यक्षों की उत्पत्ति
पुराणों के अनुसार, यक्षों की उत्पत्ति राक्षसों के साथ स्वयं परमपिता ब्रह्मा से हुई थी। जब ब्रह्मा जी ने जल की उत्पत्ति की तो उसकी रक्षा के लिए कुछ प्राणियों का निर्माण किया। उनमें से ही पहले थे यक्ष एवं राक्षस। जब ब्रह्मा जी ने पूछा कि इस जल की रक्षा कौन करेगा तो हेति और प्रहेति नामक दो प्राणियों ने उसकी रक्षा का प्रण लिया और इसीलिए वे राक्षस कहलाये। ब्रह्मा जी से ही उत्पन्न एक अन्य जाति ने उस जल के यक्षण, अर्थात पूजा और वृद्धि का प्रण लिया और वे यक्ष कहलाये। हालाँकि प्रथम यक्ष कौन था इसके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती। कुछ लोग कुबेर को प्रथम यक्ष मानते हैं किन्तु उनका जन्म बहुत बाद में हुआ। आगे चल कर इन्ही यक्षों की शक्तियां यक्षिणियां कहलाईं। आगे चल कर जब कुबेर यक्षों के राजा और दिग्पाल बनें तो ये सभी यक्षिणियां उनकी अनुचरी बनी। आज भी यक्षिणियों को कुबेर की द्वारपाल के रूप में चित्रित किया जाता है। ये भगवान रूद्र की सेविकाएं भी हैं। ऐसी मान्यता है कि यक्षिणियों का निवास पृथ्वी पर और पृथ्वी के निकट के लोकों में ही होता है और वे इस पृथ्वी की सभी सम्पदाओं की रक्षा करती ...