चौरासी लाख योनियों का शास्त्रीय रहस्य

चौरासी लाख योनियों का शास्त्रीय रहस्य

(वेद–पुराण आधारित एक समन्वित दार्शनिक अध्ययन)


1. प्रस्तावना : जीवन का अनन्त चक्र

भारतीय दर्शन में “जीव” को न तो केवल शरीर माना गया है और न ही केवल मन; बल्कि उसे एक शाश्वत चेतना माना गया है जो कर्मों के अनुसार विभिन्न देहों को धारण करती रहती है। इस निरन्तर आवागमन को संसार–चक्र कहा गया है।

इसी चक्र को समझाने के लिए हमारे शास्त्रों ने एक अत्यंत गहन सिद्धान्त दिया—
“चौरासी लाख योनियाँ” (८४,००,००० जीवन रूप)

यह केवल संख्या नहीं, बल्कि यह एक पूर्ण जीव-विकास मॉडल है, जिसमें चेतना का क्रमिक विस्तार, कर्मों का प्रभाव, और मोक्ष का मार्ग—सब एक साथ समाहित हैं।


2. शास्त्रीय प्रमाण : कहाँ-कहाँ मिलता है यह सिद्धान्त

(क) पुराणों में स्पष्ट उल्लेख

सबसे प्रत्यक्ष वर्णन पुराणों में मिलता है, विशेषतः पद्मपुराण में—

“चतुरशीतिलक्षाणि योनयः”
अर्थात—84 लाख योनियाँ मानी गई हैं।

इसमें विस्तृत वर्गीकरण भी मिलता है—

  • जलचर – 27 लाख
  • स्थावर (वनस्पति आदि) – 20 लाख
  • कृमि/कीट – 11 लाख
  • पक्षी – 10 लाख
  • पशु – 30 लाख
  • मनुष्य – 4 लाख

इसी प्रकार गरुड़पुराण में भी जीव के भटकाव और पुनर्जन्म का वर्णन करते हुए कहा गया—

“चौराशीतिलक्षेषु जीवाः”
अर्थात—जीव 84 लाख योनियों में भ्रमण करता है।


(ख) वेद और उपनिषदों में बीज रूप

वेदों में संख्या नहीं दी गई, लेकिन सिद्धान्त स्पष्ट है—

  • “बहुधा विजायते” — ब्रह्म अनेक रूपों में प्रकट होता है
  • “बहुधा जातम्” — सृष्टि में अनंत विविधता है

यह दर्शाता है कि जीवन एकरूप नहीं, बल्कि अनेक स्तरों में विकसित होता है।


(ग) मनुस्मृति और कर्म सिद्धान्त

“योन्योन्युपपन्नानि कर्मभिः”
अर्थ—जीव अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेता है।

यहाँ “योनि” का अर्थ है—जीवन की अवस्था या स्तर


(घ) भागवत और योग दर्शन

भागवत पुराण कहता है—

“देह नष्ट होता है, जीव नई योनि धारण करता है।”

पतंजलि योगसूत्र इसे और गहराई से बताता है—

“कर्म के अनुसार जाति (योनि), आयु और भोग निर्धारित होते हैं।”


3. ‘योनि’ का वास्तविक अर्थ

अधिकांश लोग “योनि” को केवल जन्म का माध्यम समझते हैं, लेकिन शास्त्रों में इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक है—

✔ चेतना का स्तर
✔ जीवन की अवस्था
✔ कर्म–अनुभव का क्षेत्र
✔ आत्मा का विकास चरण

अर्थात—
योनि = चेतना का एक विशेष रूप + कर्मफल का अनुभव क्षेत्र


4. 84 लाख योनियों का गूढ़ वर्गीकरण

1. स्थावर (20 लाख)

  • वृक्ष, पौधे, लता, पर्वत
  • चेतना सुप्त अवस्था में
  • केवल अनुभव, कोई स्वतंत्र कर्म नहीं

👉 यह “जीवन का प्रारम्भिक स्तर” है।


2. जलचर (27 लाख)

  • मछलियाँ, सूक्ष्म जीव, समुद्री जीवन
  • गति का प्रारम्भ
  • जीवन संघर्ष की शुरुआत

3. कृमि-कीट (11 लाख)

  • कीड़े, जीवाणु, सूक्ष्म प्राणी
  • अंध-प्रवृत्ति आधारित जीवन
  • तमोगुण प्रधान

4. पक्षी (10 लाख)

  • आकाश में गमन
  • स्वतंत्रता की भावना
  • दिशा-बोध और प्रवास

5. पशु (30 लाख)

  • भावनाएँ, स्मृति, संबंध
  • परिवार और समूह जीवन
  • कुछ में उच्च सत्व (जैसे गाय, हाथी)

6. मनुष्य (4 लाख)

यह सबसे महत्वपूर्ण है—

✔ बुद्धि
✔ विवेक
✔ धर्मज्ञान
✔ आत्म-चिन्तन

👉 यही एक योनि है जहाँ मोक्ष सम्भव है।


5. 84 संख्या का रहस्य

यह संख्या केवल संयोग नहीं है—

(1) 84 = 7 × 12

  • 7 = लोक, चक्र, चेतना स्तर
  • 12 = कालचक्र, राशियाँ

👉 यह “जीवन + समय” का संयुक्त मॉडल है।


(2) सांख्य दर्शन का संकेत

  • 24 तत्त्व × 3 गुण = 72
  • 72 + 12 (काल तत्व) = 84

👉 यह पूर्ण सृष्टि का गणितीय मॉडल है।


(3) योगिक दृष्टि

  • 72,000 नाड़ियों
  • 84 प्रमुख ऊर्जा बिंदु

👉 शरीर, चेतना और ब्रह्माण्ड—तीनों में समान संरचना


6. जीव की यात्रा : अधोगति और उन्नति

(क) अधोगति (नीचे की ओर)

अज्ञान → इच्छा → आसक्ति → कर्म → निम्न योनि

👉 जीव पशु, कीट या स्थावर में जा सकता है


(ख) उन्नति (ऊपर की ओर)

ज्ञान → वैराग्य → साधना → आत्मबोध

👉 जीव मानव से देवत्व या मोक्ष की ओर बढ़ता है


7. मनुष्य योनि क्यों सबसे श्रेष्ठ है?

शास्त्र बार-बार कहते हैं—

“मनुष्यत्वं दुर्लभम्”

क्यों?

✔ यहाँ कर्म बदल सकते हैं
✔ ज्ञान प्राप्त हो सकता है
✔ आत्मा को पहचाना जा सकता है
✔ मोक्ष संभव है

👉 बाकी योनियाँ “भोग” के लिए हैं
👉 मनुष्य “योग” के लिए है


8. क्या यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी समझ आता है?

आश्चर्य की बात है—

आधुनिक विज्ञान भी कहता है—

✔ जीवन धीरे-धीरे विकसित हुआ
✔ सूक्ष्म से जटिल जीव बने
✔ चेतना का विकास हुआ

👉 यही बात शास्त्र अलग भाषा में कहते हैं—

  • विज्ञान = जैविक विकास (Evolution)
  • शास्त्र = चेतना विकास (Spiritual Evolution)

9. अंतिम सत्य : 84 लाख योनियों का उद्देश्य

यह सिद्धान्त डराने के लिए नहीं है, बल्कि समझाने के लिए है—

✔ जीवन व्यर्थ नहीं है
✔ हर कर्म का फल है
✔ आत्मा निरन्तर सीख रही है
✔ मनुष्य जीवन एक अवसर है


10. उपसंहार

चौरासी लाख योनियों का सिद्धान्त भारतीय ज्ञान परम्परा की एक अद्भुत देन है। यह केवल धार्मिक कल्पना नहीं, बल्कि—

✔ दार्शनिक
✔ आध्यात्मिक
✔ वैज्ञानिक
✔ और नैतिक

—चारों स्तरों पर एक पूर्ण प्रणाली है।

मुख्य संदेश:

👉 हम केवल शरीर नहीं हैं, हम एक यात्रा हैं
👉 यह यात्रा 84 लाख अवस्थाओं से होकर गुजरती है
👉 और इसका अंतिम लक्ष्य है—

“मोक्ष” (स्वयं को जान लेना)

 यह प्रश्न बहुत गहरा है—और शास्त्र इसे सीधे-सीधे “कर्म → योनि” के सिद्धान्त से जोड़ते हैं।

पर एक बात शुरुआत में स्पष्ट समझ लें:

👉 कोई एक कर्म = एक निश्चित योनि ऐसा बिल्कुल गणितीय नियम नहीं है।
👉 बल्कि कर्मों का समूह (संस्कार + प्रवृत्ति + गुण) मिलकर अगली योनि तय करता है।

अब शास्त्रों (पुराण, स्मृति, योगदर्शन, भागवत आदि) के आधार पर सरल और स्पष्ट रूप में समझते हैं—


1. मूल सिद्धान्त (कर्म से योनि कैसे तय होती है?)

शास्त्र कहते हैं—

“सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः”
(योगसूत्र 2.13)

अर्थात—
✔ कर्म (बीज) के अनुसार
✔ “जाति” (योनि), आयु और भोग तय होते हैं

👉 तीन मुख्य आधार होते हैं:

(1) गुण (सत्व, रज, तम)

  • सत्व → उच्च योनि
  • रज → मानव/मध्य
  • तम → निम्न योनि

(2) प्रवृत्ति (मन की आदतें)

(3) संस्कार (बार-बार किए कर्म)


2. किस प्रकार के कर्म → कौन सी योनि

अब इसे शास्त्रीय भाव से वर्गीकृत करते हैं—


(A) अत्यधिक तामसिक कर्म → निम्न योनियाँ

1. हिंसा, क्रूरता, निर्दयता

  • बिना कारण जीवों को मारना
  • अत्याचार करना

👉 परिणाम:

  • पशु (विशेषतः हिंसक)
  • मांसभक्षी जीव (सिंह, भेड़िया आदि)

2. अज्ञान + जड़ता + आलस्य

  • कुछ न करना
  • केवल खाना, सोना, जीना

👉 परिणाम:

  • स्थावर (पेड़-पौधे)
  • निम्न जीवन

3. अत्यधिक वासना, अंधभोग

  • केवल इन्द्रिय सुख में डूबे रहना

👉 परिणाम:

  • कीट-पतंग
  • निम्न पशु योनि

4. धोखा, छल, कपट

  • दूसरों को ठगना
  • विश्वासघात

👉 परिणाम:

  • सर्प, लोमड़ी जैसे चालाक जीव

(B) रजसिक कर्म → मध्य योनियाँ (मानव/पशु)

1. अत्यधिक इच्छाएँ, लालच

  • धन, शक्ति, नाम की भूख

👉 परिणाम:

  • पुनः मानव जन्म
  • या भोग प्रधान पशु

2. अहंकार, क्रोध, प्रतिस्पर्धा

  • “मैं ही श्रेष्ठ हूँ” भावना

👉 परिणाम:

  • शक्तिशाली पशु (शेर, हाथी आदि)
  • या संघर्षपूर्ण मानव जीवन

3. मिश्रित कर्म (अच्छा + बुरा दोनों)

👉 परिणाम:

  • सामान्य मानव जीवन
  • जहाँ सुख-दुख दोनों मिलते हैं

(C) सात्त्विक कर्म → उच्च योनियाँ

1. दया, करुणा, सेवा

  • जीवों की रक्षा
  • निस्वार्थ सेवा

👉 परिणाम:

  • उच्च मानव जन्म
  • देवयोनि

2. सत्य, धर्म, संयम

  • सत्य बोलना
  • धर्म का पालन

👉 परिणाम:

  • ऋषि, ज्ञानी, संत

3. भक्ति और ईश्वर प्रेम

  • नाम जप, ध्यान
  • समर्पण

👉 परिणाम:

  • देव लोक
  • मोक्ष की ओर प्रगति

(D) विशेष कर्म → विशेष योनियाँ (शास्त्रीय संकेत)

शास्त्रों में कुछ प्रतीकात्मक उदाहरण भी मिलते हैं—

1. अत्यधिक लोभ

👉 चींटी, चूहा आदि

2. अत्यधिक कामवासना

👉 पक्षी या कीट

3. क्रोध और हिंसा

👉 सर्प, बिच्छू

4. कपट और धूर्तता

👉 लोमड़ी, बिल्ली

👉 ध्यान दें:
ये “प्रतीकात्मक संकेत” हैं, शाब्दिक नियम नहीं।


3. मनुष्य योनि में भी स्तर होते हैं

शास्त्र कहते हैं—4 लाख मानव प्रकार—

(1) अधोगामी मानव

  • केवल भोग में लगे

(2) सामान्य मानव

  • सुख-दुख में उलझे

(3) साधक

  • धर्म और साधना करने वाले

(4) ज्ञानी/योगी

  • मोक्ष के निकट

4. सबसे महत्वपूर्ण बात

👉 पशु योनि = भोग योनि
👉 मनुष्य योनि = कर्म + मोक्ष योनि

इसका अर्थ—

  • पशु बदल नहीं सकता
  • मनुष्य बदल सकता है

5. एक सरल सार (Short Mapping)

कर्म संभावित योनि
हिंसा, क्रूरता हिंसक पशु
आलस्य, जड़ता वृक्ष, स्थावर
वासना, अंधभोग कीट, निम्न जीव
छल, कपट सर्प/चालाक जीव
लालच, इच्छा मानव/पशु
दया, सेवा उच्च मानव/देव
भक्ति, ज्ञान देव/मोक्ष

6. अंतिम गूढ़ सत्य

शास्त्रों का मुख्य संदेश यह नहीं है कि—

👉 “तुम यह करोगे तो कुत्ता बनोगे”

बल्कि—

👉 तुम जैसा बनते हो, वैसी ही चेतना में जन्म लेते हो।


एक पंक्ति में सार:

👉 “कर्म शरीर नहीं बदलता, चेतना बदलता है—और चेतना ही अगली योनि बनाती है।”

मृत्यु के बाद आत्मा की पूरी यात्रा (Step-by-Step)

(वेद, उपनिषद, गीता, पुराण और योगदर्शन के आधार पर)


1. मृत्यु का क्षण – क्या होता है वास्तव में?

शास्त्र कहते हैं—मृत्यु अचानक नहीं होती, यह एक प्रक्रिया (process) है।

क्रम:

  1. इन्द्रियाँ शिथिल होती हैं
  2. मन (चित्त) भीतर सिमटता है
  3. प्राण (जीवन ऊर्जा) शरीर से निकलने की तैयारी करता है
  4. आत्मा सूक्ष्म शरीर (मन + बुद्धि + संस्कार) के साथ बाहर निकलती है

👉 भगवद्गीता में कहा गया है—

“जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा नया शरीर लेती है।”


2. प्राण का शरीर से निकलना (Exit Point)

योग और उपनिषदों के अनुसार—

👉 आत्मा अलग-अलग मार्गों से निकल सकती है:

  • ऊपर (ब्रह्मरंध्र से) → उच्च लोक / मोक्ष मार्ग
  • आंख, नाक, मुख आदि से → सामान्य लोक
  • नीचे (निम्न द्वारों से) → निम्न योनियाँ

👉 यह निर्भर करता है— ✔ कर्म
✔ ध्यान की स्थिति
✔ अंतिम स्मरण


3. मृत्यु के तुरंत बाद (Preta अवस्था)

गरुड़ पुराण के अनुसार—

👉 मृत्यु के बाद आत्मा तुरंत नया जन्म नहीं लेती
👉 पहले वह “प्रेत” अवस्था में रहती है

इस अवस्था में:

  • आत्मा अपने शरीर और परिवार को देख सकती है
  • उसे मोह, दुख, भ्रम होता है
  • उसे समझ नहीं आता कि वह मर चुकी है

👉 इसीलिए शास्त्रों में श्राद्ध, तर्पण आदि का महत्व बताया गया है


4. यमदूत / देवदूत का आगमन

अब दो स्थितियाँ होती हैं—

(A) पापी कर्म वाले

👉 यमदूत आते हैं
👉 आत्मा को ले जाते हैं

(B) पुण्यवान / भक्त

👉 देवदूत या दिव्य शक्तियाँ मार्गदर्शन करती हैं


5. यमलोक की यात्रा

गरुड़ पुराण के अनुसार—

👉 आत्मा एक सूक्ष्म मार्ग से यमलोक जाती है
👉 यह यात्रा प्रतीकात्मक रूप से कठिन और लंबी बताई गई है

इस दौरान:

  • आत्मा अपने कर्मों को याद करती है
  • उसे अपने किए का अनुभव होने लगता है

6. चित्रगुप्त द्वारा कर्म लेखा

👉 यहाँ आत्मा का पूरा “रिकॉर्ड” देखा जाता है

✔ हर विचार
✔ हर कर्म
✔ हर भावना

सबका हिसाब होता है


7. निर्णय (Judgement)

अब तीन मुख्य मार्ग बनते हैं—


(A) पाप अधिक → नरक अनुभव

👉 आत्मा को नरक जैसी स्थितियों में भेजा जाता है
👉 यह स्थायी नहीं होता

✔ उद्देश्य = दंड नहीं, शुद्धि (purification)


(B) पुण्य अधिक → स्वर्ग अनुभव

👉 आत्मा स्वर्ग जाती है
👉 सुख, आनंद, दिव्य अनुभव

👉 लेकिन यह भी अस्थायी है


(C) संतुलित कर्म → सीधा पुनर्जन्म

👉 न स्वर्ग, न नरक
👉 सीधे नया जन्म


8. नया शरीर चुनना (Rebirth Selection)

यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है—

👉 आत्मा खुद नहीं चुनती
👉 उसके कर्म + संस्कार + इच्छाएँ तय करते हैं

निर्धारण कैसे होता है?

✔ अधूरी इच्छाएँ
✔ पिछले जीवन की आदतें
✔ मानसिक प्रवृत्ति

👉 यही मिलकर तय करते हैं—

  • किस योनि में जन्म
  • किस परिवार में जन्म
  • कैसी परिस्थितियाँ

9. गर्भ में प्रवेश (Entry into Womb)

भागवत पुराण में इसका विस्तृत वर्णन है—

क्रम:

  1. आत्मा सूक्ष्म रूप में गर्भ में प्रवेश करती है
  2. गर्भ में उसे पिछले जन्म याद रहते हैं
  3. वह पश्चाताप भी करती है

👉 लेकिन—

जैसे ही जन्म होता है
👉 सब भूल जाती है (माया के कारण)


10. नया जीवन शुरू

अब—

✔ नया शरीर
✔ नई पहचान
✔ पुरानी स्मृति छिपी हुई

👉 लेकिन संस्कार (habits) अंदर रहते हैं

इसीलिए—

  • कोई जन्म से ही बुद्धिमान होता है
  • कोई क्रोधी
  • कोई आध्यात्मिक

11. पूरी यात्रा का सरल फ्लो

👉 मृत्यु

👉 प्राण निकलना

👉 प्रेत अवस्था

👉 यमलोक / देव मार्ग

👉 कर्म निर्णय

👉 स्वर्ग / नरक / पुनर्जन्म

👉 गर्भ प्रवेश

👉 नया जीवन


12. सबसे गहरा रहस्य

👉 मृत्यु अंत नहीं है
👉 यह सिर्फ “ट्रांजिशन” (transition) है

शास्त्र कहते हैं—

“न जायते म्रियते वा कदाचित्”
(आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है)


13. क्या इस चक्र से बचा जा सकता है?

👉 हाँ, यही मानव जीवन का उद्देश्य है

तीन मार्ग:

  1. ज्ञान – आत्मा को पहचानना
  2. भक्ति – ईश्वर में समर्पण
  3. कर्मयोग – निष्काम कर्म

👉 जब कर्म समाप्त (burn) हो जाते हैं
👉 तब आत्मा मुक्त हो जाती है


14. अंतिम सार (One Line Truth)

👉 “मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा अपनी यात्रा जारी रखती है—जब तक वह स्वयं को पहचान न ले।”



हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। कदाचित अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं।


सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। 


अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है। 


आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। 


अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। 


हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है। मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है।


अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। किन्तु दुर्भाग्य ये है कि लोग इस बात का महत्त्व समझते नहीं हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है।


एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है। इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की।


महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। 


महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।


एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो। इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके।


हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है। हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। 


कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है।


पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है:


जलज नवलक्षाणी, स्थावर लक्षविंशति।

कृमयो: रुद्रसंख्यकः, पक्षिणाम् दशलक्षणं।

त्रिंशलक्षाणी पशवः, चतुरलक्षाणी मानव।


अर्थात,

जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख)

वृक्ष - २०००००० (बीस लाख)

कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख)

पक्षी - १०००००० (दस लाख)

जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख)

मनुष्य - ४००००० (चार लाख)

इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है। 


जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार:

पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख)

जलकाय - ७००००० (सात लाख)

अग्निकाय - ७००००० (सात लाख)

वायुकाय - ७००००० (सात लाख)

वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख)

साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख)

द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)  

त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख)

पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख)

इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४०००००


अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था। 


जय ब्रह्मदेव।


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