दान के बारे में

दान का उल्लेख एवं महत्ता

ऋग्वेद
विभिन्न दानों की स्तुति, गोदान की महत्ता

शतपथ ब्राह्मणः 
यज्ञ की आहुति देवताओं के लिए तो दान पुरोहितों के लिए।

महाभारतः 
दान की प्रशंसा

बृहदारण्यक उपनिषदः 
तीन विशेष कार्य दम, दान और दया

एतरेय ब्राह्मणः 
सुवर्ण, पशु एवं भूमि दान का उल्लेख

पुराणः 
दानों की स्तुति एवं विस्तृत प्रसंशा

• दान को कलियुग का धर्म कहा गया है।

दान के अर्थ एवं स्वरूप

• दान का अर्थ किसी दूसरे को अपनी वस्तु का स्वामी बनाना।

दान की परिभाषाः 
शास्त्र द्वारा उचित माने गए व्यक्ति के लिए शास्त्रानुमोदित विधि से प्रदत्ते धन को दान कहा जाता है।

• दान दिए जाने एवं स्वीकार करने की शास्त्रसंगत विधि एवं नियम है।

दान के नियम

1. दान दी जाने वस्तु स्वामी की विधिवत सम्पति होनी चाहिए।

2. दान स्वीकार करने वाला व्यक्ति शास्त्रों के अनुसार इच्छुक हो

3. दान विशिष्ट स्थल, विशिष्ट समयानुसार दिया जाए।

4. दान तभी सम्पन्न होगा जब दानी अपनी स्वीकृति से उसकी वस्त् दान करेगा एवं दान स्वीकृत करनेवाला उर्स वस्तु के स्वीकारै करेगा।

दान के तत्व

दान के 6 तत्व है।
1. दाता : दान देनेवाला
2. प्रतिग्रहिता : दान स्वीकार करने वाला
3. श्रद्धाः उचित प्रयोजन
4. देयः वस्तु
5. कालः समय
6. देशः क्षेत्र, स्थल


दान के पात्र एवं अपात्र

पात्र
1. विशेष लक्षण से युक्त व्यक्ति
2. पवित्र और गुणी व्यक्ति

अपात्र
1. शराबी ना हो, धूर्त, चोर, मल्ल, लोभी, दुष्ट, व्यसनी,
2. जुआरी ना हो।

देय के प्रकार
• देय : दान के पदार्थ एवं उपकरण

धर्मशास्त्र के अनुसार
1. उत्तमः अन्न, गाय, भूमि, सुवर्ण, अश्व, हाथी आदि।
2. मध्यम : विद्या, घर, घर का सामान
3. निकृष्टः जुतें, वाहन, छत्री, बर्तन, लकड़ी आदि।
4. अदेयः माता, पुत्र, राज्य, जो स्वतः का ना हो,
5. ब्राह्मण को शस्त्र और
6. अयोग्य को सुवर्ण और भूमि का दान अयोग्य है।

अस्वीकार योग्य दान

कुछ पदार्थ वर्जित

1. ब्राह्मणों को अस्त्र
2. विषैले पदार्थ
3. उन्मतकारी पदार्थों
4. मृगचर्य
5. तिल

मनु के अनुसारः 
अविद्वान ब्राह्मणों को
1. सोना
2. भूमि
3. अश्व
4. गाय
5. भोजन
6. वस्त्र आदि

दान की धार्मिक मान्यताएँ

1. उचित समयः द्वादशी, संक्रांति, अमावस्या, ग्रहण, पूर्णिमा आदि।
2. उचित स्थलः घर, मंदिर, गोशाला, तीर्थ आदि। (काशी, प्रयाग, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, गंगा-समुद्र तट पर)
3. वैदिक मंत्रो के कथन के साथ।

दान के प्रकार
1. नित्यः प्रतिदिन दिया जानेवाला दान
2. नैमित्तिकः विशिष्ट अवसर के समय (ग्रहण, संक्रांति)
3. काम्यः कामनापूर्ति के पश्च्यात (संतानप्राप्ति, विजय)
4. विमल (कूर्म पुराण): पवित्र दान, ब्रह्मज्ञानि को भगवत प्राप्ति के लिए दान

भगवतगीता के अनुसार
1. सात्विक दानः कर्तव्य समझकर दिया जानेवाला दान
2. राजस दानः किसी इच्छा पूर्ति के हेतु
3. तामस दानः घृणा तथा श्रद्धा के बिना दिया जानेवाला दान

दान के अदेय पदार्थ
1. जिन वस्तुओं पर अपना सत्व नही
2. जो अपनी वस्तु ना हो
3. माता-पिता, पुत्रों, अन्य व्यक्ति
4. राजा अपने राज्य का
5. संयुक्त सम्पत्ति
6. उधार ली गयी सामग्री
7. किसी का जमा किया हुआ धन
8. संतान के रहते अपनी पूर्ण सम्पत्ति
9. दूसरों को पहले ही दिया हुआ पदार्थ
10. मित्र का धन
11. भय से दान

दान की वैधता

प्राचीन भारतीय ग्रंथो में दान की वैधता पर विवेचन मिलता है, क्योंकि इसमें स्वामित्व और सम्पत्ति का हस्तांतरण है।
a) दान कभी भी भावुक (Emotional) होके नही देना चाहिए।
b) सुरापान के पश्च्यात दान नही देना चाहिए।
c) जो आपकी वस्तु/सम्पत्ति नही उसका दान नही देना चाहिए।
d) अन्य की वस्तु/सम्पत्ति का दान नही देना चाहिए।

दान के स्थान
1. घरः 10 गुना फल देनेवाला
2. गौशालाः 100 गुना फल देनेवाला
3. तीर्थः 1000 गुना फल देनेवाला
4. शिव मूर्ति (लिंग) समक्षः अनंत फल देनेवाला

Comments

Popular posts from this blog

आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार

आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है?

कुलदेवी की पूजा किस दिन करनी चाहिए?