक सो कर उठे तो उनका सत्व गुण था । संसार उस समय शून्य था। ब्रह्मा सृष्टि की चिन्ता करने लगे तो इस प्रकार वे रजोगुण से मोहित हुए जो कि सृष्टि के लिए आवश्यक था। सत्वगुण स्वभाव स्थिर करता है एवं तमोगुण नाश करता है। ईश्वर इन तीनों गुणों से ऊपर है। उसी के द्वारा सारे ब्रहमांड की रचना, विकास एवं नाश अथवा संहार होता है। वही ब्रहमा है। जो उसे जानता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है। ब्रह्मा की उत्पत्ति का कारण नारायण ही है। जलों को ही नारा कहते हैं और ये आप (जल) ही नरसूनू है। उन जनों में जो शमन करता है उसे नारायण इस नाम से जाना जाता है। उस विशुद्ध जल में जगत को जानकर भगवान ने अण्ड को विभक्त कर दिया और फिर उसे ओम यह उत्पन्न हुआ, फिर उस से भू हुआ और दूसरा भुव हुआ, तृतीय शब्द स्व यह हुआ था। इस तरह भूः भवः स्वः की उत्पति हुई। उरामें जो सवितुर्वरेण्यं तेज का अभ्युदय हुआ था, इस तेज ने जल को सुखा दिया। तेज से गर्म होकर गाढ़ा होने पर सर्कन से बुलबुला हुआ, बुलबुले से पृथ्वी बनी। पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण करने वाली है। पृथ्वी के मध्य में अण्ड स्थित था, जिस स्थान में अण्ड स्थित था उस में सर सत्रिहित था अर्थात सन्निहित सरोवर बहीं विद्यमान था। और उसी में अण्ड स्थित था जिस से सृष्टि की रचना हुई।

काठिन्याद्वारिणी ज्ञेयां भूतानां धारिणी हि सा ।
यस्मिन्स्थाने स्थितं ब्रह्माण्डं तस्मिन्सन्निहित सरः ।
वामन । 43/35

महाभारत बनपर्व के अन्तर्गत भी सन्निहित सरोबर की महिमा का वर्णन हुआ है।

ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थ सन्निहती मपि तत्र ब्रहमादयो देवा ऋषय | च तपोधनाः ।

हे धर्मराज युधिस्ठर बहां से सन्निहित तीर्थ को जावें जहां ब्रहमादि देव तपोधनी प्रापि महर्षि महापुण्य युक्त होने से वहां प्रतिमास आते हैं।

मासि भासि समायान्ति महतोचिंता सनिहत्या मुपस्पृश्य राहु ग्रस्ते दिवाकरे

सूर्य को राहु द्वारा आच्छादित करने पर अर्थात सूर्यग्रहण के अवसर पर सब्रिहत तीर्थ में स्नान करने पर पुरुप को सौ अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

23

अश्वमेध शतं तेन तत्रेष्ट शाश्वतं भवेत पृथ्वियां यानि तीर्थानि अन्तरिक्ष चराणि च निः संश्यम वास्यां समेष्यन्ति नराधिवः

पृथ्वी एवं स्वर्ग पर जितने भी तीर्थ हैं हर अमावस्या को सत्रिहित में आते हैं।

मासि मासि नरव्याघ्र संनिहत्यां न सशवः तीर्थ सन्निहिता देव सम्हित्येति विभुता

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्ग लोके महीयते । अमावस्यां तत्रैव राहु ग्रस्ते दिवाकरे । यः श्राद कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यं फलं शृणु ।। यतकिचितं दुष्कृत कर्म स्त्रिया व पुरुषे वा । स्नातमात्रस्य तत सर्व नश्यते नात्रसंशयः ।।

अमावस्या को सनिहित में स्नान करने से पुरुप स्वर्गलोक में पूजित होता है। तमोरुप राहु से सूर्य के आच्छादित होने पर, सन्निहित तीर्थ पर श्राद्ध करने से विधि पूर्वक मनुष्य को एक हज़ार अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है और उसमें स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्रहमवेदि कुरुक्षेत्र में पुण्यमय सन्निहित सरोवर है। जो भी यहां स्नान करता है उसे परम पद की प्राप्ति होती है। स्कन्दपुराण के अनुसार इस तीर्थ में यदि कोई एक गरीब ब्राहमण को अन्न दान करता है तो उस एक व्यक्ति को खिलाना करोड़ों व्यक्तियों को खिलाने के समान है।

यस्तत्र भोजदेन विप्रं षडरसं विधिपूर्वकम् एकेन भोजितैनेव कोटिर्भवति भोजिताः

जो रात्रिहित में होम करता है उस को करोड़ों होम का फल मिलता है

मस्तत्र कारमेदं होम सन्निहित्या समीपतः एकैकहुति दानेन कोटि होम फलं भवेत ।
स्कन्द । 7/82

24

वामनपुराण की एक अन्य गाथा के अनुसार शिव ने ऋपियों से कहा कि वे सन्निहित तीर्थ में उनके लिंग की स्थापना करें किन्तु ऋषि लोग लिंग को हिलाने में समर्थ न हो सके । अतः शिव ने कृपा करके स्वयं ही इस सर में लिंग की स्थापना की-

युष्माभि पतितं लिंग सारमित्वा महत्सरः सन्निहित्यं तु विख्यातं तस्मि शीघ्रं प्रतिष्ठिम ।
वामन । 23/13

इस प्रकार रात्रिहित कुरुक्षेत्र के प्रसिद्धतम तीर्थों में एक है। स्वयं प्रजापति ब्रह्मा ने इस सर का विस्तार किया। दूसरे सरोवर तीर्थों का विवरण "शिव तीर्थ" के अन्तर्गत किया गया है।

25

कुरुक्षेत्र के शिव तीर्थ

स्थाण्वीश्वर तीर्थ

कुरुक्षेत्र गोता के उपदेश स्थल के रुप में विश्वविख्यात है, महाभारत का विश्व व्यापी युद्ध भी यहीं पर हुआ, किन्तु यह भी सत्य है कि अनादि काल से यह स्थान आसुताप, औढ़रटानी, देवाधिदेव भगवान शंकर का भी अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यहा के इप्टदेव प्रमुख रुप से स्थाणीश्वर महादेव ही रहे हैं। स्वयं प्रजापति ब्रह्मा ने अपने कर कमलों से स्थाणु लिंग विग्रह की स्थापना की थी ऐसा प्रमाण हमें वामनपुराण में प्राप्त होता हैः

एवं स्तुत्तो देवगणैः सुभक्तया स ब्रहमामुख्र्यश्च पितामहेन त्यकत्वा तदाहस्तिरूपं महात्मालिंग तदा सनिधानं चकार ।
वामन । 44/38

अस्तु स्थाण्वीश्वर तीर्थ की प्राचीनता असन्दिग्ध है। स्थाण्वीश्वर महादेव थानेसर नगर के अधिष्ठाता है, आराध्य हैं और स्वामी हैं। कुरुक्षेत्र आने पर जिसने स्थाणवीश्वर महादेव के दर्शन नहीं किये समझिये उस की कुरुक्षेत्र यात्रा अधूरी है। वामनपुराण में ब्रहमादिदेव कृत शिव स्तुति में कहा गया है-

स्थाण्वीश्वरे स्थितो भस्माततः स्थाण्वीश्वरः स्मृतः ये स्मरन्ति सदा स्थाणुं ते मुक्ताः सर्वकिल्वबैः ।
वामन 44/15

स्थाणु में ईश्वर स्थित होने से ही इसे स्थाण्बीश्वर कहा जाता है। जो व्यक्ति सदा स्थाणु का स्मरण करते हैं वे सभी विपत्तियों से छुटकारा पा जाते हैं। स्थाणु लिंग के दर्शन मात्र से शुद्ध देह वाले होकर मोक्ष के गामी हो जाते हैं।

शुद्धदेहा भविष्यन्ति दर्शनान्मोक्षगामिनः ।
वामन 44/16

वामनपुराण में नानाविध शिवलिंगस्थान माहात्म्य के अन्तर्गत स्थाण्वीश्वर महादेव एवं स्थाणुतीर्थ की महिमा का वर्णन इरा प्रकार मिलता है-

अकामो वा सकामो वा प्रविश्य स्थाणुमन्दिरम् विमुक्तः पातर्क घोरेः प्राप्नोति परमं पदम् ।

26

अर्थात मनुष्य कामना युक्त हो या निष्काम भाव वाला हो, भगवान स्थाणु के मन्दिर में प्रवेश कर घोर पातकों से विमुक्त हो जाता है।

आज्ञानाज्ज्ञानतोवाऽपि स्त्रिया वा पुरुषस्य वा नश्यते दुष्कृतं सर्वं स्थाणुतीर्थ प्रभावतः ।
वामन0 45/24

अज्ञान से अथवा ज्ञान से स्त्रियों के अथवा पुरुषों के जो भी दुष्कृत कर्म होते हैं वे सब स्थाणु तीर्थ के प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं।

लिंगस्य दर्शतान्मुक्तिः स्पर्शनाच्च वटस्य च तत्सन्निथौ जले स्नात्वा प्राप्नोत्यभिभतं फलम् ।
वामन 0 45/25

स्थाणुलिंग के दर्शन से एवं वटवृक्ष के स्पर्श से मुक्ति मिलती है। उसके समीप से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

पिताणां तर्पण यस्तु जले तस्मिनकरिष्यति बिन्दौ बिन्दौ तु तोयस्य हन्यननतफ फलभाग्भवेत ।
वामनी । 45/26

उस जल में जो कोई भी अपने पितृगण का तर्पण किया करता है तो जल के प्रत्येक भिन्दु में अनन्त फल का भागी होता है।

यस्तुकृष्णतिलैः श्राद्ध स्थाणोलिंगस्य पश्चिमें तर्पयेच्छद्धया युक्तः प्रीणयेत्स युगतयम् ।
वामन० 45/27

जो कोई पुरुष काले तिलों से स्थाणुलिंग के पश्चिम में श्राद्ध करता है और श्रद्धा से युक्त होकर तर्पण करता है वह तीनों युगों में सब को प्रसन किया करता है।

अन्येऽपि प्राणिनः केचित्प्रविष्टाः स्थाणुमुत्तमम् ते सर्वे पानिमुक्ताः प्रयान्ति परम पदम् ।
वामन0 46/18

अति उत्तम स्थाणु स्थाणु तीर्थ में प्रवेश करने वाले सभी प्राणी सभी पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करते हैं।

27

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

स्थाणोर्वटस्य पूर्वेण हस्तिपादेश्वरः शिवः तं हष्टवा मुच्चते पापैश्न्य जन्म निसभवैः ।

वामन() 46/2

स्थाणुवट के पूर्व भाग में हस्ति पादेश्वर शिव विराजमान हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य अन्य पूर्व जन्मों में होने वाले पापों से भी मुक्त हो जाता है।

स्थाण्वीश्वर महादेव का मन्दिर कुरुक्षेत्र के प्राचीनतम स्थानों में से है। स्थाणु रुद्र ही इस स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान कृष्ण ने पाण्डवों सहित यहां आकर भगवान स्थाणु का पूजन किया था एवं विजय के लिए आशीर्वाद ग्रहण किया था । स्कन्द भगवान को इसी तीर्थ पर देव सेनापति के पद पर अभिषिक्त किया गया था। महर्षि दधीचि ने भगवान स्थाणु की आराधना करके बज्र देह प्राप्त की थी। महाभारत द्रोणपर्व में वेदव्यास जी अर्जुन को भगवान शिव की महिमा बतलाते हुय कहते हैं:-

महत्पूर्व स्थितों यच्च प्राणेत्पति स्थितश्चयत् स्थित लिंगस्य यन्त्रित्यं तस्मात स्थाणुरितिस्मृत

वे (भगवान शिव) पूर्वकाल से ही महान रुप में स्थित हैं। प्राणों की उत्पत्ति, स्थिति के कारण हैं तथा उनका लिंगमय शरीर रादा स्थिर रहता है। अतः उन्हें "स्थाणु" कहते हैं। सम्राट हर्षवर्धन के पूर्वज पुण्यभूति ने भगवान स्थाण्वीश्वर के नाम पर ही अपनी राजधानी का नाम "स्थाणत्रीश्वर" रखा था जो बाद में अपभ्रंश होकर "थानेसर" हो गया। इसी मन्दिर को महमूद गजनवी ने लूटा और तुड़वाया। इसी के बाद आधुनिक मन्दिर पानीपत तृतीय युद्ध के चीर सेनानी श्रीमद् सदाशिव राव भाऊ मराठा ने बनवाया था ।

मन्दिर आज भी अपनी प्राचीनता बनाए हुए हैं। स्थाणुमंदिर की अ‌द्भुत विशेषता यह है कि यहां आने वाले को आत्मिक शांति का आभास होता है। मन निर्मल होकर चित्तवृत्ति स्थिर हो जाती है। प्रभु भजन में मन लगता है। मन्दिर में सदैव अखण्ड ज्योति प्रकाशित रहती है। श्रद्धालु जन वांछित फल प्राप्त करते हैं। जब से यह मन्दिर महानिर्वाणी अरगड़ा के अन्तर्गत श्री दिगम्बर बाबा शरणपुरी जी के सानिध्य में आया है तब से ही विकास के शिखर पर पहुंचा है। पुराने जीर्ण शीर्ण खंडहर को एक अति आधुनिक विशाल सज्जायुक्त तीर्थ का रूप दे दिया गया है। मन्दिर में विशाल सत्संग भवन का निर्माण हुआ है जिसमें मां आदिशक्ति सिंहवाहिनी दुर्गा की विशाल मूर्ति है। उनका मनोहारी श्रृगांर देखकर दर्शनार्थी अपलक दृष्टि से एक टक होकर देखते रह जाते हैं। मन्दिर में नित्यप्रति आरती सत्संग, कीर्तन एवं भजन का आयोजन होता है। शिवरात्रि महापर्व तो अनेकों श्रद्धालु गवा एवं दर्शन के लिए यहां आते हैं। कुरुक्षेत्र में धार्मिक वातावरण बनाने में इस मन्दिर का प्रमुख योगदान है। विशेष रुप से मन्दिर के वर्तमान स्वामी दिगम्बर प्रभात पुरी जी के कुशल नेत्रित्व में प्रशंसनीय प्रगति हुई है।

स्थाण्त्रीश्वर तीर्थ स्थित सरोवर का भी जीर्णोद्वार हुआ है। चारों ओर सुन्दर पक्का भाट

28
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

है। उसमें स्वच्छ जल भरा रहता है। ऐसा कहा जाता है कि यह तीर्थ इतना पवित्र है कि इस के पवित्र जल की कुछ बूंदों से ही एक राजा "बाण" के कुष्ट रोग का निवारण हो गया था । पाण्डवों ने विजयश्री हेतु यहां पर भगवान शिव की आराधना की। महाराज हर्ष तो इतना प्रभावित हुए कि भारत वर्ष की राजधानी ही थानेसर बना दी।

कालेश्वर तीर्थः -

स्थाणुं तीर्थ को जाते हुए बाई ओर एक बहुत ही प्राचीन शिवतीर्थ है "कालेश्वर"। ऐसा कहा . जाता है कि कंकाल रुप महात्मा रुद्र ने इस लिंग की स्थापना की थी। इस के दर्शन करने मात्र से ही सब पापों का नाश हो जाता है। ये मुक्ति प्रदाता हैं एवं अगिनष्टोम यज्ञ फल को देने वाले हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि रावण ने भी यहीं पर भगवान रुद्र की प्रतिष्ठा की थी। यहां रुद्र ध्यान हेतु सैकड़ों भक्तजन आते हैं।

चतुर्मुख महादेवः -

स्थाणु शिव मन्दिर के समीप ही झांसा रोड पर बाईं ओर यह शिव तीर्थ विद्यमान है। यहां पर चतुमुख महादेव जी का छोटा सा मन्दिर है। साथ ही पवित्र सरोवर है। राष्टि रचयिता पितामह ब्रह्मा से पूजित महेश्वर चतुर्मुख नाम से संग्थापित हुए ।

चतुर्मुखं ब्रहमतीर्थ यत्र मर्यादया स्थितम् ये सेवन्ते चतुर्दश्यां सोपवासा बसन्ति च ।

वामन 42/28

मर्यादा संस्थित चतुर्मुख महादेव का जो पुरुष उपवास करते हुय चतुर्दशी विधि में उस का सेवन (पूजन) करते हैं अथवा यहां वास करते हैं वे परम सूक्ष्म तत्व का दर्शन प्राप्त करते हैं एवं पुनः जन्म ग्रहण नहीं करते। उनका यत्नपूर्वक पूजन करके उपवास के साथ जितेन्द्रिय पुरुप अगम्या स्त्री गमन आदि दोपों से मुक्त हो जाता है। वसिष्टाश्रम में स्थित चतुमुख की स्थापना करके सर्वोत्तम सिद्धि की प्राप्ति हो सकती है।

कालिकाले तु सम्प्राप्ते वसिष्टाश्रमभास्थितः । चतुर्मुखं स्थापयित्वा ययौ सिद्धि मनु त्तमाम् ।

वामन 49/49

श्री सर्वेश्वर महादेवः-

भगवान शंकर का यह प्राचीन मन्दिर कुरुक्षेत्र सरोवर के मध्य में स्थित है। मन्दिर में पांच कक्ष बने हैं जो ऊपर से भी पांच शिखरों में स्पष्ट दृष्टिगोबर होते हैं। प्राचीन कक्ष में भगवान शंकर का लिंग विग्रह है तथा शिव पार्वती गणेश एवं नंदी की मूर्तियां हैं। दूसरे

29

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

कक्ष में भगवान गरुड़ नारायण जी की श्वेत संगमरमर की बनी हुई पांच फुट ऊंची अत्यन्त मनोहारी प्रतिमा है। अन्य कक्षों में क्रमशः श्रीहनुमान जी, महामाया, कृष्णबलराम की मूर्तियां स्थापित हैं। कहा जाता है कि कुन्ती ने इस स्थान पर स्वर्णकमल के द्वारा भगवान शंकर का पूजन किया था। मन्दिर कुरुक्षेत्र ब्रहम सरोवर के मध्य स्थापित होने से इसकी शोभा भी देखते ही बनती है।

दुःखभंजनेश्वर महादेवः-

सन्निहित सरोवर के पूर्वी तट पर दुःखभंजनेश्वर महादेव का मन्दिर पिछले कुछ त्रपों से शिव भक्तों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। श्रद्धालु जन यहां नित्यप्रति आकर भगवान शंकर की आराधना करके फलीभूत होते हैं। मन्दिर का जीणोंद्धार कुरुक्षेत्र विकास मण्डल द्वारा हुआ है। घाटों का सुन्दर निर्माण एवं सरोवर में पवित्र जल इस मंदिर की शोभाश्री में वृद्धि किए हुए है। थानेसर शहर के निकट होने से यहां पर्याप्त गंख्या में श्रद्धालु जन भगवान शंकर की आराधना से पुण्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

नीलकंठ महादेवः -

रात्रिहित सरोवर के समीप ही हाल में निर्मित नीलकण्ठ महादेव की मूर्ति समस्त श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। इसे डा० कुशवाहा, प्रवक्ता शिक्षण महाविद्यालय, कुरुचक्षेत्र ने कई वर्षों के लगातार प्रयत्नों के बाद पूर्ण किया। सन्निहित सरोवर के मध्य स्थापित होने पर इस मूर्ति की अपनी अलग ही अनुपम पहचान है। इन के दर्शन मात्र से हदय उत्साह एवं श्रद्धा से स्वयं ही नतमस्तक हो जाता है।

30

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

पेहोवा के शिव तीर्थ

पृथवीश्वर महादेव -

कुरुक्षेत्र की सीमा के अन्तर्गत पेहोवा में भी शिवतीर्थ विद्यमान है जिनका अपना विशेष महत्व है। जैसा कि विदित है महाराजा पृथुदक के नाम से ही इस क्षेत्र का नाम पड़ा । पृथु अनन्य शिवोपासक थे। अतः उन्होंने अपने आराध्य देव की स्थापना हेतु "पृथ्वीश्वर महादेव" मंदिर का निर्माण करवाया अर्थात पृथ्वी के स्वामी "पृथ्वीश्वर"। कालान्तर में महाराजा रणजीत सिंह ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। अब कुरुक्षेत्र विकास मंडल के तत्वाधान में पृथ्युदक तीर्थ का विकास हो रहा है। किन्तु अभी भी सरोवर में स्वच्छ जल एवं मन्दिर के नव-निर्माण की आवश्यकता है ।

संगमेश्वर महादेवः -

अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोक विश्रुते त्रिरात्रोपोपिता स्नातो मुच्यतैः सर्व किल्विषैः प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्मे प्रत्युपस्थिते अरुणा संगमे स्नात्वा मुक्तिमाप्नोति मानवाः

अरुणा एवं सरस्वती नदी के लोक विख्यात संगम में तीन रात तक आवासपूर्वक स्नान करने बाला रामस्त पापों से मुक्त हो जाता है। घोर कलियुग आने पर तथा अधर्म का प्रसार होने पर मनुष्य अरुणाभ के संगम पर स्नान करने से मुक्ति प्राप्त करता है।

श्री संगमेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर पेहोवा अम्बाला मार्ग पर पूर्व की ओर पिहावा से लगभग तीन मील की दूरी पर स्थित है। वामनपुराण में इस तीर्थ की उत्पत्ति के विषय में संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है -

राजर्षि विश्वामित्र एवं महात्मा वसिष्ठ में तपस्पर्धा के कारण वैरभाव उत्पन्न हो गया । वसिष्ठ जी का आश्रम स्थाणु तीर्थ पर था। उसके पश्चिम में विश्वामित्र का आश्रम था । एक बार वसिष्ठ जी देवाधिदेव भगवान शिव की आराधना में तल्लीन थे। उनकी तपस्या से विश्वामित्र क्रोधित हो गये। उन्होंने सरस्वती को बुलाकर कहा- तुम मुनि वसिष्ठ कां अपने वेग रो यहां पर ले आओ। मैं उन्हें यहां मारुगा। यह वचन सुनकर मां सरस्वती अति पीड़ित हुई। उन्होंने वसिष्ठ मुनि से वैशा कहा, वसिष्ठ जी ने उत्तर में कहा-विश्वा। मत्र के यहां मुझे ले चलो। इस पर सरस्वती ने वसिष्ठ जी को उस स्थान से जल में प्रवाहित किया । उनके द्वारा स्तुति किए जाने पर भगवती सरस्वती उनको सुखपूर्वक विश्वामित्र के आश्रम में ने आई। वसिष्ठ जी को देखकर विश्वामित्र उन्हें मारने को दौड़े। इस पर ब्रह्म हत्या के भय से भीत हो कर सरस्वती ने विश्वामित्र को वीं वत कर वसिष्ठ जी को जल में बहा दिया। विश्वामित्र ने क्रोधवश सरस्वती को शाप दिया तुम राक्षसों से संयुक्त होकर

31
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

रक्त वहन करो । सरस्वती को इस प्रकार रक्तमय प्रवाहित होते देखकर ऋपि, देवता, गन्धर्व एवं अप्सरायें दुःखी हुए तथा वहां पवित्र तीर्थ में रुधिर बहते देख कर भूत, पिशाच एकत्रित होकर नाचने लगे ।

तदनन्तर वहां तपस्वी ऋषि महात्मा तीर्थ यात्रा के लिए जब सरस्वती तट पर पहुंचे और सरस्वती से सारा वृत्तान्त सुना तो वे अभी नदी के पवित्र जल वाली तथा सर्वपापनाशिनी अरुणा नदी को वहां लाए। इससे सरस्वती का जल पवित्र एवं शुद्ध हो गया। सरस्वती के जल को शुद्ध हुआ देखकर राक्षस बड़े दुखी हुए और दीनतापूर्वक मुनियों से अपनी मुक्ति की प्रार्थना करने लगे-इस प्रकार उन तपस्वी ऋषियों ने उस तीर्थ को शुद्ध कर राक्षसों की मुक्ति के लिए वहां एक संगम की रचना की। "यही अरुणाय संगम" के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी संगम के स्थान पर आदिदेव महादेव जी की स्थापना की गई और यह स्थान संगमेश्वर महादेव के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ ।

श्री पशुपतिनाथ महादेव :-

श्री पशुपति महादेव जी का विशाल एवं भव्य मन्दिर पिहोवा के दक्षिण में बाबा श्रवणनाथ जी के डेरे में स्थित है। मन्दिर प्राचीन स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। मन्दिर के शिखर एवं भीतरी स्तम्भ बहुत ही ठोस एवं आकर्षक बने हुए हैं। मन्दिर में भगवान शिव लिंग चतुर्मुखी रुप में हैं जो कि शुद्ध कसौटी के पत्थर का बना हुआ है। आसुतोष भगवान शंकर का यह विग्रह अत्यन्त विशाल है जो कि कुरुक्षेत्र में ही नहीं अपितु सारे भारत में अद्वितीय है । नेपाल स्थित पशुपतिनाथ के पश्चात यही मात्र ऐसा विग्रह है जो कसौटी के पत्थर का बना है।

मुख्य शिव मन्दिर में चार अलग-अलग भागों में चार मन्दिर बने हुए हैं तथा एक ओर भगवान जगन्नाथ जी, बलराम एवं सुभद्रा जी की काष्ठ प्रतिमायें हैं जो चन्दन की बनी हुई हैं। चार अलग-अलग स्थापित मन्दिरों में सरस्वती, सत्यनारायण, गौरी शंकर एवं हनुमान जी की प्रतिमाएं है। हनुमान जी की विशालमूर्ति अष्टधातु की बनी हुई है। इस पर सिन्दूर चढ़ाया जाता है। कहा जाता है कि यह मूर्ति भूमि की खुदाई करवाते हुए प्राप्त हुई थी ।

दक्षेश्वर महोदव :-

इस तीर्थ में दक्षेश्वर शिव विराजमान हैं। यहां शिव का दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता है।

तोदक्षाश्रम गत्वा दृष्टवा च दक्षेश्वरं शिवम् अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः

वामन 13/21

32

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

यह तीर्थ दाचर नामक स्थान पर करनाल से दक्षिण पश्चिम दिशा में बतीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

भूतेश्वर-ज्वाला पालेश्वरः-

यह तीर्थ जींद में वाराह के समीप है। वामन पुराण के अनुसार ये दोनों लिंग हैं। इनकी पूजा करने । व्यक्तिः पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करता ।

भूतेश्वर च तत्रेव ज्वालामालेश्वरं तथा तायचौ लिंगावभ्यचर्य न भूयो जन्म चाप्नुयात्

वामन। 13/36

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

33
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

पृथुदक (पिहोवा) तीर्थ

महाभारत वन पर्व में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र एवं पुण्यमय कहा जाता है; किन्तु कुरुक्षेत्र से भी अधिक पुण्यमयी है सरस्वती जहां कि हमारे ऋषि आचायें ने वेद संहिताओं की रचना की : सरस्वती से भी पवित्र है उस के तटवर्ती तीर्थ एवं उस से भी अधिक पवित्र है पृथुदक अर्थात पिहोवा तीर्थ ।

पुण्यबाहु कुरुक्षेत्र कुरुक्षेत्रात्सरस्वती । सरस्वत्यश्च तीर्थानि तीर्थभ्यश्रय पृथुदकम् ।

महा ( वन 1 18/25

राजा पृथु द्वारा बसाए जाने पर ही इस तीर्थ का नाम पृथुदक पड़ा। महाभारत के अनुसार राजा पृथु बेन राजा के पुत्र थे। इन्होनें बाहुबल से समस्त राजाओं को जीत लिया था। इन्होंने पृथ्वीतल को प्रोथित समतल बनाया था इसलिए ये पृथु कहे जाते हैं। इन के राजसूय यत्र में महर्षि गण उपस्थित हुए थे और उन्होंने इनका राज्याभिषेक किया था। इनके शासनकाल में बिना जोती हुई भी भूमि अन्न उत्पन्न करती थी। धेनु समूह काम दुहा थी। प्रबल प्रतापी महाराज पृथु ने अनेक यज्ञ सम्पादन किए। समस्त प्राणियों को अभिलपित द्रव्य देकर सन्तुष्ट किया था । इसी दानी राजा ने अपने अश्वमेध यज्ञ में पृथ्वी के समस्त पदाथों की स्वर्ण प्रतिमाएं बनाकर ब्राहमणों को दी थीं। उन्होंने 66 हज़ार सुवर्णछत्र और मणिात्न भूषित सुवर्णमय पृथ्वी दान की थी।

हरिवंशपुराण के अनुसार पृथु कवच, धनु और दिक शर लेकर उत्पन्न हुए थे। सत्पुत्र मुथु के उत्पन्न होने पर वेन पुनाम नरक से रक्षा पा कर स्वर्ग गये। अनन्तर ब्रह्मा देवताओं के गाथ वहां उपस्थित हुए और उन्होंने पृथु को चक्रवर्ती राजा बनाया। पृथ्वी संस्थित मनुष्यों को सुख सम्पत्र विधान कर के उन्होंने राज्य किया था। एक समय प्रजा ने राजा के रामीप उपश्थित होकर अपनी-अपनी वृत्तिनिश्चित कर देने के लिए प्रार्थना की। पृथु ने उनकी प्रार्थना पर शरसंधान करके पृथ्वी पर आक्रमण किया। पृथ्वी पृथु के भय से गौ-रुप धारण करके भागी । पृथु भी धनुषबाण लेकर सब स्थानों में उरा का अनुसरण करने लगे। अन्त में पृथ्वी महाराज पृथु की शरण में आई। पृथु बोले-पृथ्वी तुम सब प्रजाओं को जीविका प्रदान करो और मेरी पुत्री बनो। पृथ्वी बोली मैं आप के प्रस्ताव से सहमत हूँ। परन्तु किस प्रकार मुझ से आप प्रजारक्षा करना चाहते हैं यह पहले स्थिर कर लें। प्रजा की जीविका विधान हेतु मेरा टाहन करना होगा। दोहन करने के लिए आपनको बछड़ों की आवश्यक्ता होगी। क्यूंकि बछड़ों के बिना कभी दूध नहीं निकलता और मुझे समतल भी करना होगा नहीं, तो मेरा दूध सब स्थानों में कैसे फैलेगा। पृथु ने पृथ्वी की बात सुनकर धनुप के अग्रभाग से अनेक पर्वतों को उलट दिया। इस प्रकार समस्त पृथ्वी समतल हो गई। अनन्नर महाराज पृथु ने भगवान स्वायंभुव मनु को वत्स बनाकर अपने हाथ से गोरुप धारिणी पृथ्वी के अनेक शस्य टाहन

34
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

किए। उसी अन्न द्वारा प्रजाजीवन धारण करती है। अनन्तर ऋषियों ने सोमदेव को वत्स बनाकर पुन | पृथ्वी को दोहन किया। इस बार देवगुरु बृहस्पति दोहन कर्ता बने थे। तदनन्तर इन्द्र आदि देवताओं ने मिलकर पुनः पृथ्वी को दुहा। इस बार इन्द्र स्वयं वत्स बने थे और सविता दोग्धा बनी। यज्ञीय हवि इस बार क्षीर रुप से दुहा गया था। भूमि पृथु की पुत्री हुई थी, इसी कारण भूमि का नाम पृथ्वी पड़ा। इस प्रकार महाराज पृथु असमान्य प्रताप से राजाओं में अग्रणी हुए थे।

श्रीम‌द्भागवत में भी पृथु की कथा इस प्रकार आई है। ब्राह्मणों ने अपुत्रक बेन के दोनों बाहुओं का मंथन किया। एक बाहु से पुरुप और दूसरे से एक स्त्री उत्पन्न हुई। उस समय ऋषियों ने कहा था- तुम सब से प्रथम राजा हो। अतएव तुम्हारा नाम पृथु होगा और कन्या का नाम अचि होगा। ऋषियों के कहने से अचि और पृथु का ब्याह हुआ। अनन्तर पृथु को कुबेर ने स्वर्णमय आसन, वरुण ने श्वेत छत्र, वायु ने दो कंगन, ब्रह्मा ने वेदमय कवच, हरि ने सुदर्शन चक्र और लक्ष्मी ने सम्पत्ति दी। भगवान रुद्र ने एक तलवार दी। अग्नि ने पृथु को छाम, सूर्य ने रश्मिवाण और भूमि ने योगमयी पादुका उपहार में दी।

महाराज पृथु भगवान के अंश से उत्पन्न हुए थे। उन्होंने समस्त प्रजाओं पर भगवान दिवाकर के समान अपना प्रताप फैलाया था। पृथु ने उत्तम कार्यों द्वारा सब को प्रसन्न किया था। वे पर स्त्री को माता एवं अपनी स्त्री को अपने शरीरार्द्ध के समान समझते थे। उन्होनें सौ अश्वमेघ यज्ञ किए। अन्तिम यज्ञ के समाप्त होने से पहले ही देवराज इन्द्र ने उनका यज्ञीय अश्व चुरा लिया था। महाराज पृथु ने सनत्कुमार की आराधना करके ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया एवं यथासमय उन्होनें सदगति प्राप्त की।

प्रसिद्ध पेहोवा तीर्थ हरियाणा राज्य में जिला कुरुक्षेत्र में स्थित है। थानेसर से इस तीर्थ की दूरी लगभग 31 किलोमीटर है। पवित्र सलिला नदी के तट पर अवस्थित इस तीर्थ का भारतीय संस्कृति एवं इतिहास में अपना विशिष्ट स्थान है। इस तीर्थ की महिमा का वर्णन महाभारत, भागवत, भविष्य पुराण, वामन, वायु पुराण इत्यादि कई धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है। राजा पृथु ने इस स्थान को हज़ारों वर्ष पहले बसाया था। दूसरे पृथु उदक से तात्पर्य जहां पर राजा पृथु ने अपने पित्रों को उदक (जल) दिया। इस प्रकार पेहोवा संस्कृत शब्द पृथु उदक का ही अपभ्रंश रुप है। इस तीर्थ की महिमा अनन्त है। विश्वामित्र व वगिष्ट जैसे महान ऋषि मुनियों ने इस पतितपावनी सरस्वती नदी के किनारे घोर तप करके इस तीर्थ की महिमा को बढ़ाया। ब्रहमयोनि तीर्थ में स्वयंभू ब्रहमा जी ने अनेक यज्ञ किए। इस तीर्थ की महिमा का यशोगान वामनपुराण में इस प्रकार किया गया है -

पृथुदकं चैर्न दृष्टं न श्रतुम स्मृत तथा
इतिनास्ते वृथा पुत्राः पितरः प्रवदन्तिहि

35

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

जिन पुरुयों ने पृथुदक तीर्थ का नाम न सुना हो, न देखा हो और न ही मन मे स्मरण किया हो, उन के पितर कहते हैं कि हमारी संतान हुई या न हुई एक समान है।

सरस्वत्युतरे तीर्थ यस्त्यजेदात्मन स्तनुम। पृथुदके जप्य परो नैवस्य मरणं भवेत।

वामन 39/19

सरस्वती के उत्तर में जो अपने शरीर का त्याग करता है और पृथुदक में जो जप्य में परायण करता है उसका मरण ही नहीं होता।

पेहोवा तीर्थ को हिन्दु तीर्थों में अत्यन्त पवित्र माना जाता है। यहां प्रतिदिन सैंकड़ों गात्री श्रद्धालु जन, पिडं दान, पितृ तर्पण हेतु आते हैं। इसी तीर्थ पर ऋषि विश्वामित्र ने क्षत्रियत्व को त्यागकर ब्राहायत्व को प्राप्त किया। देवगुरु बृहस्पति ने यहां अनेकों यज्ञ किए। यभाति राजा ने यहां विधिपूर्वक 99 यज्ञ किए। और इसी राजा के यज्ञों से प्रसन्न हुई सरस्वती मधुलवा होकर प्रवाहित हुई । पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी ने यहीं पर सृष्टि की रचना की जिस का प्रमाण ब्रह्मयोनि तीर्थ से मिलता है। यही पर भगवान शंकर ने कृष्ण चतुर्दशी (चैत्रमास) पर भूत प्रेत एवं पिशाचों को दिव्य लोक प्रदान किया। इसी कारण इस चतुर्दशी का नाम पिशाचमोचिनी चतुर्दशी पड़ा। ऋपि वसिष्ठ का आश्रम भी यहीं स्थिर है जहां वे भगवान शंकर की आराधना किया करते थे ।

कुरुक्षेत्र भूमि में पृथुदक के समान अन्य तीर्थ नहीं है क्योंकि और तीथों में स्ननादि करने से पाप नष्ट होते हैं परन्तु यहां तो केवल मात्र नाम लें। से ही पाप दूर हो जाते हैं।

पृथुदकसम तीर्थ नाम्ना पाप प्रमोचनम् । कुरुक्षेत्र गतं नान्यछत्र लंभो सदा स्थिति ।

महाभारत युद्ध में मारे गये वीरों की सुगति प्रदान करने हेतु यहीं पर युधिष्ठर द्वारा पिंड दान करवाये गये थे। श्रेष्ठ मुनि तनक अपने पुत्रों सहित गंगा तट को त्यागकर मोक्ष के लिए यहां पधारे । सपंगु नामक ऋषि ने यहीं पर सिद्धि प्राप्त की। उन्होंने सरस्वती नदी में स्नान करके अपने पुत्रों से कहा था-पृथुदक तीर्थ में अपने शरीर का त्याग करने वाला जप पररायण पुरुप निश्चय ही देवत्व को प्राप्त होता है।

सिख गुरुओं में भी इस तीर्थ के प्रति पूरा सम्मान रहा है। यहां स्नान हेतु गुरु नानक देव जी, गुरु गोविंद सिंह जी, गुरु हरराय जी, एवं महाराजा रणजीत सिंह भी दो बार यहां आये थे। अतएव इस तीर्थ का महत्व समस्त हिन्दु जाति के लिए आज भी ज्यों का त्यों परम्परागत बना हुआ है। आज भीप्रत्येक वर्ष चैत्र चोदस के दिन भारी मेला लगता है जिसमें लाखों श्रदालु अपने पितरों के कर्मकाण्ड, नारायण बलि, गति, पिंडदान हेतु यहां आते हैं। हरियाणा

36
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

सरकार ने इसे राजकीय मेला घोपित किया है। सरकार यहां उचित प्रबन्ध करती है। भारतीय सनातन धर्म महाबीर दल के निष्काम सेवकों द्वारा यात्रियों को स्नान एव पिण्डदान में पूरा सहयोग मिलता है। हरियाणा से ही नहीं अपितु पंजाब से बहुत से श्रदालु यहां मां सरस्वती को श्रद्धासुमन अर्पित करने यहां अते हैं। सच कहा जाय तो यह हिन्दु सिख एकता का पवित्र संगम स्थल है। गंगा के जल में मरने से मुक्ति प्राप्त होती है, काशी में जल तथा थल में भरने से मुक्ति मिलती है। अर्थात यहां की जल, मिट्टी वायु तीनों ही मोक्षदायिनी है। पेहोवा नीर्थ में पावन सलिला सरस्वती के तट पर अनेक तीर्थ है जिनका विवरण पुराणों में इस प्रकार मिलता है:-

विश्वामित्र तीर्थः--

यहां मुनि विश्वामित्र जी का विख्यात तीर्थ है यहीं पर उन्हें ब्राहमणत्व प्राप्त हुआ था । वामनपुराण के अनुसार यहां तीर्थ स्नान करने से मनुष्य निश्चय ही ब्राहमणत्त्व को प्राप्त करता है तथा विशुद्धात्मा ब्राह्मण तो परम पद को प्राप्त करता है।

ब्राहमण्यं लब्धवान्यत्र विश्वामित्रो महमुनिः तस्मिस्तीर्थ वरे स्नात्वा ब्राहमण्यं लभते ध्रुवं ।

वामन । 39/15

ब्राहमण्स्तु विशुद्धात्मा पर पदभवाप्नुयात ।

वामन) 39/16

यह तीर्थ सरस्वती के दक्षिण तट पर 4() फुट ऊंचे टीले पर स्थित है। यहां प्राचीन मन्दिर के अवशेप है द्वार पर सुन्दर मानवकृति हैं जिसने अपने हाथ गोद में रखे हुए हैं। तीनों तरफ दो हाथी उसका अभिनन्दन कर रहे हैं। बाई ओर नवग्रह दाई ओर अष्ट शक्तियां विराजमान हैं।

पृथ्वीश्वर महादेवः -

यह अत्यन्त प्राचीन शिव मन्दिर है जिसका निर्माण स्वयं महाराज पृथु ने करवाया था । मुगलकाल में इसे धकृत कर दिया गया किन्तु मराठा शार। कों ने इसे पुनः जीवन दिया एवं देवालय का निर्माण करवाया। कहते हैं कि बाद में महाराजा रणजीत सिंह जी ने भी इस मन्दिर का जीणोंद्वार किया ।

वशिष्ठ तीर्थः -

जैसा कि नाम से पता चलता है इस स्थान पर वशिष्ठ ऋषि का आश्रम है। यहीं पर उन के द्वारा यज्ञों का आयोजन हुआ था। इस स्थान पर भगवान शिव के तीन मन्दिर तथा गुफा हैं। एक कूप भी है।

37
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

कार्तिकेय तीर्थः -

पृथ्वीश्वर महादेव के समीप ही स्वामी कार्तिकेय का अत्यन्त प्राचीन मंदिर है। इसमे श्रदालु तेल तथा सिन्दूर चढ़ाते हैं। स्त्रियों के लिए इस तीर्थ का दर्शन वर्ज्य है। कहते हैं कि कार्तिकेय का मन्दिर युद्ध देवता कार्तिकेय के उद्देश्य से महाभारत युद्ध के पहले का प्रतिष्ठित है ।

ययाति तीर्थः -

तत्र तीर्थ सुविख्यातं यायातं नाम नामतः यस्यह यजमानस्य मधु-सुस्त्राव वै नदी ।

वामन) 39/36

पावनसलिला सरस्वती नदी के तट पर महाराज ययाति ने अनेकों यज्ञ किए। इस कारण यथाति तीर्थ के नाम से सुविख्यात है। राजा ययाति की इच्छानुसार सरस्वती ने दूध घी नथा मधु प्रवाहित किया था। अतः इन पर बने घाटों को मधुसत्रा तथा ददुग्धस्त्रवा कहते हैं । महाभारत के अनुसार जब राजा ययाति यज्ञ कर रहे थे तो सरस्वती ने अपने प्रति उनकी अटूट श्रद्धा भक्ति को ध्यान में रखते हुए, यज्ञ में आए हुए ब्राहमणों को जो भी उन्होंने चाहा वे गभी मनोवांछित वस्तुएं प्रदान की। राजा के यज्ञ के निमित से आया हुआ जो भी ब्राहमणा जहां कही ठहरा हो वहीं पर सरस्वती ने पृथक गृह, शयया आसन भोजन तथा अनेक प्रकार के दान की व्याख्या की। यहां भक्ति युक्त स्नान करने से व्यक्ति समस्त पापों से मुकत हो जाते हैं एवं अश्वमेघ के फल को प्राप्त करते हैं।

तस्मिन स्नातो नरो भक्तया मुच्यते सर्वकिल्वषैः फल प्राप्नोति यज्ञस्य अश्वमेघस्स्य मानवः

वामन सरो0 18/38

अवकीर्ण तीर्थः -

वामन पुराण में पृथुदक तीर्थ के बाद इस तीर्थ का वर्णन गाया है। इस तीर्थ से सर्बान्धत संक्षिप्त कथा इस प्रकार है- इस स्थान पर "बकदालभ्य" ने महान क्रोध में भरकर तथा तपस्या द्वारा अपने शरीर को कृश बनाकर धृतराष्ट्र के राष्ट्र का होम कर दिया था। कथा के अनुसार नेमिपारण्य में रहने वाले ऋपियों ने बारह वर्ष का एक सत्र प्रारम्भ किया। सत्र की समाप्ति पर सभी ऋषि पांचाल देश गये। वहां जाकर उन्होंने उस देश के राजा से दक्षिणा रुप में धन याचना की वहां उन्हें पशुओं की दक्षिणा प्राप्त हुई। इस पर वकदालभ्य ने उन पशुओं को ऋषियों में बांट दिया और स्वयं धृतराष्ट्र के पास जाकर पशुओं को मांगने लगा। धृतराष्ट्र ने क्रोध वश उसे मरे हुए पशुओं को ले जाने को कहा। इस से वकदालभ्य अपमानित हुए

38
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

और वह मुनि उन मृत पशुओं' के ही मांस को काट कर धृतराष्ट्र के राष्ट्र को आहुति देने लागा । वकदालभ्य के प्रतिकार स्वरुप पशुओं के मास द्वारा इस राष्ट्र का विनाश होने लगा तो सभी ने राजा को सलाह दी कि वे जाकर मुनि को प्रसन्न करें। तत्पश्चात वह राजा पुरोहितों को साथ लेकर रत्नों को लेकर बकदालभ्य मुनि के पास पहुंचा तथा उससे रक्षा की प्रार्थना की। इस पर प्रसन्न होकर मुनि ने राजा को ग्राहमण के निरादर न करने की सलाह दी और कहा कि अपमानित ब्राहमण तीन पीढ़ियों को नष्ट कर देता है। द महाभारत के अनुसार वृहस्पति ने राक्षसों के विनाश के लिए तथा देवताओं के अभ्युदय हेतु यहां यज्ञ का अनुष्ठान किया । इस तीर्थ में जो जितेन्द्रय व्यक्ति श्रद्धापूर्वक स्नान करता हे वह नर नित्य मन ग्यसे वांछित फल को प्राप्त करता है।

तस्मिस्तीर्थं तु युः स्नाति श्रद्धानो जितेन्द्रियः स प्राप्नोति नरो नित्यं मनसा चिन्तितं फलम्

वाम सरो) । 18/36

ब्रहमयोनि तीर्थः -

चातर्वर्ण्य ततो दृष्टवा आश्रमाः स्थापिता स्ततः एवं प्रतिष्ठित तीर्थ ब्रहमयोनीति संज्ञितम्

वाम सरो0 39/23

चारो वर्षों की रचना को ध्यान में रखते हुए ब्रहमा जी ने वगर आश्रमों की स्थापना की इस तरह से ब्रहमयोनि-इस संज्ञा वाला तीर्थ प्रतिष्ठित हुआ। वहां स्नान करके जो मुक्ति की कामना वाला पुरुप है वह पुनः किसी भी योनि का दर्शन नहीं करता। यह तीर्थ स्थान पृथु दक तीर्थ से बिल्कुल जुड़ा हुआ है कहा जाता है कि ऋषियों ने तपस्या करके मोक्ष प्राप्त किया । ब्रहमाजी के मुख से ब्राहमण, बाहुओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य और पैरों से शुद्र यहाँ उत्पन्न हुए थे। चारों वर्णों की स्थापना होने से ही यह तीर्थ ब्रहमयोनि कहलाया ।

सरस्वती तीर्थः -

पेहोवा तीर्थ के साथ सरस्वती तीर्थ का वर्णन न हो तो उचित नहीं लगता। यहां पर सरस्वती देवी का एक छोटा सा मन्दिर सरस्वती नदी के तट पर ही बना हुआ है इस कां निर्माण भी मराठों ने करवाया था मन्दिर का द्वार अत्यन्त सुन्दर एवं गुप्तकालीन मूर्ति कला का परिचायक है ।

अग्नि तीर्थः -

महाभारत में इसी तीर्थ का वर्णन आता है। यह तीर्थ पेहोवा के समीप ही स्थित है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार भृगु ऋषि के शाप से भयभीत होकर अग्नि देव शमी वृक्ष के अन्दर

39
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

अदृश्य हो गये । अग्निदेव को न दिखाई देने पर इन्द्र सहित सभी देवता अत्यन्त व्याकुल होकर उन्हें खोजने लगे। खोजते हुए उन्होंने अग्निदेव को शमीवृक्ष के गर्भ में निवास करते देखा । देवता वृहस्पति जी को लेकर वहां उपस्थित हुए किन्तु खाली हाथ लौटे। अग्निदेव ऋषि के शाप वंश सर्व भक्षी हो गये। इसीलिए यह तीर्थ अग्नितीर्थ कहलाया। इसमें स्नान करने से व्यक्ति अपने कुल का उद्धार करता है।

अग्नि लोकभवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत

वामपु० 81/119

40
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र के कूप तीर्थ

चन्द्रकूपः -

कुरुक्षेत्र सरोवर के मध्य में स्थित पुरुषोतम पुरा (आचीनमुगलपुरा) में यह अत्ति प्रगिद्ध कूप तीर्थ है। इस क्षेत्र के पवित्र कूपों में गिना जाता है। कहा जाता है कि धर्मराज युधिष्ठर ने महाभारत युद्ध के बाद इस स्थान पर विजय स्तम्भ बनवाया था जो कालान्तर में लुप्त हो गया। यहां गुप्त दान का महत्व है।

देवीकूपः -

भगवती दुर्गा के प्रसिद्ध इकावन शक्तिपीठों में अद्भूत पीठस्थान है। मां भद्रकाली तीर्थ और इसी तीर्थ पर स्थित एम पवित्र कूप का नाम है देवीकूप। इसे दुर्गाकूप भी कहा जाता है। दक्ष के यज्ञ में भगवान शंकर का भाग न देखकर अपने पिता दक्ष को शिव की निंदा य.रते हुए सुनकर अत्यन्त क्रोध वश सती ने अपना शरीर त्याग दिया। भगवान शंकर सती का मृत शरीर कांधे परर धारण करते हुए उन्मत भाव से नृत्य करते हुए त्रिलोकी में घूमने लगे। ऐसा देखकर भगवान विष्णु ने अपने चक्र से राती के शरीर को विभाजित कर दिया। इस प्रकार इकावन टुकड़े हुए और उन्हीं स्थानों पर शक्तिपीठ स्थापित हुए। कुरुक्षेत्र में सती के शरीर का दायां टखना गिरा था। जहां सावित्री देवी शक्ति तथा स्थाणु भैरव प्रकट हुए। यह वही महान शक्ति पीठ है-

कुरुक्षेत्रे उपरो गुल्फः सावित्री स्थाणु भैरवम् । गत्वा सुशोभिते नित्यं देवयाः पीठो महामुनि ।।

प्राचीन परम्परा के अनुसार महाभारत युद्ध के समय अर्जुन ने भगवती दुर्गा का रणचण्डी के रुप में आह्वान किया था। भद्रकाली का पूजन तथा यज्ञ करके उन्हें प्रसन्न किया था। इस कारण इसे भद्रकाली के नाम से भी पुकारा जाता है।

41

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

वामन पुराण में वर्णित कुरुक्षेत्र

महाराज कुरु द्वारा कर्पित किए जाने पर इस पुण्यभूमि का नाम कुरुक्षेत्र हुआ। इन्द्रदेव ने प्ररात्र होकर उन्हें यह वरदान दिया कि यह समस्त भूमि अर्थात जितना भी भू-भाग कुरु द्वारा कर्पित हुआ है धर्मक्षेत्र कहलाएगा ।

वरदो डस्मीत्ये युक्ते कुरुर्वस्य याचत । यावरे तन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्र तदस्तुवः ।

वामन)

22/33

पुनः महाराज कुरु ने यह वरदान मांगा कि यहां जो भी स्नान करने वाले हों अथवा मृत्यु गल हों, उनके लिए यह स्थल महान पुण्य फल देने वाला हो यहां पर उपवास, दान, स्नान, जाप एवं होम आदि हों ।

स्नाताना च मृतानां च महापुण्यफलत्विह । उपवासश्रव दानं च स्नांन जप्यं च माधव ।।

वामन() 23/24

हे प्रभो अन्य भी शुभ कर्म अथवा अशुभ कर्म आप के प्रसाद रो अक्षय एवं महान फल वाला हो जाए ।

होम यज्ञादिकं चान्यच्छुमं वाज्य शुभं विभो । त्वत्प्रसादादृधीकेष शंख चक्र गदाधार ।

वामन0 22/35

अक्षयं प्रवरे क्षेत्रे भवत्वत्र महाफलम् । तथा भवान्सुरैः सार्द्ध समं देवेन शूलिना ।

वामन 22/36

त्वसात्र पुण्डरीकाक्ष मनामण्यन्केच्युत । इत्यवमुक्तस्तेनाह राज्ञा वाढमुवाच तम ।।

वामन 22/37

राजा कुरु प्रभु से यह भी वरदान चाहते हैं कि हे पुण्डरीकाक्ष आप समस्त देवों तथा देवशूली के साथ यहां निवास करें और यह स्थान मेरे नाम का द्योतक होवे। इस प्रकार भगवान ने तथास्तु कह कर "सब ऐसा ही होगा" वरदान दे दिया। तदनन्तर भगवान पुरुषोतम प्रभु के इस क्षेत्र की रक्षा हेतु चन्द्र नाम वाले यज्ञ को, वासुकि सर्प को, विद्याधर, शंकु, कर्ण, सुवे.श, राक्षरोवर, अजावन, नृपति, महादेव, पावक इन सब को प्रदान किया और ये सभी रहां एकत्रित होकर कुरु जगंल की रक्षा करते हैं।

42
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

अजावनं च नृपति महादेवं च पावकम् । एतानि सर्वतोऽभ्येत्व युक्तं रक्षन्ति कुरुजागंलम् ।।

वामन 22/41

तस्यैव मध्ये महापुण्य युक्तं पृथुदक पापहरं शिवं च पुण्यानदी प्राइगं मुखतां प्रयाता जलौद्य युक्तस्य सुताजलाद्या ।

वामन 22/44

कुरुक्षेत्र के मध्य में एक परम पुण्य कल्याणकारी तीर्थ पेहोवा है जो कि पुण्य सलिला सरस्वती नदी के तट पर स्थित है। पहले इस नदी का सृजन पितामह ब्रहमा ने किया और समस्त भूतगणों के साथ यही नदी जल, अग्नि वायु तथा आकाश आदि में अधिक जला बाली थी।

सरस्वती हपद्धत्योरन्तरे कुरुजाङ्गले मुनिप्रवरमासीन पुराणं लोमहर्षणम्

वामन 22/47

कुरुक्षेत्र के अन्य तीथों के विषय में पूछे जाने पर मुनियों में परम प्रवर पुराण लोमहर्षण ने ऋपियों से कहा कि ब्रहमा जी ईश कमलारान पर स्थित विप्णु जी जो लक्ष्मी सहित विराजमान हैं, रुद्रदेव और तीर्थवर ब्रहमरार राव को शिर के बल प्रणाम करके ही में बताउंगा। इस प्रकार ब्रहम सरोवर को भगवान का ही स्वरुप माना गया है।

ब्रहमणमीश कमलासनस्थं विष्णुं च लक्ष्मी सहित तथैव रुद्र च देव प्रणिपत्य मूधर्ना तीर्थ वरं ब्रहमसरः प्रवक्ष्ये

वामन 22/50

सत्रिहित तीर्थ के लिए तो पुण्यमय एवं महान वृद्धि दायक अर्थात श्रेष्ठ फल देने वाला बतलाया गया है।

रन्तुका दौजसचापि पावनाव्य चतुर्मुखम् । सरः सन्निहितं प्रोक्त ब्राहमणा पूर्वमेव तू ।

वामन 22/51

देववर विश्वेश्वर में भी पावन शरस्वती है। उसी के निकट यह सरोवर चारों ओर लगभग अर्धयोजन के प्रमाण वाला बतलाया गया है। देववृंद यहां आते हैं ये सभी मुक्ति की कागना पूर्ण करने हेतू एवं दूसरे स्वर्ग लोक की प्राप्ति हेतु इस तीर्थ का सेवन करते हैं:-

43
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

विश्वेश्वरा ववरात्पावनी च सरस्वती सरः सन्निहितं प्रोक्तं समन्तादद्धयोजनम् ।।

वामन । 22/55

एतादिश्रत्य देवाश्रय ऋषयश्रय समागताः सेवन्ते मुक्तिकामार्थ स्वगीर्थ चापरे स्थिताः ।

वामन 22/56

ब्रहमणा सेवितंमिदं सूष्टि कामेन योगिना । विष्णुना स्थिति कामेन हरि रुपेण सेवितम् ।।

वामन 22/57

रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना ।

सेव्य तीर्थ महातेजाः स्थाणुत्व प्राप्तवान्हरः ।।

वामन 22/58

आधेषा ब्रहमणो वेदिस्ततो रामहृदः स्मृतः कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्र ततः स्मृतम् ।।

वामन 22/59

तरन्तु कारन्तुक कर्योर्यदन्तरं यदन्तरं रामहृददस्य पण्चकात् एतद कुरुक्षेत्र समन्तपंचक पितामहस्योत्तर बंदि रुच्यते ।।

वामन 22/60

प्रजा सृजन हेतु योगिराज ब्रहमा ने इस तीर्थ का सेवन किया। भगवान विष्णु ने भी हरि रुप से जगत की स्थिति हेतु इस का सेवन किया। रुद्रदेव भगवान शंकर ने तो इस सर के मध्य में प्रवेश कर के महान तेजस्वी देव बनकर इस तीर्थ का सेवन किया और तभी से वे स्थाणुत्व को प्राप्त हुए । यहीं सर्वप्रथम ब्रहमा की वेदि थी फिर इसको रामहृद कहा गया; कुरु के कर्पण के बाद तो इसे कुरुक्षेत्र नाम से ही जाना जाता है। यह समन्तपंचक क्षेत्र कुरुक्षेत्र पितामाह की उतरवेदि थी। सरस्वती महात्म्य वर्णन के अन्तर्गत कुरुक्षेत्र तीर्थ की महिमा का अभूतपूर्व वर्णन हुआ है।

तत्र सा रन्तुकं प्राप्य पुण्यतोया सरस्वती

कुरुक्षेत्रं समाप्लाव्य प्रयाता पश्चिमां दिशम् ।

तत्र तीर्थसहस्त्राणि ऋषिभिः सेवितानि च ।

तान्यहं कीर्तिमिष्यामि प्रसादा त्परयेष्टिनः ।।

तीर्थानां स्मरणं पुण्यं दर्शन पाप नाशनम । स्नानं पुश्यकरं प्रोक्तमपि दृष्कृत्त कर्मण ।।

ये स्मरिष्यन्ति तीर्थानां देवताः प्रीणयन्ति च ।

44
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

स्नान्ति च श्रद्धानाश्रय ते यान्ति परमां गतिम् * ।।

वामन 1 33 2-5

पुण्यमय जल वाली सरस्वती ने कुरुक्षेत्र को सम्पलवित करके पश्चिम दिशा में प्रयाण किया। वहां पर सहस्त्रों तीर्थ हैं जो ऋपियों के द्वारा सेवित हैं। इन तीर्थों का स्मरण करने से महान पुण्य होता है तथा दर्शन से सम्पूर्ण पापों का नाश होता है। जो कोई भी पुण्य तांथों का स्मरण करता है उस पर देवगण परम प्रसन्न होते हैं और जो इन तीथों में स्नान करते वे परम गति को प्राप्त करते हैं।

कुरुक्षेत्र गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम । अध्येतां वाचमुत्सृत्य सर्व पापैः प्रभुच्यते ।। ब्रहमज्ञान गया श्राद्धं गागू है मरणं ध्रुवम् । वासः पुंसां कुरुक्षेत्रे मुक्तिरुक्ता चतुर्विधा ।। सरस्वती हपद्धत्योर्द्ध योर्नधोर्यदन्तरम् । तं देवनिमितं देशं ब्रहमावर्त प्रचक्षते ।। दूरस्थोऽपि कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि वसाभ्यहम् । एवं यः सततं वूयात्सोऽपि पापैः प्रमुच्येत ।। तत्रैव च वसन्धीरः सरस्वत्यास्तटे स्थितः । तस्थ ज्ञानं ब्रहममयं भविष्यति न संशयः ।। देवता ऋषयः सिद्धा सेवन्ते कुरुजाङ्गलम् ।

तस्य संसेवनान्नित्य ब्रहम यात्मनि पश्यति ।।

वामन नं0 33/8-12

मैं कुरुक्षेत्र जाउंगा ऐसी ही वाणी यदि कोई पुरुप कह देता है तो इतने कहने से ही वह गब पापों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्म के स्वरुप का ज्ञान प्राप्त कर लेना, गया तीर्थ में जाकर पिनरों का श्राद्धतर्पण करना, गोगृह में मृत्यु प्राप्त करना एवं कुरुक्षेत्र में निवास करना चार प्रकार की मुक्ति बतलाई गई। सरस्वती और दृपद्धती इन दोनों नदियों का जो अन्तर भाग है वही ब्रहमावर्त कहा जाता है। दूर प्रदेश में रहने वाला भी मैं कुरुक्षेत्र जाउंगा और वहां पर निवास करुगा इस प्रकार जो निरन्तर बोला करता है वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। जो धीर पुरुष सरस्वती नदी के तट पर स्थित इस क्षेत्रत्र में रहता है उसे निश्चय ही ब्रह्मज्ञान हो जाता है। इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं। देवगण, ऋषिवृन्द, और सिद्ध लोग कुरुजाङ्गंल का सेवन करते हैं। उसके भली भांति सेवन से पुरुप नित्य ही अपनी आत्मा में ब्रह्म का दर्शन किया करता है।

ब्रह्मवेदि कुरुक्षेत्र पुण्यं सन्निहित सरः । सेवमाना सरा नित्यं प्राप्नुवन्ति परं पदम् ।।

45
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

ग्रह नक्षत्र ताराणां कालेन पतनाभयम् । कुरुक्षेत्र मृतानां च पतनं नैव विधते ।।

वामन । 33/15-16

ब्रह्मवदि कुरुक्षेत्रत्र एवं पुण्य सर सन्निहित का सेवन करते हुए मनुष्य नित्य परम पद को प्राप्त करते हैं। ग्रह, नक्षत्र तारागण इत्यादि का समय आने पर पतन संभव है किन्तु कुरुक्षेत्र में प्राण त्यागने वाले का कभी पतन नहीं होता ।

स्नानतीर्थमहात्म्य वर्णन के अन्तर्गत भी उल्लेख है-स्नानत्वा ऽभिगम्य तत्रैच महापातकनाशन् । कुरुक्षेत्रस्य तदद्धारं विश्रुतं पुण्यवर्धनम् ।।

वामन 24/40

अर्थात कुरुक्षेत्र द्वार पुण्यों की वृद्धि करने वाला है। वहां स्नान एवं अभिगमन (निवास) से महापातकों का नाश हो जाता है।

वामन पुराण में वर्णित तीर्थ स्नान एवं उनके आधुनिक नामः-

सर्पिवधि

सफीदों

पंचनद

पाजु

वाराह

वराह

अश्वनी

आसन

भूतेश्वर

भूतेश्वर

सोमनाथ

सोमनाथ

सालुकि

शिलाखेड़ी

ज्वालामालेश्वर

ज्वालमाला

जिमनी

जींद

पुष्कर

पोखर खेड़ी

रामहृद

रामराय

अवन्तिनगर

अग्रोहा

लोकोद्वार

लोधर

कपिलहृद

कलायत

ब्रहमावर्त

वहिरगांव

सीतावन

सीवन

आपगा

आपगा

कपिस्थल

कैथल

श्रीविष्टम्

ट्योढा

फलकिवन

फल्गु

सप्तसारस्वत्

सांच

वंशभूल

बरसोला

अरुनसरस्वती

अरुणाय

एकहंस

ईक्कश

स्थाणेश्वर

थानेसर

कालेश्वर

कालूसर

श्रीतीर्थ

कसीन

कायशोधन

कसून

सुतीर्थ

सूथ

सांगनी

सजूमा

पुण्डरीक

पूण्डरी

मानस

मानस

हनुमनस्थान

सारसा

रानावर्तन

रसीना

काम्यक

कमोदा

औसनस

ओगंद

सत्रिहित

सनेत

46
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

पृथुदक

पेहोवा

गवेन्द्र

गोन्दर

कपिस्थल

कैथल

कलखीतीर्थ

कसीग्राम

केदारतीर्थ

क्योड़क

कोटितीर्थ

क्रोड़ा

मधुवन

मोहना

लोकुलातारण

कौल

शालूकिनी

अदिति

सरकतीर्थ

मुदित

पवनहृद

वामनतीर्थ

अनरक

शालवण

अमीन

शेरगढ़

मुवाणा

पपनावा

बरसाणा

नरकातारी

ब्रह्मणपुराण में वर्णित कुरुक्षेत्र

विभित्र पुराणों के अर्न्तगत पुराणों की दी गई सूचि में थोड़ा बहुत भेद देखने में आता है । किन्तु ब्रह्मपुराण को सभी लेखकों ने प्रथम लेखकों ने प्रथम स्थान दिया है। इस का कारण वस्तुतः यही समाचीन लगता है कि यह समस्त विश्व ब्रह्मा से ही उद्भूत है इसीलिए सर्वप्रथम इसी का वर्णन करना उचित है। ब्रह्म पुराण के तीर्थ वर्णन में भी कुछ विशेषता है। इनमें जिन कपोत तीर्थ, पैशाच तीर्थ, सुधा तीर्थ चक्रतीर्थ गणिका संगम, अहिल्या संगम तीर्थ, श्वेत तीर्थ वृद्धावस्था तीर्थ ऋणमोचन तीर्थ, सरस्वती संगम तीर्थ खेती संगम तीर्थ, आदि का उल्लेख है वे किसी अन्य पुराण में नहीं मिलते। ब्रहमपुराण में सर्वप्रथम स्वयंभू ब्रह्मर्पि संवाद वर्णन के अर्न्तगत कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र का परिचय प्राप्त होता है। मुनिगणों के पूछने पर कि इस पृथ्वी पर सब से उतम भूमि कौन सी है जो धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन चारों को देने वाली है। और सर्वोतम तीर्थ कौन सा हैः-

लोमहर्पण जो कहते हैं-हे मुनिवरों यह उतम भूमि कुरुक्षेत्र में आसीन हैः जहां पर बुद्धिमानों में श्रेष्ठं महान ग्रन्थ के रचयिता समस्त शास्त्रों के मनीपी विद्वान सब प्राणियों के हित करने वाले पुराणों एवं आगमों के प्रवक्ता, वेदों और वेदांगों के रचयिता पाराशर मुनि के सुपुत्र श्रीवेदव्यास जी, जिस आश्रम में निवास करते है अर्थात व्यासवन ही उतम भूमि है। यह। पर व्यास आश्रम स्थित है एवं उनके दर्शन हेतु असंख्य मुनिगण प्रीति एवं श्रद्धापूर्वक वहां निवास करते हैं:-

कुरुक्षेत्र रामासीनं व्यासं मतिमतां वरम् । महाभारत कर्तारं सर्वशास्त्र विशारदम् ।।

ब्रह्मपुराण 18/6

ब्रह्मपुराण में भारत वर्ष वर्णन के अन्तर्गत पुण्य तोया सरिताओं में गंगा, सरस्वती, गिन्धु एवं चन्द्रभागा का वर्णन हुआ है। ये सब सरिताएं शीतल जल वाली, पुण्यमयी एवं हिमालय के पादों से समुत्पत्र हुई हैं।

सर्व्वा पुण्या सरस्वत्यः सर्वा गंगां सभुद्रगा गंगा सरस्वती सिन्धु चन्द्रभागा तथा परा ।।

ब्रह्मपुराण 19/25

ये सभी नदियों विश्व की मातायें है तथा सब पापों का हरण करने वाली हैं।

48

विश्वस्य मातरः सर्वा सर्वा पापहरा स्मृताः

ब्रह्मपु० 19/39

कृप्ण स्नान महात्म्यवर्णन के अन्तर्गत कुरुक्षेत्र महिमा की तुलना श्री कृष्ण दर्शन से कुछ इस प्रकार की गई हैः-

गंगाद्वारे कुरुक्षेत्रे स्नानदानेन यत्फलम् । दृष्टवा नदो व मेत्कृष्णं तत्फलं दक्षिणामुखम् ।।

ब्रह्मपु० 32/87

अर्थात् गंगा द्वार में कुक्षेत्र में स्नान करने तथा दान देने से जो फल मिलता है वही पुण्य फल दक्षिणांभमुख श्री कृष्ण के दर्शन से प्राप्त होते हैं।

ग्रस्ते सूर्य कुरुक्षेत्रे स्नान दानेन यत्फलम्। दृष्टवा नरो नमेत्कृष्ण तत्फलं दक्षिणामुखम् ।।

ब्रह्मपु० 32/92

कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के अवसर पर स्नान एवं दान का जो फल मिलता है ठीक वैसा ही 'कल दक्षिणाभिमुख श्री कृष्ण के अवलोकन से होता है।

रार्वतीर्थ माहात्म्य वर्णन के अन्र्तगत कुरुक्षेत्र, प्रयाग एवं पुष्कर को महान तीर्थ बतलाया गया है-

इन्द्रियावि वशे कृत्वा यत्र यत्र वसे० नरः । तत्र तन्त्र कुरुक्षेत्र प्रयांग पुष्कर तथा ।।

ब्रह्म 17/6

49

नारद पुराण में वर्णित कुरुक्षेत्र

मथुरा द्वारका विप्रा नर नारायणयम् । कुरुक्षेत्र नर्मदा च क्षेत्रं श्री पुरुषोतम ।। न० पु० नारद सनक संवाद । 62

अर्थात मथुरा, द्वारिका, बदरिकाश्रम्, कुरुक्षेत्र, नर्मदाक्षेत्र तथा श्री पुरुषोतम क्षेत्र आदि परम पवित्र स्थल हैं। इन सब तीथों पर उत्तम पुराणों का पठन एवं श्रवण किया जाता है। इन तीर्थों पर शास्त्र श्रवण एवं पठन मात्र से ही घोर संसार रुपी सागर से प्राणी मुक्त हो आया करता है।

जिस प्रकार अन्य समस्त व्रतों में एकादशी का व्रत, सब सरिताओं में भागीरथी श्री गंगा जी, सम्पूर्ण वनों में वृन्दावन, समस्त क्षेत्रों में कुरुक्षेत्र सब पावन पुरियों में कांशीपुरी, सम्पूर्ण अन्य तीथों में मथुरा एवं पवित्र सरोवरों में पुष्कर अत्याधिक श्रेष्ठ है- उसी प्रकार नारद पुराण अन्य समस्त पुराणों में श्रेष्ठ हैः-

एकादशी व्रतानां च सरिता जाहनवी यथा वृदावनपरण्यां क्षेत्राणां कौरव यथा ।। ना० सनक संवाद । 64

गंगा माहात्म्य वर्णन के अन्तर्गत भी उल्लेख मिलता हैः-

कृते तु सर्व तीर्थानि नेत्रायां पुष्कर परं । द्वापरे तु कुरुक्षेत्रे कलौ गंगा विशिष्यते ।।

सतयुग में सभी तीर्थ फलदायक होते हैं, त्रेता में पुष्कर, द्वापर में कुरुक्षेत्र एवं कलियुग में गंगा श्रेष्ठ हैं इस प्रकार न केवल कलियुग में अपितु द्वापर में भी कुरुक्षेत्र को यज्ञभूमि पुण्यभूमि माना गया है। क्यूंकि आदि काल से इसे तपोभूमि कहा गया है। नेमिपारण्य, कुरुक्षेत्र, नर्मदा तथा पुष्कर तीर्थ में स्नान, स्पर्श एवं सेवन करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। गंगा जी में चाहे जहां स्नान किया जाए वह कुरुक्षेत्र के समान पुण्यदायक होता है। ऐसी धारणा अब भी प्रचलित है कि कुरुक्षेत्र में मृतप्राणी के फूल बाहर नहीं जाते ।

नारदपुराण में फलगू तीर्थ का भी वर्णन इस प्रकार मिलता हैः-

फल्गुतीर्थे विष्णु जले करोमि स्नानमश्रतै । पितृणां विष्णु लोकाय मुक्ति युक्ति प्रसिद्ध ये ।।'

50

जिस फल्गु के जल रुप में स्वयं भगवान विष्णु उपस्थित हों उसमें मैं स्नान करता हूँ जिस से पितरों को विष्णु लोक की और मुझे सांसरिक भोगों से मुक्ति प्राप्त हो। ऐसा उल्लेख मिलता है कि फल्गूतीर्थ में स्नान के बाद शिवंलिंग रुप में स्थित ब्रह्मा जी को नमस्कार करना चाहिए ।

नमः शिवाय देवाय ईशान पुरुषाय च । अघोर वाम देवाय सधोजाताय शम्यवै ।।

अर्थात ईशान तत्पुरुष अधोर, वामदेव तथा सयोजात इन पांच नामों से प्रसिद्ध भगवान शिव को नमस्कार है। फलगु तीर्थ में स्नान करके गदाधर भगवान का दर्शन करके नमस्कार करने वाला मनुष्य अपने पितरों के साथ बैकुण्ठ में जाता है। भगवान गदाधर के दर्शन का मन्त्र :-

ॐ नमों वासुदेवाय नमः सकर्षणाय च । प्रधुभ्नाया निरुद्वाय श्री धराय च विष्णवे ।।

इसी प्रकार ब्रह्म सरोवर में स्नान एवं उसके साथ प्रकट होने वाले आम्र वृक्ष को सींचने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है :-

आम्र ब्रहमसरोद भूतं सर्वदेव मयं विभुम् । विष्णु रुपं प्रसित्यामि पितृणा येव मुक्तये ।।

कुरुक्षेत्र तीर्थ के समान भूलोक में कोई पवित्र भूमि नहीं है। इस चालीस कोस भूमि की बारह बारयात्रा कर लेने से पुनर्जन्म नहीं होता।

कुरुक्षेत्रं सम तीर्थ न भूतं न भविष्यति । तत्र द्वादश यात्रास्तु कृत्वा भूययो न, जन्मभाक ।।

नारद पुराण में वर्णित विभिन्न तीर्थों का विवेचन "कुरुक्षेत्र के अन्य तीर्थ" अध्याय के अन्तर्गत किया गया है।

80390

51
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

भविष्यपुराण में वर्णित करुक्षेत्र

भविष्यपुराण के प्रतिसर्गपर्व तृतीय खण्ड में 32 अध्याय है इसे अग्निखण्ड़ भी कहा जाता है। इसमें भविष्यकाल के वैवस्वत मन्वन्तर के 28 वे द्वापर में कुरुक्षेत्र में हुए कौरव पाण्डव का संक्षिपत रुप युद्ध वर्णन किया गया है -

भविष्यारण्ये महाकल्पे प्राप्ते वैवस्वते उन्तरे। अष्टाविशं ट्वा परान्ते कुरुक्षेत्र हरणों भवत् ।।

भविष्य । 3/3/14

युद्ध के बाद 18 वें दिन भगवान कृष्ण ने योगेश्वर शिव की स्तुति की। साथ ही गाथ पाण्डवों की रक्षा के लिए प्रार्थना की। भगवान शंकर नदी पर रावार होकर रक्षा हेतु पाण्डवों के शिविर में त्रिशूल लेकर खड़े हो गये। आधी रात में वहां अश्वत्थामा आया । भगवान शंकर को रक्षक के रुप में देखकर चिन्तित हो गया। फिर संभल कर भगवान कृष्ण की आराधना हेतु नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम किया। उनकी स्तुति की। आसुतोप इतने में ही प्रसन्न हो गये एवं उसे वरदान रूप में एक दिव्य तलवार दे बैठे। वह उस तलवार से धृष्टयुम्न आदि महारथियों की हत्या कर अपने इष्ट स्थान को चला गया ।

पाण्डवों को हस्तिनापुर में जब इस वृन्तात का पता चला तो वे सब क्रोध में आपे से गहर हो गए। भीम तो क्रोध वश मूच्छित ही हो गये। होश आने पर सभी हथियार लेकर शिवजी की ओर भागे और प्रहार करने लगेः किन्तु वे सभी अस्त्र भगवान शंकर के शरीर में विलीन हो गये। इस प्रकार शंकर जी ने उन्हें कलियुग में पुनः जन्म लेने का शाप दिया। उसी अभिशाप स्वरुप वे आल्हा ऊदल के रुप में वत्सराज के घर उत्पन्न हुए। इनमें युधिष्ठर बलखानि हुए जो शिरीपपुर के निवासी थे। आल्हा ये इस का नाम मलखान है भीम ने जो बहुत दुर्वचन कहे थे, वीरणनाम से जन्म लिए। अर्जुन परिभल के पुत्र ब्रह्मानन्द हुए एवं नकुल लक्ष्मण तथा सहदेव देवसिंह के नाम से उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र के अंश से पृथ्वीराज हुए जो अजमेर के शासक थे कर्ण-तारक के रुप में उत्पन्न हुए ।

शंकर जी के शाप को सुनकर भगवान कृष्ण ने हंसकर कहा कि पाण्डव मेरे भक्त हैं अतः मैं भी इन की रक्षा हेतु अवतार धारण करुगा। मेरा नाम उस समय आहलाद होगा । आल्हा के रूप में मैं अग्निवंशीय राजाओं की हत्या कर कलियुग को सीमित रखूंगा ।

विक्रमादित्य के शासन काल के अन्तर्गत भारत में 18 राप्टों का विभाजन दिखाई देता है। उस समय इन राष्टें का विभाजन इस प्रकार था पांचाल, कुरुक्षेत्र, इन्द्रप्रस्थ, कपिल, अन्तर्वेदी, वृजवीथी, मरुदेश अथवा मरुधन्व, गुर्जर अथवा सौराष्ट् आनर्त, महाराष्ट्र, द्राविड़, कलिंग, आवन्त्य उड्डुपगा, अड्डुपी (यह तमिल नाडू के मंगलूर जिले में है)

52
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

बंगगोड (बंगलादेश) मगध, महाकौशल (मध्यप्रदेश) अजमेर (राजस्थान) एवं रोम (वर्तमानरोम) आते हैं।

इन्द्रप्रस्थं च पान्चालं कुरुक्षेत्रं च कापिलम अन्तर्वेदी ब्रजर्व वाजमेरं मरुधन्व च । गोर्जर च महाराष्ट् द्राविड़ च कालिंगम् आवत्यर्य चौग्रुप बंग गौड़ मागधभेवच कौसव्यं च तथा रोमं तेषां राजा पृथक पृथक

भविष्य 13/3/2

भविव्यपुराण का यह भी कथन सत्य है कि 18 राज्यों में अलग अलग 18 भापायें थी। इन भाषाओं में हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, महाराष्टी मराठी ताभिल, कन्नड़ उडिया, बंगला तैलगु आदि प्रमुख हैं।

भविष्यपुराण के 125 वें अध्याय के अन्तर्गत सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण के स्नान का विधान है। इसमें भी राप्तमृतिका, दंसोपधि एवं पंचगण्ययुक्त तीर्थ जल मिश्रित घड़ों में चन्दन, कुकुम, इतर, खस आदि मिलाकर स्नान करना चाहिए। और इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, वरुण, शिव विष्णु आदि के स्तोत्र को पढ़ना चाहिए। इनके पढ़ने से एवं स्नानादि से गभी पाप, ताप, अनिष्ट ग्रहपीड़ा दूर हो जाती है। ऋग, बर्जु एवं सामवेद के मन्त्रों से २नान कर, शुक्ल वस्त्र चंदन पुप्पमाला आदि धारण कर लेना, देवता एवं ब्राहमण को भोजन दान इत्यादि से प्रसन्न करना चाहिये। सूर्यग्रहण में सूर्य का नाम एवं चंद्रग्रहण में चन्द्र के नाम का उल्लेख कर मंत्र पाठ करना चाहिए ।

इस प्रकार का आचरण करने पर मनुप्य को किसी प्रकार का गृह क्लेश, धन जन की हानि, आदि व्याधि की पीड़ा नहीं होती। उसे गुख सिद्धि एवं मुक्ति की भी प्राप्ति हो जाती है।

इग प्रकार विभिन्न पुराणों में पुण्यभूमि कुरुक्षेत्र की महिमा का यशोगान समृद्ध रुप में हुआ है। जिस प्रकार भगवान कृष्ण ने गीता के दरावें अध्याय में प्रत्येक सर्वश्रेष्ठ वस्तु को ईश्वरीय विभूति बतलाया है उसी प्रकार पुराणों में कुरुक्षेत्र को समस्त तीर्थ क्षेत्रों में वरिष्ठ कहा गया है। सरोवरों में मानसरोवर एवं धर्मनियमों में सत्य पालन को सर्वोपरि बतलाया गया है।

ब्रह्माडंपुराण में भी कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे दीर्घसन्त्रस्तु ईजिरे नधास्तीरे हपदवत्याः पुण्यायाः शुचिरोधसः

53
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

वायु पुराण के प्रारम्भ में भी कहा गया है कि असीम कृष्ण के राज्य में कुरुक्षेत्र में शौनकादि का यज्ञ हो रहा था। उसमें मुनि लोमहर्षण ने यह पुराण सुनाया। आगे चलकर शौनक के किसी वंशज ने अपनी कुल, परम्परा के अनुससार कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र में "सत्र" नाम का महायज्ञ आरम्भ किया। इस प्रकार महाभारत काल से ही कुरुक्षेत्र तपोभूमि एवं धर्मभूमि मानी गई है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।

असीम कृष्णे विक्रान्ते राज्येऽनुपमत्विषि प्रशसती मां धर्मेण भूमि भूमिष सप्तये

वायुपुराण 10/11

नारदपुराण में भी उल्लेख मिलता है कि कुरुक्षेत्र भूमि के तीथों के समान शुभ एवं अभ्युदय तीर्थ भूतल पर नहीं है जहां मृत्यु होने पर सदाचारी वा दुराचारी सभी स्त्री पुरुष मुक्त हो जाते हैं । तभी जावालआदि श्रुति स्मृतियों में इस भूमि को मोक्ष भूमि लिखा है-

कुरुक्षेत्रसमं पुण्यं नान्यद भुविशुभावहम्। साचारी वाप्यनाचारी यत्र मुक्ति भवाप्नुयात् ।।

54

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

सूर्यग्रहण और कुरुक्षेत्र

भारत समृद्ध परम्पराओं का देश है। हमारे देश में जहां अत्याधिक भिन्नताएं हैं वहां इन भिन्नताओं को एकता में पिरोने के प्रयास भी हुए हैं। भारत के प्रमुख तीर्थ स्थल एवं विभिन्न मेले, अनेकता में एकता ढूंढने का ही प्रयास करते रहे हैं। अत्यन्त प्राचीन काल से ही इन मेलों की परम्परा रही है। हमारे ऋषि मुनियों ने भारत की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ही विशेष पर्वो पर मेलों का आयोजन करने की परम्परा का सूत्रपात किया । परिणामस्वरुप आज भी मेलों में अपार जनसमुदाय असीम उत्साह एवं उमंग तथा श्रद्धा के साथ उमड़ता दिखाई पड़ता है। हमारी विभिन्न भाषाएँ, विभिन्न धार्मिक रीतिरिवाज हैं, विभिन्न संस्कृतियां हैं, विभिन्न आकृतियो है, विभिन्न वेशभूषा है, किन्तु हमारी आस्था एक है। हमारी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत एक है। सनातन धर्म अनादि है, सत्य है अडिग एवं अचल है। इसी धार्मिक एकता के कारण काशमीर से कन्याकुमारी तक जहां भी हमारे धार्मिक मेलों का आयोजन होता है, वहां करोड़ों की संख्या में श्रद्धालू जन अनेक दिनों तक हजारों मील दूर, अपने घरों से दूर, इष्ट मित्रों सहित धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। महापुरुषों की सत्संगति से उनके विचारों को हृदयसात करते हैं एवं तीर्थ स्नान, ध्यान, दान इत्यादि शुभ कर्मों से अपने जीवन में पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

सूर्यग्रहण क्यों और कैसे लगता है और इसका प्राणियों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसके सम्बन्ध में विचार करना है। सूर्यग्रहण लगने के सम्बन्ध में विभिन्न विद्धानों तथा वैज्ञानिकों के विभिन्न मत हैं:-

वैज्ञानिक मतः-

सूर्य की कक्षा के नीचे चन्द्र की कक्षा है, अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र एक ही राशि में रहते हैं। मेघ के सूर्य किरण को आच्छादित करने से जैसे सूर्य नहीं दीख पड़ता वैसे चन्द्र द्वारा आच्छादित सूर्य भी पृथ्वीवासियों से छिपा रहता है।

चन्दमण्डल द्वारा सूर्य के ऐसे ही आच्छादन का नाम सूर्यग्रहण है। सूर्य की गति से चन्द्र की गति अधिक होती है। चन्द्र पश्चिम दिशा से जाकर के क्रमशः सूर्य के निकट पहुंच कर उसको ढॉप लेता है। इसी से सूर्यग्रहण पश्चिम दिशा को स्पर्श होता है। चन्द्र की गति अधिक होने से चन्द्रमण्डल शीघ्र ही उसको अतिक्रमण करके पूर्व की ओर सरक जाता है अतः सूर्य ग्रहण में पूर्व दिशा में ही मोक्ष होता है।

55

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

पौराणिक मतः -

मद्भागवत पुराण में समुद्र मंथन का उल्लेख आता है इसी प्रसंग में हमें सूर्यग्रहण लगने के कारण का भी वर्णन मिलता है। इसमें वर्णित कथा के अनुसार जब देवताओं द्वारा समुद्र मंथन हुआ तो समुद्र से अन्य वस्तुओं के साथ साथ अमृत कलश भी निकला जिसे देवताओं ने आपस में बांटने का निर्णय लिया। भगवान विष्णु ने मोहिनी रुप धारण करके देवत। ओ में अमृत बांट दिया। राहू नामक असुर वेप बदल कर देवताओं की पंक्ति में जा बैठे और अमृतपान कर लिया। सूर्य और चन्द्रमा ने राहू को पहचान लिया और उन्होंने यह बात भगवान विष्णु को बतला दी। इस पर भगवान विष्णु ने राहू का सिर सुदर्शन चक्र से काट दिया अमृत पीने के कारण यह दो भागों में बट गया तथा राहू व केतु के नाम से अमरत्व को प्राप्त हुआ। इस प्रकार राहू सूर्य व चन्द्र को प्रस्ता है तो उन्हें ग्रहण लग जाता है। राहू बिना चड़ के होने से सूर्य चन्द्र के मुख में प्रवेश कर दूसरी ओर निकल जाता है।

कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण का महत्व :-

अब यह प्रश्न स्वाभाविक ही है कि कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण का इतना महत्व क्यूं है जब कि ग्रहण तो भारतवर्ष के अन्य भागों में भी दिखाई पड़ता है। कुरुक्षेत्र में ऐसा कौन सा दिव्य आकर्पण है जिसे लेकर द्वापर, त्रेता व कलियुग में इस अवसर पर लाखों श्रद्धालू वशीभूत होकर कुरुक्षेत्र में खिंचे चले आते हैं। गंगा जमुना जैसी पवित्र नदियों में भी स्नान किया जा सकता है किन्तु फिर भी अनादिकालसे न केवल ऋपि, मुनि विद्वान एवं संत महात्मा ही इस अवसर पर कुरुक्षेत्र आते हैं वरन पुराणों के अनुसार तो स्वयं ब्रहमा, विप्णु श्रीरामचन्द्र जी भी इस पुण्य भूमि पर पधारे हैं एवं सूर्यग्रहण के अवसर पर यहां नानाविधि से दान, यश एवं स्नान द्वारा सुशोभित हुए हैं।

प्रायः सभी विद्वानों ने सूर्यग्रहण का पर्व कुरुक्षेत्र में अति उतम माना है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद् गीता में इसे धर्मक्षेत्र की संज्ञा दी है। बेटमन्त्रों का उच्चारण सर्व प्रथम यहीं पर हुआ। पितामह ब्रह्मा ने, विश्वमित्र आदि ऋपियों ने यहां अनेकों यज्ञ किये । विश्वप्रसिद्ध ऋगवेद महाभारत एवं अन्य पुराणों की रचना यहीं पुण्यसलिला सरस्वती के पावन तट पर हुई। महाराज कुरु ने इसे पुण्यभूमि मान कर ही यहां बार बार कर्पण किया। न्याय एवं धर्म की भूमि मानकर ही भगवान ने महाभारत युद्ध यहीं लड़ने का निर्णय लिया ।

श्रीम‌द्भागवत पुराण के दशम राकन्ध में लिखा है कि महाभारत युद्ध से पूर्व सूर्यग्रहण के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण सभी यदुवंशियों राहित द्वारिका से कुरुक्षेत्र पधारे थे। इस रश्मय दूर-दूर के देश विदेश के सभी राजा महाराजा भी यहां एकत्रित हुए थे और सूर्यग्रहण के अवरार पर सभी ने स्नान पूजा पाठ तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए। मतस्यपुराण में उल्लेख आया है--

56

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

"कुरुक्षेत्रे महापुण्यं राहु ग्रस्त दिवाकरे"

सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र सेवन महापुण्यदायी है। सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र के पवित्र सरोवरों में जो स्नान करते हैं। उन्हें एक हजार अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

वायुपुराण में भी कहा गया है--

कुरुक्षेत्र में सूर्यपर्व के समय दी गई दान दक्षिणा उतरोतर तेरह दिन तक तेरह गुणा बढ़ती है। देवी पुराण में तीर्थ प्रशंसा प्रकरण के अन्तर्गत उल्लेख है कि गंगा, कनखल, प्रयाग पु' कर आदि सभी तीर्थ पवित्र पुण्यमय हैं और कुरुक्षेत्र में ब्रह्मसर सन्निहित आदि बहुत पांवत्र हैं।

है। ज्योतिष एवं गणित विधा के अनुसार भी सूर्य ग्रहण का महत्य कुरुक्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुका

पृथ्वी की तुलना मनुष्य के शरीर से की गई है।

है। हिमालय के शिखर को सिर, दाएं बाएं प्रदेशों को भुजाए एवं कुरुक्षेत्र को पृथ्वी माना गया

सिद्धान्त शिरोमणि में उल्लेख हुआ है कि जो रेखा लंका और उज्जियनी में से होकर कुरुक्षेत्र आदि देशों का स्पर्श करते हुए मेरु में जाकर मिलती है उसी भूमि को मध्यरे खा कहते हैं इसीलिए कुरुक्षेत्र पृथ्वी का प्राण (प्रधान) प्रदेश है।

चन्द्रमा का संबंध मन से तथा सूर्य का संबंध हृदय से होता है। प्राण शक्ति का स्त्रोत सूर्य है अतः सूर्य शक्ति से वांछित होने पर पृथ्वी को निरन्तर मिलने वाली प्राण शक्ति में बाधा उत्पन्न हो जाती है। अतः सूर्यग्रहण के अवसर पर सांसारिक कार्य, छोड़कर पूजा पाठ ईश्वर स्मरण में, धार्मिक कार्यों में प्रवृत रहना चाहिए ।

कहते हैं कि सूर्यग्रहण के अवसर पर जो प्राणी कुरुक्षेत्र आकर तप दान तीर्थ स्नान करता है उन्हें हृदयरोग का भय नहीं रहता और उन्हें ग्रहण दोप भ्री नहीं लगता ।

वामनपुराण के अनुसार सूर्यग्रहण होते समय स्नान सिनहित में, उपरान्त शुद्ध स्नान ब्रहमसर में और फिर स्नान स्थाणु तीर्थ में करना चाहिए यह क्रम पूर्ण फलप्रद है। श्रीमदभागवत के अनुसार बलराम जी इन सब तीथों में स्नान के बाद वद्रिकाश्रम गये थे। सिख गुरुओं में श्रीगुरुनानक देव जी एवं गुरुगोविंदसिंह जी भी यहां सूर्यग्रहण के अध्सर पर स्नान करने आये थे।

57

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

पवित्र कुरुक्षेत्र भूमि में किया हुआ इष्ट-वापी, कूप तड़ाग मंदिरादि निर्माण पूर्वतप होमदान आदि पुण्य कर्म अक्षय फल से देने वाले हैं। लिखित स्मृति में लिखा है यस्मृति में भी ऐसा ही उल्लेख आया हैः-

"इष्टेन लभते स्वर्ग पूर्व तो भो क्षमाप्नुयात्"

मन्दादो च युगादौ च ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः महापाते च संक्रान्तौ पुण्ये चाप्यन्यवासरे । स्नातस्तत्र कुरुक्षेत्रे फलानन्त्यम वाप्नुयात् ।।

अर्थात मन्ततर तथा युगादि में चन्द्र सूर्य ग्रहण में व्यातिपात योग में मेषादि संक्रातियों में अमावस्या पूर्णिमादि तिथियों में किया हुआ कुरुक्षेत्र भूमि में स्नान और दान अनन्त फलदायक होता है।

वायुपराण में भी लिखा है- सर्वस्थापित हि दानस्य संख्या वै प्रोतेम्य बुधै । कुरुक्षेत्रे चन्द्र सूर्यग्रहे संख्या न विधते । पथ्मपुराण एवं मतस्य पुराण में भी ऐसा लिखा है कि इन दोनों ग्रहणों के समय दान देना अत्यन्त पुण्यजनक है ।

यदयद ददाति यस्तन्त्र कुरुक्षेत्रे रविग्रहे । ततदेव सदाप्नोति नदो जन्मनि जन्मनि ।।

सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र भूमि के तीथों में जो दान पुण्य किया जाता है वह जन्म जन्मान्तर तक प्राप्त होता है। वायुपुराण में तो यहां तक कहा गया है कि कुरुक्षेत्र कृतं त्रयोदश गुणं भवेत अर्थात कुरुक्षेत्र भूमि में किया हुआ स्नान दान हवन भजन पूजन तेरह दिन तक तेरह गुणा बढ़ता है।

सूर्यग्रहण का स्वरुप स्कन्दपुराण में इस प्रकार किया गया है---

राहुरादित्य बिम्बस्यि

धास्तातिष्ठति भामिनि ।

अमृतार्थी विमानस्यो यावत्सस्त्रवते ऽमृतम् ।।

अर्थात अमृतापान की इच्छावाला राहु, सूर्य मण्डल के नीचे आता है। सूर्य को अंधकाराछत्र कर देता है, और तब तक ठहरता है (ग्रहण होता है) जब तक सूर्यमण्डल से अमृतस्त्रवण नहीं होता ।

सूर्यग्रहण sका वर्णन ऋगवेद में भी आया है:-

यं सूर्य स्वर्भानुः तमसा विध्यदासुरः

शतपथ ब्राहमण में भी "स्वर्भानुः सूर्य तमसा विण्यध" ऐसा आलेख मिलता है। निपेधः सूर्यग्रहण में तीन पहर पहले और चन्द्र ग्रहण में ढाई पहर पहले भोजनादि नहीं करना

58

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

चाहिए । यथाशक्ति स्नान दान हवनादि करें। शुद्ध स्नान कर यज्ञोपवीत भी बदलना चाहिए ।

मेला सूर्यग्रहण में राजकीय व्यवस्था एवं योगदानः -

मेला सूर्यग्रहण हरियाणा सरकार द्वारा प्रान्तीय मेला घोषित किया गया है। राज्य सरकार की ओर हसे जिला प्रशासन समुचित ढंग से इस महानपर्व पर व्यापक प्रबन्ध करता है ताकि आने वाले यात्रिगण सुविधापूर्वक स्नान कर सकें। मेलाप्रशासन द्वारा यात्रियों की सुख सुविधा हेतु व्यापक एवं समीचीन प्रबन्ध किए जाते हैं। पवित्र सरोवरों में स्वच्छ जल भर दिया जाता है। पवित्र सरोवरों के चारों ओर चार फूट की गहराई तक सीढ़िया बनी हुई है। जिसके बाद सुरक्षा अवरोध लगाये जाते हैं। क्यूंकि इन से आगे पानी की गहराई लगभग 15 हैं। गहरे पानी में नौकायें एवं मोटर नौकायें भी रखी जाती हैं। तैराक भी तैनात किये जाते हैं ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना की सूरत में डूबते हुओं को बचाया जा सके । यात्रियों के ठहराव, यातायात खान पान की भी उचित व्यवस्था की जाती है। रेल विभाग की ओर से विशेष गाड़ियों एवं नियमित गाड़ियों में भी अतिरिक्त सवारी डिब्बे लगाए जातें हैं । हरियाणा परिवहन की लगभग 1200 अतिरिक्त बसें यातायात के लिए उपलब्ध रहती हैं।

पूरे मेला क्षेत्र में पीने का स्वच्छ जल लगभग 2200 नलकूपों द्वारा मेला क्षेत्र में उपलब्ध कराया जाता है। खाने के पैकट उचित दामों पर लगभग तीन रुपये में उपलब्ध कराये जाते हैं। दैनिक प्रयोग की सभी वस्तुएं जैसे आटा दालें चीनी लकड़ी इत्यादि सस्ती दरों पर उपलब्ध कराई जाती है। सरकारी उपभोक्ता स्टोर भी बनाए जाते हैं। पचास किलोमीटर के क्षेत्र को 16 सैक्टरों में बांटा जाता है। प्रत्येक सैक्टर में प्रबन्ध के लिए एक एक उप पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की जाती है। जो कि प्रत्येक सैक्टर का प्रबन्ध देखते हैं। उनकी सहायता हेतु विभिन्न विभागों में अधिकारी एवं कर्मचारी भी तैनात किए जाते हैं ताकि प्रत्येक सैकर में कानून व्यवस्था सुनिश्चित एवं सन्तोषजनक हो सके। प्रत्येक सैक्टर में एक एक पुलिस पोस्ट एवं एक एक आकस्मिक चिकित्सा केन्द्र भी स्थापित किया जाता है। अग्निशमन हेतु भी एक केन्द्र बनाया जाता है जिसमें पर्याप्त व्यवस्था की जाती है और ये सारे विभाग ट्रैफिक कंट्रोल रूम से जुड़े रहते हैं।

असामाजिक एवं गुंडा तत्वों पर नजर रखने के लिए एवं ट्रैफिक कंट्रोल हेतु 12 क्लोज स्र्केट टी० वी० सैट भी लगाये जाते हैं। मेला क्षेत्र में वाहन नहीं जाते उन्हें बाहर ही रोके जाने की व्यवस्था रहती है। बिजली एवं रोश्नी का पर्याप्त प्रबन्ध होता है। बिजली चले जाने पर जैनरेटरों की भी व्यवस्था की जाती है।

मेलाप्रशासन को ट्रैफिक कंट्रोल के लिए, पुलिस के अतिरिक्त लगभग पचीस स्वयं गेवी संस्थायें भी सहयोग देती हैं जिनमें भारतीय सनातन धर्म महाबीर दल कुरुक्षेत्र (बजरंगभवन), पंजाब महावीर दल चण्डीगढ़, आलइंडिया सेवासमिति रोहतक इत्यादि प्रमुख हैं।

59
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

यात्रियों को हर प्रकार की सूचना देने एवं विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा विशेष प्रसारण हेतु नाभा हाऊस में एक प्रसारण केन्द्र भी खोला जाता है। यहां से गुमशुदा के बारे में सूचना दी जाती है। यात्रियों के लिए कुछ विशेष हिदायतें इस प्रकार से हैं:-

1- ताजा और साफ सुथरी बस्तुएं ही खायें ।

2- किसी प्रकार की चोट लगने अथवा बीमार होने पर अपने निकट के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र पर जाएं।

3- अपने रहने का स्थान साफ सुथरा रखें।

4- शौच तथा लघुशंका हेतु निर्धारित स्थानों पर ही जाएं।

5- केवल नल का पानी ही पियें ।

6- गन्दगी व कूड़ा कर्कट न फैलाएं ।

7- सरोवर के पवित्र जल को गंदा न करें ।

8- किसी भी अनजान व्यक्ति से प्रसाद या कोई अन्य वस्तु न लेवें ।

9- लावारिस पड़ी वस्तुओं जैसे टैचीकेस, टांजिस्टर पेन या खिलौना न छुए उगकी सूचना तुरन्त पुलिस अधिकारी को दें।

10. झूठी अफवाहें न फैलाएं।

11. दूषित और बासी भोजन न खाएं ।

12. सूर्यग्रहण के समय सूर्य को बिना काले चश्मे के न देखें ।

13. स्नान करते हुए समय का पूरा ध्यान रखें क्यूंकि आप के बाद और यात्रियों को भी रनान करना है।

14. माचिस की जलती तिली या बीड़ी सिगरेट के जलते हुए टुकड़े लापरवाही से न फेंके

किसी भी स्थान पर आग लगने की सूचना तुरन्त अग्नि शमन केन्द्र को दें। 15. किसी भी निकटतम सम्बंधी के गुम होने पर एस की सूचना तुरन्त सूचना प्रसारण केन्द्र को दें।

16. अपने बच्चों की जेब में पूरा पता लिखकर रखें।

17. ट्रैफिक नियमों का पालन करें। भीड़ के नियन्त्रण में तैनात कर्मचारियों एवं स्वयंसेवकों को पूर्ण सहयोग दें।

18- निर्भय रहें। जिला प्रशासन आप की यात्रा को सफल बनाने में पूरा सहयोग देगा ।

कुरुक्षेत्र में यात्रियों के ठहरने हेतु कई धर्मशालाएं हैं जिनमें लगभग 50, 000 व्यक्ति उत्राये जा सकते हैं:-

1. ताराचंद धर्मशाला थानेसर

2. जाट धर्मशाला

3. अग्रवाल धर्मशाला

4. काली कमली क्षेत्र

-12 कमरे,

-2(X) कमरे,

-18 कमरे,

-700 कमरे,

60
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

5. सैनी समाज धर्मशाला

-44 कमरे,

6. प्रजापति धर्मशाला

-50 कमरे,

7. श्रीकृष्ण धाम

-40 कमरे

8. श्रीजयराम आश्रम

-32 कमरे,

9. बिरला मन्दिर

-10 कमरे,

10. लक्ष्मीनारायाण मन्दिर

-20 कमरे,

11. भारतसेवाश्रमसंघ

-15 कमरे,

12. बावा गुदड़ डेरा

-32 कमरे,

13. गीताभवन

-50 कमरे,

14. तीर्थ सुधार ब्राहमण पंचायत

-15 कमरे,

15. श्री सनातन धर्म मन्दिर

-6 कमरे,

16. पाल गड़रिया धर्मशाला

-11 कमरे,

17. बंगाली धर्मशाला

-४ कमरे,

18. श्रीहनुमान मन्दिर थानेसर

-5 कमरे,

19. यात्रीनिवास

-32 कमरे,

इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा निर्मित विश्रामगृह इस प्रकार हैं:-

(I॥ पी० डब्लयू० डी०

2 कमरे,

(21 पंचायत भवन

4 कमरे,

(3) पिपली मोटल

४ कमरे,

(41 विश्वविधालय विश्रामगृह

4 कमरे,

(SI सैनिक विश्रामगृह

2 कमरे,

सूर्यग्रहण पर भगवान श्रीकृष्ण आगमनः -

द्वापर युग में भगवान कृष्ण सपरिवार कुरुक्षेत्र में स्नान हेतु सूर्यग्रहण के अवसर पर पधारे थे इराका प्रमाण हमें महाभारत में इस प्रकार मिलता है--

अर्थकदा द्वारवत्वां वसतो रामकृष्णयोः ।

सूर्यपरागः सुभहानासीत् कल्पक्षये यथा ।।

तं ज्ञात्वा मनुजा राजन् पुरक्तादेव सर्वतः ।

समन्तपंचक क्षेत्रं भयुः श्रेयो विधित्क्षमा ।।

विखत्रियां यही कुर्वन रामः शास्त्र भूतां वरः

नृपाणां कधिरोषेण मत्र चक्रे महाद्दान।।

61
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

शुकदेव जी कहते हैं, हे परीक्षित भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम तब द्वारिकापुरी में निवास कर रहे थे, तब एक बार सूर्य ग्रहण आया जैसा कि कल्पक्षय अथवा प्रलयकाल में आता है। मनुष्यों को ज्योतिष शास्त्रियों द्वारा इस ग्रहण का पता पहले से ही चल जाता है। इसलिए सय लोग अपने-अपने कल्याण हेतु, पुण्य उपार्जन के उद्देश्य से समन्तपंचक तीर्थ कुरुक्षेत्र में पहुंचे। (समन्तपंचक क्षेत्र वह है जहां शास्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुराम जी ने सारी पृथ्वी को क्षत्रियहीन करके राजाओं के रुधिरधारा से पांच कुण्ड बनाए थे।)

भगवान श्रीकृष्ण एवं बलराम जी अपनी पत्नियों के साथ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे मानों स्वर्ग के देवता ही यात्रा कर रहे हों। महाभाग्यशाली यदुवंशियों ने कुरुक्षेत्र में पहुंच कर एकाग्रचित होकर संयम पूर्वक स्नान किया, ग्रहण के उपलक्ष्य में निश्चित काल तक उपवास किया; ब्राहमणों को गोदान दिया। ऐसी गोओं का दान जिन्हें वस्त्रों की सुन्दर सुन्दर पुष्पमालायें एवं सोने की जंजीरें पहना दी गई थीं। इस प्रकार कुरुक्षेत्र में यदुवंशियों ने विधिपूर्वक स्नान किया एवं पुण्य लाभ प्राप्त किया।

सूर्यग्रहण पर श्रीराम चन्द्र जी का आगमनः -

महामुनि श्री बाल्मीकि कृत आनन्दरामायण के अन्तर्गत नवम सर्ग में प्रभुराम की सूर्यग्रहण के पुनीत पावन अवसर पर तीर्थ यात्रा का सुन्दर विवेचन किया गया है।

श्री राम दास जी कहते हैं कि एक बार श्रीरामचन्द्र जी सीता तथा समस्त श्रोताओं एवं उनकी पत्नियों के साथ पुष्पक विमान पर सवार होकर सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र आये। यहां समस्त देवता, कित्रर गन्धर्व, पत्रग, तथा कितने ही आश्रमों के ऋषि मुनि एवं हजारों राजा आए हुए थे। जब सूर्यग्रहण लगा तो उस समय सीता के साथ राम जी ने स्नान किया तथा हाथी घोड़े, उंट एवं रथ इत्यादि का दान दिया। इसके अनन्तर वहां आए हुए राजाओं ने अनेक प्रकार के उपहार ले लेकर प्रभुराम के दर्शन किये उत्और उनकी रानियां भी सीता जी को देखने के लिए उनके साथ आई। जब रानिंयां सीताजी के पास पहुंची तो उन्होंने बड़े आदर के साथ उन्हें उन की सखियों एवं मुनि पत्नियों के साथ एक सुन्दर आसन पर बिठाया। सीता जी द्वारा विधिवत पूजन कर लेने के बाद मुनिपत्नियों में से अगस्त्य पत्नी लोपमुद्रा सीता को प्रसत्र करती हुई कहने लगी है कमलनयनों वाली सीते। हे गजगमिनी। तुम धन्य हो। हमारे कानों को आनन्द देने वाले राम जी के किसी पौरुष का तो वर्णन करो।

लोपमुद्रा के ऐसा कहने पर सीता ने अपने विवाह से लेकर कुरुक्षेत्र की यात्रा तक का समस्त वृतान्त उन्हें कह सुनाया। लोपमुद्रा ने कहा- हे सीते। महाराज रामचन्द्र जी ने अब तक जो कुछ भी किया वह ठीक किया केवल एक बात में चूक गये और उन्होनें इतना क्लेश उठाया। मैं नहीं समझ पाती कि लंका पर चढ़ाई करते समय श्रीराम जी ने समुद्र में सेतु बनाने का कष्ट. क्यूं किया। उन्होनें अगस्त्य जी से क्यों नहीं कह दिया कि वे एक अज्जंलि भर कर क्षण भर

62
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

में सारे समुद्र को पी जाते। समुद्र सूख जाता और कपियों को लंका जाने में कठिनाई न होती। सेतु बांधने का इतना कष्ट उन्होंने क्यूंकर किया।

इस प्रकार लोपमुद्रा की बात सुनकर सगर्व वाणी में सीता जी बोली- हे पतिव्रते श्रीराम जी ने जो सेतु बांधा वह बहुत ही अच्छा किया। मैं तुम्हें उस का कारण बतलाती हूं, आप सावधान होकर सुनें। यहां आई हुई राजरानियां भी यह बात शान्त मन से सुनें। यदि राम अपने बाण से समुद्र को न सुखाते तो बहुत से जीवों प्राणियों की हत्या होने की आशंका थी। दूसरे यदि राम आकाशमार्ग से समुद्र को लांघ जाते तो रावण और बानर यह कैसे जानते कि राम मनुष्य हैं। तीसरे यदि बानर हनुमान जी की पीठ पर बैठ कर चले जाते तब राम का क्या पराक्रम दीख पड़ता। यदि हाथों से तैरकर उस पार चले जाते तब उन्हें यह ख्याल होता कि. ब्राहण के मूत्र को कैसे लाघूं। यदि आप के पति अगस्त्य से उसे पीने की प्रार्थना करते तो सोचते कि एक बार अगस्त्य इस समुद्र को पी चुके हैं एवं मूत्रमार्ग से निकल चुके हैं इसी से यह खारा है। पुन | इस खारे समुद्र को अगस्त्य जी कैसे पियेंगे। मान लिया जाए कि राम के कहने से अगस्त्य जी समुद्र को पी जाते तो संसार में उनका बड़ा अपयश होता कि राम ने अपना स्वार्थ हल करने हेतु एक ब्राहमण को मूत्र पिलाया। इन सभी बातों पर अच्छी बरह सोच विचार कर ही रामचन्द्र जी ने अपनी कीर्तिवृद्धि हेतु समुद्र पर सेतु बंधवाया था। जिस काम को न तब तक किसी ने किया था और न आगे कोई कर सकेगा उसे उन्होंने कर दिखाया। अब सब कोई परस्पर यहीं कहते हैं कि जिस राम ने समुद्र में शिला को तैरा दिया था, वे ही दशरथनन्दन श्री राम हैं।

इस प्रकार लोपमुद्रा सीता जी की बात सुनकर अत्यन्त लज्जित हुई और थोड़ी देर के लिए सभी नारी सभा में मौन बैठी रहीं। फिर हंस कर सीता जी ने लोपमुद्रा से कहा मैंने जो धृष्टता की है उसे आप क्षमा करे आप के स्नेह और प्रसंग आ जाने पर मैंने इस प्रकार राम का पौरुप वर्णन किया। मेरे पतिदेव राम में जो पराक्रम है, वह सब आप के स्वामी अगस्त्य जी के आर्शीवाद से है। इस प्रकार विनती करके सीता ने उन मुनि पत्नियों को विदा किया। तदन्तर राजरानियों द्वारा पूजित होकर सीता राम के पास चली गई। श्री राम जी भी देश देशान्तर से आए हुए राजाओं से कितने ही हाथी घोड़ो का उपहार नेकर सम्मानित हुए एवं प्रसत्रतापूर्वक सीता के साथ पुष्पक पर सवार होकर अयोध्या को चल पड़े।

सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में जो लोग स्नान करने आये थे वे भी श्री राम जी के दर्शन से प्रसन्न होकर अपने अपने घरों का वापस गये।

63
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

कुरुक्षेत्र की नदियां

वापन पुरान के अनुसार कुरुक्षेत्र में नौं नदियों का उल्लेख है जो कि इस प्रकार हैं:-

सरस्वती नदी पुण्या तथा वैतरणी नदी आपगा च महापुण्या गंगा मंदाकिनी नदी। मधुश्रव अम्लु नदी, कौशिकी पापनाशिनी। हबद्वती महापुण्या तथा हिरण्यवती नदी। वर्षा काल वहाः सर्वां वर्जयित्वा सरस्वतीम् ।

वामन सरो 13/8

अर्थात सरस्वती महान पुण्यवाली नदी है, दूसरी वैतरणी नदी है। महान पुण्यशाली आपगा नदी है। पुण्य मन्दाकिनी गंगा नदी है, मधुस्रया अभ्लु (वासुनदी) नदी और पापों का नाश करने वाली कौशिकी नदी है। महापुण्यमयी हपद्धती तथा हिरण्यवती नदी हैं। केवन सरस्वती को छोड़कर बाकी सब नदियां वर्षाकाल में बहती हैं। इन सबका जल वर्षा के रामय में भी परम पवित्र माना जाता है। तीर्थ प्रभाव से ये श्रेष्ठ नदियां परम पुण्यमयी हैं।

सरस्वती नदीः -

ऋगवेद के अनुसार सबसे प्रमुख नदी है। ऋगवेद में इस नदी का 40 बार उल्लेख हुआ है। अनेक सूत्रों में सरस्वती की दिव्य स्तुति मिलती है कोई भी पूजादि करने से पहले इस नदी का आह्वान किया जाता है।

गंग्डे० च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले ऽस्मिन सन्नींधकुरु ।।

ऋगवेद में रारस्वती को मात्रगुण एवं नदियों मे श्रेष्ठ कहा गया है। वामनपुराण में सरस्वती को विष्णु की जिह्वा कहा गया है--

"एवं स्तुत्ता तदा देवी विष्णोजिर्हवा सरस्वती"।

वामन 32/23

मनुस्मृति में लिखा है कि सरस्वती और हपद्वती दोनों देवनदियां हैं। इन दोनों का मध्यवर्ती प्रदेश ब्रहमावर्त कहलाता है तथा इस देश का जो प्रचलित आधार है वही सदा चार है। महाभारत के अनुसार-सभी सरिताओं में सरस्वती अति पवित्र और सब लोगों को शुभदेने वाली है इस नदी में स्नान करने से सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं।

64
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

ब्रहमवैवर्त पुराण में लिखा है- यह नदी अति पुण्यतया है, यदि कोई इस नदी में स्नान

करे तो उसके सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं। तथा वे बेकुण्ठ में विष्णु लोक में वास करते हैं चावुर्मास्य, पूर्णिमा, अक्षया, अमावस्या आदि शुभ तिथियों पर जो सरस्वती के जल में अवगाहन करते हैं वे सभी पापों से विमुक्त हो मुक्तिलाभ करते हैं। अग्नि में जिस प्रकार मभी वस्तु दग्ध हो जाती हैं उसी प्रकार इस सरस्वती नदी में सभी पाप तत्क्षण भस्मीभूत हो जाते हैं।

शतपथब्राहमण गन्ध में इसे वाक अन्न तथा सोम कहा गया है। महाभारत वन पर्व के अनुसार मलिनार ने सरस्वती के तट पर बारह वर्ष यज्ञ किया और सरस्वती ने इसे पति रुप में वरण किया। भगवान कृष्ण ने भी यहां 12 वर्ष यज्ञ किए। स्वयंभू प्रजापति ब्रहमा ने इसी पावन तट पर शिला यज्ञ की रचना की। ऋषि मुनियों ने भी इसी के पावनतट पर संगीतमयी वाणी से वेद ऋचायों का गायन किया अतः इसे ब्रह्मानदी सरस्वती भी कहा जाता है।

भारतीय विद्वानों के अनुसार सरस्वती विधा की अधिष्ठात्री देवी है। अतः भगवती देवी गंगा के समान पूजनीय है। संस्कृत साहित्य के अनुसार भी यह शब्द सर अर्थान सरोवर नथा वती-वाली शब्द से बना है जिस का अर्थ झीलों अथवा पोरवरों की नदी। यह लक्षण आज भी यहां मिलता है क्यूंकि यह नदी वर्ष के प्रारम्भ में आंशिक रूप से सूख जाती है। और स्पष्टत | छोटे छोटे पोरत्ररों में परिवर्तित हो जाती है। इस का सीधा सम्बन्ध वैदिककाल से आज तक कुरुक्षेत्र एवं हरियाणा प्रदेश से ही जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार देवभूमि उत्तरखण्ड में पर्वतराज हिमालय की गंगा मैय्या के किनारों पर ही समस्त भारत में आज के तपस्वी सिद्ध महापुरुप, संत महात्माओं के पावन आश्रय विधमान हैं ठीक इसी प्रकार वैदिक काल से सरस्वती के पावन तट पर इस देश के व्यास, वसिष्ठ, परशुराम, गौतम, दधीचि तथा अन्य महर्षियों के आश्रम विद्यमान हैं। महर्षि व्यास ने महाभारत अनुशासनपर्व में सरस्वती महिमा के अन्तर्गत कहा है:-

सरस्वती महापुण्या हरिनी तीर्थ नामिनी। समुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डवः ।।

सरस्वती अवतरण कथाः -

इस देवी का उत्पति विवरण ब्रहमवैवर्त पुराण में इस तरह कहा गया है--

परमात्मा के मुख से एक देवी का अविर्भाव हुआ। यह देवी शुक्लवर्णा, वीणधारिणी और करोड़ों चन्द्र की तरह शोभायुक्ता हैं। यह देवी श्रुति व शास्त्रों में श्रेष्ठा और पण्डितों की जननी है। रागाधिष्ठात्री देवी कवियों की इष्ट और शुद्ध तत्व स्वरुपा होने के कारण सरस्वती नाम से सुप्रसिद्ध हुई। सृष्टिकाल में प्रधान शक्ति ईश्वर की इच्छानुसार पांच भागों में विभक्त हुई। ये पांच शक्तियां थी- राधा, पध्मा, सावित्री दुर्गा और सरस्वती। इन पांच धाराओ में विभक्त शक्तियों में जो देवी वागधिष्ठात्री, और शास्त्रप्रदायिनी एवं कृष्णबण्ठोभ्दन है

65
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

उन का नाम सरस्वती है। श्री कृष्ण ने पहले इन्हीं देवी की पूजा की और उसी समय से इन देवी की पूजा प्रचलित हुई। इनकी उपासना करने से मूर्ख भी पंडित होता है। जब ये देवी कृष्ण के मुख से अविभूति हुई तब इन्होनें श्री कृष्ण की उपासना की। इस प्रकार श्री कृष्ण ने कहा- हे साध्वि। तुम सर्दुवशस्वरुप चतुर्भुज नारायण की कामना करों, उनको भजो और बैकुण्ठ में वास करो। माघ मास की शुक्लापंचमी के दिन विधारभ्म के समय सभी तुम्हारी पूजा करें। तुम्हारे प्रसन्न न होने से कोई भी विद्या लाभ प्राप्त नहीं करेगा। श्री कृष्ण की यह बात सुनकर सरस्वती ने चतुर्भुज नारायण का आश्रय लिया। उसी समय से माथ सुदी पंचमी तथा विद्यारम्भमें इनकी पूजा होती है।

इनकी पूजा आदि का विषय स्मृति में भी विस्तृत रूप से लिखा हुआ है। वेद में जैसे श्रीसूक्त द्वारा लक्ष्मी की पूजादि का निर्देश है वैसे ही सरस्वती का सूक्त भी देखा जाता है। लक्ष्मी पूजन करने के बाद भी सरस्वती पूजन का विधान है। एवं सरस्वती पूजा के दिन भी लक्ष्मी पूजन किया जाता है। इसके वाद देवताओं की पूजा करनी चहिए।

सरस्वती देवी के आठ अंग हैं- लक्ष्मी, मेघ, धरा, पुष्टि, गोरी, तुष्टि, प्रभा, धृति। अतएव इन सब अंगों की भी पूजा की जानी चाहिए। सरस्वती पूजा में बन्धुजीव, दोण पुष्प, दोनों पुष्प चढ़ाने चहिए।। वासक या अडाहुल का पुष्प भी उतम है।

तंत्रसार भी इस देवी की पूजा और मंत्रादि का विवरण है" वदवद बागवादिनि वहि वल्लाभा" सरस्वती का दक्षाक्षर मंत्र है। इस मंत्र द्वारा उनकी उपासना से सभी विद्या सिद्ध होती है। मेधा प्रज्ञा, प्रभा, विद्या, धृति, स्मृति, बुद्धि और त्रिधेश्वर्य में सब इनके पीठ देवता हैं।

स्कन्दपुराण में सरस्वती अवतरण की गाथा आई है। तदनुसार देवताओं ने बाडव से कहा कि वे पृथ्वी पर स्थित सारे जल को पी लेवे। इस पर बाडव ने विष्णु से कहा कि जल के समीप जाने हेतु वह कन्या के सिवाय किसी को भी साथ स्वीकार नहीं करेगा। विष्णु ने गंगा यमुना सरस्वती तथा सिन्धु आदि नदियों से प्रार्थना की किन्तु कोई भी अग्नि के तेज के भयवंश साथ जाने को तैयार न हुई। किन्तु जब विष्णु ने सरस्वती से प्रार्थना की तो सरस्वती ने अपने पिता ब्रहमा के कहने पर बाडव के साथ जाना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार नदी रुप को धारण कर सरस्वती हिमालय में प्लक्षवृक्ष से प्रकट हुई। वामनपुराण में आया है कि प्लक्षवृक्ष के मूल में इस को स्थित देखकर मार्केण्डेय ऋषि ने कुरुक्षेत्र में लाने के लिए

सरस्वती की स्तुति की। तत्पश्चात् यह नदी कुरुक्षेत्र में प्रविष्ट हुई। महाभारत में श्री बलराम जी द्वारा कुरुक्षेत्र यात्रा में वर्णित सरस्वती का चित्रण इस प्रकार है-

सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या सरस्वती लोक मूशावहाशुभा सरस्वती प्रप्यजनाः सुदुष्कृत सदा न शोचन्ति परत्र ने हन ।

महाभारत 54/39

66
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

विभिन्न पुराणों में एवं महाभारत में सरस्वती की स्तुति भित्र-भिन्न प्रकार से की गई है। महाभारत में उल्लेख है कि सरस्वती के तट पर वास करने के समान आनन्द अन्यत्र कहां । सरस्वती का सेवन कर स्वर्ग में गए मानव सदा सरस्वती का स्मरण करेंगे। नारदौयपुराण के अनुसार सरस्वती के तट पर जो कहीं भी निवास करें उनका ज्ञान ब्रहममय हो जाता है।

यत्रयो वै वसे द्वीर सरस्वत्यारु तटे स्थितः । तस्य ज्ञान ब्रहममंय भविष्यति न संशय ।। 64/33

कूर्मपुराण के अनुसार गंगा, सरस्वती तथा नर्मदा में किया गया स्नान एवं दान समान रुप से पुण्यशाली होता हैः- भविष्यपुराण के अनुसार कलियुग में दो हजार वर्ष बीतने पर म्लेच्छ वृद्धि को प्राप्त होंगे किन्तु सरस्वती के प्रभाव से ब्रहमावर्त म्लेच्छों से रहित रहेगा ।

ब्रहमावर्ते कथं म्लेच्छा न प्राप्ताः 116/1

स्कन्दपुराण के अनुसार अर्जुन प्राची सरस्वती का सेवन करके ही पापमुक्त हुआ था । महाभारत के युद्ध में कौरवों पर विजय प्राप्त करके अर्जुन एवं कृष्ण ने गृह प्रस्थान किया । किन्तु युधिष्ठर ने उनको घर के भीतर न आने दिया। कारण पूछने पर युधिष्ठर ने कहा कि वह बन्धु बांधवों के वध के कारण पापी है और उसे पापमुक्त होने के लिए प्राची सरस्वती का सेवन करना होगा जहां कि सभी पाप कर्म करने वाले व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं:-

तत्रगच्छ कुरुश्रेष्ठ यत्र प्राची सरस्वती

तत्र स्नानत्वा विमुच्यते यत्र प्राची सरस्वती

। 7/36

पेहोवा तीर्थ पर अनादिकाल से सरस्वती तट पर पितृश्राद्ध कर्म कुरुक्षेत्र में सरस्वती का जीता जागता प्रमाण है। प्रतिहार राज्य के भोज के शिलालेख से भी यहीं पता चलता है कि जो नदी पेहोवा से होकर जाती है वह प्राची सरस्वती है। सरस्वती जैसा पवित्र तीर्थ पृथ्वी पर न तो है न होगा। शिव ने सरस्वती को गंगा से भी श्रेष्ठ कहा है। प्राची सरस्वती का क्षेत्र सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जिनके चिता भस्म, अस्थिचर्म, अक्षजल केश इत्यादि वायु के द्वारा उडाए गए सरस्वती के जल में गिर जाते हैं वे व्यक्ति काल के वश में नहीं आते। यहां पर यज्ञ का सर्वाधिक महत्व है।

सुप्राचीन वैदिक युग में आर्यों ने जब धीरे-धीरे उत्तर पश्चिम भारत से आर्यवर्त भूमि में आकर भिन्न-भिन्न स्थान में उपनिवेश बसाया तब उनहोंने प्रधानतया एक, एक निर्मला सलिला स्वरप्रवाहा पुण्यप्रदा नदी के किनारे अपना अपना वास भवन बनाना स्थिर किया । ऋगवेद मन्त्र में सरस्वती को अन्नवती, उद्भवती एव द्युतिमति रुप में वर्णन किया गया। वह आर्य जाति की जीवन रक्षा का एक मात्र उपाय स्वरुप थी आर्य ऋषिगण हृदय की भक्ति पुष्पांजलि लेकर उनका स्तुतिगान कर रहे हैं। ऋगवेद के प्रथम मंडल से दशम मंडल

67
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

तक अनेक मन्त्रों में सरस्वती का उल्लेख आया है जिससे पता चलता है कि आर्य समाज ने बहुत दिन तक इसके किनारे वास किया ।

टूपद्धतीः -

वामनपुराणनुसार दृषद्वती तथा हिरण्यवती महान पुण्यमयी नदियां हैं ।

दृषद्धती महापुण्या तथा हिरण्यवती नदी । वर्षाकाल वहाः सर्वावर्जयित्वा सरस्वतीम् । 34/8

सरस्वती को छोड़कर अन्य नदियां केवल वर्षाकालीन नदियां हैं तथा इनका जल वर्षा के समय में भी परमपुण्यमयी कहा गया है। तीर्थ के प्रभाव से श्रेष्ठ नदियों परमपुण्यमयी हैं। यह नदी भी वैदिक आचायों एवं ऋषियों को अत्यन्त प्रिय थी। गंगा यमुना एवं सरस्वती के संगम के समान ऋषिवर दृषद्वती, आपगा एवं सरस्वती के संगम पर स्नान ध्यान किया करते थे। यह नदी प्राचीन काल में कुरुक्षेत्र की दक्षिणी सीमा का निर्माण करती है। महाभारत में भी इस नदी को कुरुक्षेत्र की दक्षिण में बहने वाली नदी कहा गया है। मनुस्मृति एवं वामनपुराण में भी इस नदी का उल्लेख हुआ है। इस के अनुसार दुपद्वती का नाम रत्नावली था । किन्तु कालान्तर में इसका नाम दृप्द्वती हो गया इसका उदगम स्त्रोत हिमालय के पार्श्व से बताया गया है ऐसा भी लिखा है कि श्रीकृष्ण ने इन्द्रप्रस्थ को जाते हुए मार्ग में इस नदी को पार किया था।

रत्नावली स्वर्णमयी गंगा च अमृतवाहिनी कलौ दृषद्धती नाम महापातक नाशिनी ।

वायु ० 59/27

इस नदी को अति पवित्र माना गया है। इसमें स्नान एवं तर्पण कर मनुष्य अग्निष्टोम तथा अविरात्र यज्ञों के फल को प्राप्त करता है। यह नदी पितरों को प्रिय हे तथा श्राद्ध करने पर करोड़ों गुणा फल देने वाली हैं।

दृष्द्वती नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ।

अग्निष्टोमति रात्राभ्यां फलं विदन्ति भारत ।।

वन) 8/73

ऋगवेद के एक मन्त्र अग्नि स्तुति 3/23/4 में उल्लेख आता है कि गौरुप धारिणी पृथ्वी के श्रेष्ठ स्थान में, दिनों के बीच में सुन्दर दिन हम आप का स्वागत करते हैं। वे उत्तम स्थान कौन से हैं-दृष्दती, मानुष तीर्थ, आपगा नदी और सरस्वती नदी। लगभग सभी पुराणों में इस नदी का वर्णन किसी न किसी रूप में मिलता है और सभी में इस का कुरुक्षेत्र एवं भारत में पाया जाना उल्लेखित है। वायुपुराण के अनुसार यह नदी हिमालय से निकलती है ।

68
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

ब्रह्म-पुराण एवं पदमपुराण के अनुसार यह नदी भारत वर्ष में है और हिमालय के चरण से निकलती है। मतस्य पुराण में यह नदी पितृप्रिय है और श्राद्ध से कई गुणा फल देने वाली है । वामनपुराण के अनुसार यह नदी कुरुजागंल की सीमा पर हे ब्रहमावर्त की सीमा एवं भारत में बहती है। यह नदी कुरुक्षेत्र में है एवं वर्षाकाल में बहती है। इस पर किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। लाट्यायन श्रोत सूत्र के अनुसार यह नदी यमुना के समीप है।

अपगा नदीः -

महाभारत एवं पुराणों में इस नदी का उल्लेख हुआ है सरस्वती एवं दूपदवती की भांति यह नदी भी कुरुक्षेत्र की अत्यत्न प्राचीन एवं प्रसिद्ध नदी है। परन्तु आज यह लुप्त प्राय हो गई है। आपगा के नाम से यह पुराना तीर्थ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के दक्षिण में है। संभवतः यहां पर इस नदी का जलप्रवाह रहा होगा। महाभारत एवं विभिन्न पुराणों मे इस नदी का वर्णन इस प्रकार हुआ है:-

पदमपुराण के अनुसार यह मानुषतीर्थ से एक कोस की दूरी पर है। वर्षाकालीन नदी है। अस्थिपुर के पास महेश्वर देव के समीप है। ब्रह्मपुराण में इस नदी को हिमालय से निकली हुई माना गया है। वामनपुराण इसे कुरुक्षेत्र की वर्षाकालीन प्रवाहित नदी मानता है। यह मानसतीर्थ के रामीप है। नारदपुराण में भी इसे महानदी एवं मानुपतीर्थ से एक कोस पर कुरुक्षेत्र में माना है। वायुपुराण के अनुसार इसे अत्यन्त पवित्र नदी माना है। ऋगवेद एवं वनपर्व महाभारत में भी इसे मानुपतीर्थ के पूर्व में कोस मात्र की दूरी पर माना गया है-

दृषद्वत्या मानुष आपयायां सरस्वत्यां

मानुपस्य तू पूवेण क्रोपमात्रे महीपते ।

आपगा नाम विख्याता नदी सिद्ध निवेषिता ।।

(ऋगवेद)

इस नदी में स्नान करने से तथा महेश्वर की पूजा करने से मनुध्य परम गति को प्राप्त करके अपने कुल का उद्धार करता है इस पर नदी पर श्राद्ध करने का अत्यन्त महत्व है। जो यहां पर श्राद्ध करते हैं उनकी सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। पितर एवं पितामह चाहते हैं कि उनके कुल में ऐसा पुत्र व पोत्र हो जो आपगा नदी के तट पर जाकर तिलों से तर्पण करें जिससे कि वे आने वाली सौ पीढ़ियों तक तृप्त हो जाएं।

शंसन्ति सर्वपितरः स्मरन्ति च पितामहाः ।

अस्मांक च कुले पुत्र पौत्रो वापि भविष्यति ।।

यो आपगा नदी गत्वा तिलै सतपर्यष्यिते ।

तेन तृप्ता भविष्यामों यावत्कत्वशतं गतम् ।।

वामन 15/4-5

69
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

आपगा नदी पर भाद्-पद मास में कृष्णपक्ष की चौदस तिथि को मध्यकाल में पिण्ड दान करने वाले मुक्ति को प्राप्त करते हैं:-

नमस्ये मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः चर्तुदश्यां च मध्याहने पिण्ड दो मुक्ति माप्नुयाद

वामन० । 5/6

माहभारत के अनुसार यह नदी अति पुण्यमयी है जो व्यक्ति इस नदी पर सामक के चावलों में घी मिलाकर ब्राहमणों को दान करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं एवं एक ब्राहमण को भोजन कराने से करोड़ों को भोजन कराने का फल मिलता है।

श्यामकं मोचने तत्र यः प्रयच्छति मानवः एकस्मिन योजिते विप्रेल कोटि भवति योजिता ।

वनपर्व 18/15/57

मधुस्त्रवाः -वामन पुराणों में कुरुक्षेत्र की पवित्र नदियों के अन्तर्गत मधुस्रवा का उल्लेख सरस्वती नदी के साथ ही मिलता है। इस नदी का अलग से वर्णन नहीं मिलता ।

"मधुस्त्रवा अम्लु नदी कौशिकी पाप नाशिनी"

इस प्रकार मधुस्रवा एवं कौशिकी नदी पापों का नाश करने वाली हैं। कनिहंम के अनुसार पेहोवा के समीप सरस्वती प्रदेश में मधुस्रवा नामक ताल ही इस नदी का द्योतक है।

गंगामदंकिनीः -

वामन पुराण में कुरुक्षेत्र की पवित्र नदियों में गंगा मंदाकिनी का उल्लेख मिलता है। प्रो0 भार्गव की मान्यता है कि यह नदी निगदू के पास से होकर बहती है। प्राचीन काल में इस का कौशिकी नदी के साथ दुसैन नामक स्थान पर संगम होता था। दुसैन में आज भी गंगा तीर्थ विद्यमान है किन्तु नदी का अस्तित्व नहीं मिलता ।

कौशिकीः -

ऋगवेद में इस नदी का नाम कौशिकी कुशिक ऋपि अथवा उसके पुत्र विश्वामित्र से सम्बंधित प्रतीत होता है। इस का उल्लेख हमें रामायण में भी मिलता है। रामायण के अनुसार सत्यवती कौशिकी विश्वामित्र की बहन थी तथा जमदाग्नि ऋषि की माता अपने पति की मृत्यु के बाद स्वर्ग चली गई। तत्पश्चात वह कौशिकी नदी हो गई जिसके तट पर विश्वामित्र

70
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

तप किया करते थे। महाभारत में भी इन तथ्यों का समर्थन मिलता है। विश्वामित्र तथा भरत दोनों का सम्बन्ध कौशिकी नदी से बताया गया है। विश्वामित्र ने इस नदी के तट पर तपस्या द्वारा कई सिद्धियां प्राप्त की। जो भी व्यक्ति इस नदी के तट पर एक मास भर रहता है उसको अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। सभी पापों को दूर करने वाला भरत का आश्रम भी इसी के तट पर है।

भरतस्याश्रम गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् । कौशिकी तत्र सेवेत महापातकनाशनीय ।।

वनपर्व 0 182/123

वामन पुराण में भी इस नदी को कुरुक्षेत्र से होकर बहने वाली नदी कहा गया है-हिरण्वतीः-

महाभारत उद्योगपर्व अन्तर्गत इस नदी का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-

"आसाद्य सरितं पुण्यां कुरुक्षेत्रे हिरण्वतीम्" ।

यह नदी कुरुक्षेत्र में पवित्र जल वाली एवं पुण्य नदी के रुप में विख्यात थी। वामनपुराण में इस नदी को विष्णु के रुद्र रूप से सम्बन्धित बतलाया गया है।

"रुद्रारण्यं च हिरण्वत्याम"

वामन) 63/32

वामन पुराण की कथानुसार इस नदी को यमुना व शिबि देश के मध्य में बहते बतलाया गया है। कथा के अनुसार विश्वकर्मा ऋषि के शाप से बन्दर बन गये। एक बार उस ने कन्दर नामक राक्षस को उसकी पुत्री देववती के साथ आते देखा तो उसे बलपूर्वक ले भागा । यमुना तट पर श्रीकंठ के आश्रम के पास छोड़ दिया और खुद यमुना में छलांग लगा दी। पुनः वह कर्पि शिवि देश में आया। यहां से वह देववती के साथ जाने के लिए शीघ्रता करने लगा । लौटते समय उसने अन्जन को उस की पुत्री के साथ देखा तो उसे देववती समझ बैठा। वह नदयन्ती बानर के भय से हिरण्यवती में गिर पड़ी। वामन पुराण में ऐसा उल्लेख आता हे कि जिससे प्रतीत होता है कि हिरणयवती और यमुना साथ साथ बहती थी।

सरस्वती पश्रयरुपा कालिन्दीन हिरण्यवती ।

वामन0 13/2011

इस प्रकार पुण्यतोया सरस्वती एवं अन्य नदियां प्राचीन काल से ही देवों, ऋषि एवं मुनियां द्वारा सेवित रही हैं। इनके तट पर पूजा अर्चना का विशेष महत्व रहा है। प्राचीन काल में न केवल इन के तट पर वेदों की रचनाएं हुई वरन् वर्तमान समय में भी धार्मिक पुरुष एवं सदाचारी

71
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

लोग इस पुण्य स्थान पर इसे धर्मक्षेत्र समझते हुए, धार्मिक ग्रन्थों की रचना करते रहे हैं। निर्मल साधु अखाड़े के प्रसिद्ध संत गुलाबसिंह ने सम्वत् 1837 में आध्यात्म रामायण, मुख्पन्थ, धूरस्मृत चन्द्र प्रवोध आदि ग्रन्थ लिखे। इसी प्रकार भाई सन्तोष सिंह जी ने सिख इतिहास, गुरुप्रताप सूरज एवं सूरजप्रकाश इत्यादि धार्मिक गन्थों की रचना कैथल नगर में भाई उदय सिंह जी के वास्ते लिखे थे। कुरुक्षेत्र विश्वाविद्यालय जो मूल रुप में संस्कृत विश्वविद्यालय के रूप में खोला गया था में भी धार्मिक, सांस्कृतिक शोध सतत् रुप में प्रवाहित हो रहा है। महर्षि की स्थापना वेद व्यास चेयर की स्थापना इसका आदर्शतम स्वरुप है।

72

Comments

Popular posts from this blog

आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार

आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है?

भगवान दत्तात्रेय को आदिगुरु माना जाता है