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Showing posts from December, 2025

पत्नी पूजा के समय पति के दाएं तरफ बैठेगी या बाई तरफ शास्त्र प्रमाण के साथ

पत्नी पूजा के समय पति के दाएं तरफ बैठेगी या बाई तरफ शास्त्र प्रमाण के साथ बताना है हो सके तो दोहे और श्लोक भी देना। यह प्रश्न गृहस्थ धर्म, वैदिक कर्मकाण्ड और शास्त्रीय मर्यादा से जुड़ा है। शास्त्रों में इसका स्पष्ट और एकरूप उत्तर मिलता है। 🔱 निष्कर्ष (संक्षेप में) 👉 पूजा, यज्ञ, व्रत, हवन, संकल्प आदि में पत्नी सदैव पति के दाएँ (दक्षिण) ओर बैठती है। 👉 यदि पत्नी उपस्थित न हो तो अधिकांश वैदिक कर्म अपूर्ण माने जाते हैं। 📜 शास्त्रीय प्रमाण 1️⃣ गृह्यसूत्र और धर्मशास्त्र मनुस्मृति (9.96) में स्पष्ट कहा गया है— पत्नी धर्म की सहधर्मिणी है , वह पति के साथ ही यज्ञ और व्रत में सहभागी होती है। 👉 इसी सहधर्म भाव के कारण पत्नी को दक्षिण भाग दिया गया है। 2️⃣ यज्ञ में स्थान निर्धारण आपस्तम्ब गृह्यसूत्र में कहा गया— यज्ञ करते समय 🔸 पति उत्तराभिमुख बैठे 🔸 पत्नी उसके दक्षिण भाग में स्थित हो दक्षिण भाग = दाहिनी ओर 3️⃣ पुराण प्रमाण स्कन्द पुराण में कहा गया है— दक्षिणे तु समासीनां पत्नीं कुर्यात् यजमानः। 📖 अर्थ – यजमान (पति) को चाहिए कि यज्ञ में पत्नी को अपने दाए...

जपमाला में १०८ दाने

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"जपमाला में १०८ दाने ही क्यों? — शास्त्रीय, दार्शनिक, गणितीय एवं वैज्ञानिक विश्लेषण"  ✓•प्रस्तावना: भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में जप केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि चेतना-परिष्कार की एक सुसंगठित साधना-पद्धति है। जप की गणनात्मक, अनुशासनात्मक एवं ध्यानात्मक व्यवस्था का मूर्त रूप जपमाला है। प्रश्न यह नहीं कि जपमाला में दाने क्यों हैं, बल्कि यह कि दाने १०८ ही क्यों—यह प्रश्न वेद, उपनिषद्, पुराण, आगम, तंत्र, योग, आयुर्वेद, खगोल तथा गणित—सभी क्षेत्रों को स्पर्श करता है। प्रस्तुत शोधप्रबंध में १०८ की संख्या का शास्त्रीय प्रमाणों सहित बहुआयामी विवेचन किया गया है। ✓•१. वैदिक परिप्रेक्ष्य में १०८: ✓•१.१ वेदों में संख्या-चेतना: ऋग्वेद में संख्याएँ केवल गणना का उपकरण नहीं, बल्कि ऋत (cosmic order) की अभिव्यक्ति हैं। वेदों में ३, ७, १२, २७, १०८ जैसी संख्याएँ बार-बार प्रकट होती हैं। •१२ आदित्य •२७ नक्षत्र •३६० दिन = २७ × १३⅓ •१०८ = १२ × ९ या २७ × ४ यह दर्शाता है कि १०८ सौर-नाक्षत्रीय गणना से संबद्ध एक पूर्ण संख्या है। ✓•१.२ उपनिषदों में १०८: मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार १०८ उपन...

सीता रावण की पुत्री

🌹'जब मै अज्ञान से अपनी कन्या के ही स्वीकार की इच्छा करूं तब मेरी मृत्यु हो."🌹 -#अद्भुत_रामायण 8-12 . रावण की इस स्वीकारोक्ति के अनुसार सीता रावण की पुत्री सिद्ध होती है।अद्धुतरामायण मे ही सीता के आविर्भाव की कथा इस कथन की पुष्टि करती है - दण्डकारण्य मे गृत्स्मद नामक ब्राह्मण ,लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से, प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूँदें डालता था (देवों और असुरों की प्रतिद्वंद्विता शत्रुता में परिणत हो चुकी थी। वे एक दूसरे से आशंकित और भयभीत रहते थे । उत्तरी भारत मे देव-संस्कृति की प्रधानता थी। ऋषि-मुनि असुरों के विनाश हेतु राजाओं को प्रेरित करते थे और य़ज्ञ आदि आयोजनो मे एकत्र होकर अपनी संस्कृति के विरोधियों को शक्तिहीन करने के उपाय खोजते थे।ऋषियों के आयोजनो की भनक उनके प्रतिद्वंद्वियों के कानों मे पडती रहती थी,परिणामस्वरूप पारस्परिक विद्वेष और बढ जाता था)।एक दिन उसकी अनुपस्थिति मे रावण वहाँ पहुँचा और ऋषियों को तेजहत करने के लिये उन्हें घायल कर उनका रक्त उसी कलश मे एकत्र कर लंका ले गया।कलश को उसने मंदोदरी के संरक्षण मे दे द...

पितृ ऋण का वैदिक, ज्योतिष, वैज्ञानिक, मेडिकल साइंस

🌹पितृ ऋण का वैदिक, ज्योतिष, वैज्ञानिक, मेडिकल साइंस के आधार पर विश्लेषण और उसका निदान (part_1)🌹     इस पार्ट में मैं पितृ ऋण पर लिख रहा हूं। ऋण पांच प्रकार के होते हैं। देव ऋण, पितृ ऋण, गुरु ऋण, लोक ऋण और भूत ऋण।     इनको मैं पांच अलग अलग पार्ट में लिखूंगा।     अभी मै पितृ ऋण को पहले मेडिकल साइंस के आधार पर समझाता हूं। जिसकी कुंडली में यह दोष हो जिसे पितृ ऋण दोष कहते है इसका मतलब ऐसे पुरष के शुक्राणुओं में Y chromosome वाले शुक्राणु कमजोर होते हैं वे स्त्री के ovule को fertilize नहीं कर पाते। उनके  X factor या X chromosome वाले शुक्राणु ज्यादा पॉवर फूल होते हैं। इसलिए ऐसे पुरष की सिर्फ कन्याएं है उत्पन होती है। वह बेटा उत्पन नहीं कर पाता। और इसका अगर उल्ट है तो वह पुरष कन्या उत्पन नहीं कर पाता। क्योंकि संतान पुत्र होगा या कन्या यह पुरष के वीर्य पर निर्भर होता है इसमें स्त्री का कोई रोल नहीं होता। क्योंकि स्त्री के ovule में सिर्फ X factor या X chromosome ही होते हैं। अगर XY chromosome मिलें तो पुत्र अगर XX chromosome मिलें तो कन्या उत्पन होती है। ...

विष्णु के अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं है

🌹•विष्णु के अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं है अष्टाविंशद्वय= २८ नक्षत्रों से युक्त नीलवर्ण आकाश का विष्णु  तामसरूप है। यह देखा जाता दिखायी पड़ता तथा इससे इसके आलोक में पार्थिव वस्तुएँ देखी जाती हैं। इससे यह पशु है। वृक्ष, लता, गुल्म, वीरुध, तृण तथा गिरि-यह ६ भेदों वाला मुख्य (उद्भिद) रूप भी विष्णु का है। खन् + अच् + यत्= मुख्य भूमि को खन कर/ चीर कर निकला हुआ प्राणी/वनस्पति समुदाय मुख्य वा उद्भिद है। विष्णु के इन नाना रूपों को नमस्कार कर मैं श्री महाराज जी के सम्मुख भक्तिभाव से नत होता हूँ। √• एक सदाशिव है तो एक शिव है। एक महाविष्णु है तो एक विष्णु है। एक ब्रह्म है तो एक ब्रह्मा है। सदाशिव, महाविष्णु एवं ब्रह्म का वर्णन करना किसी के लिये भी शक्य नहीं है। जो पुरुष स्त्री के साथ ऊंचे स्थान एकान्त में अपरिग्रह वृत्ति से रहता हुआ पत्नी को ज्ञान कथा सुनाता, समाधि लगाता ऐसा पुरुष शिव है। उसे प्रणाम । जो पुरुष द्वीप द्वीपान्तर में सबसे दूर समुद्र से घिरे व दुर्गम स्थान में पत्नी सहित रहते हुए योगनिद्रा में लीन रहता तथा समस्त जगत् के कल्याण का उपक्रम करता, वह विष्णु है। उसे मेरा सादर प्रणाम । ज...

गर्भरक्षक श्रीवासुदेव-सूत्र

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•••••गर्भरक्षक श्रीवासुदेव-सूत्र•••••• √•दुर्योधनको छोड़कर उसके सभी भाई मर चुके थे। गदायुद्धमें उसका भी आधा धड़ बेकार हो चुका था। मौतके काले आँचलमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके लिये कोई स्थान न था, पर महासमरमें पराजित हो जानेकी विभीषिकाने उसे किसीके समक्ष मुख दिखानेयोग्य न रख छोड़ा था। उसके विवेकका सूर्य अस्त हो चुका था। उसका युद्ध-कौशल तथा पितृ-चरणोंकी स्वाभाविक कृपासे प्राप्त दिव्य अस्त्र उसके पास थे। अब वह बिना सेनाका सेनापति और बिना रथका महारथी था। वह अन्धकारमयी रात्रिमें पाण्डव-शिविरमें पहुँच साध्वी द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंकी हत्याकर पुनः दुर्योधनद्वारा तिरस्कृत ही नहीं, प्रत्युत अभिभत्सित हो अस्त-व्यस्त हो चुका था। उसके कलुषित जीवनका दुःखान्त नाटक अभी समाप्त होनेवाला न था; अतः वह वीरवर अर्जुनद्वारा पकड़ा जाकर शोकातुरा कृष्णाके समक्ष उपस्थित किया गया। साध्वी द्रौपदीके सौजन्यने उसकी दहकती हृदयाग्निमें घीका काम किया। भीमसेनकी भर्त्सना तथा अर्जुनद्वारा मणि-मूर्धजोंके लुंचनने उसके धैर्यको तिरोहितकर उसे अधीर ही नहीं, प्रत्युत किंकर्तव्यविमूढ़ बना दिया। वह पाण्डवोंसे प्रतिशोधके ...

जन्म मरण चक्र{ बृहदारण्यकोपनिषद्}

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जन्म मरण चक्र{ बृहदारण्यकोपनिषद्}       द्वितीय मार्ग शास्त्रों में वह बताया गया जिस मार्ग से मनुष्य पुन: इस लोक में आता है। जिस प्रकार समुद्र का जल ग्रीष्म ऋतु में ऊपर उठता है तथा वर्षा ऋतु में पुन: बरसता है एवं पुन: ग्रीष्म ऋतु में ऊपर उठता है, ये चक्र चलता रहता है। उसी प्रकार कई ऐसी आत्माएँ जो मुक्ती की अवस्था तक नहीं पहुँच पाती वे पुन: पुन: इस लोक में जन्म ग्रहण करती हैं। मरती हैं एवं पुन: जन्म ग्रहण करती हैं। उपनिषदों में उस चक्र का वर्णन भी किया है। बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा है—  ”असौ वाव लोकेाऽग्निऽ : तस्यादित्य एव समित्। तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा: श्रद्धां जुह्वति। तस्या आहुते: सोमो राजा संभवति। 6.2.9 वह अग्नि है,आदित्य उसका समिधा यानि ईंधन है। इस अग्नि में देव श्रद्धा का होम करते हैं। यह सर्वप्रथम आहुति होती है। उस आहुति से सोम की उत्पत्ति होती है। यहाँ चन्द्रलोक मे आगमन होता है। मृत्युपरान्त श्रद्धापूर्वक किया जाने वाला श्राद्ध ही इस श्रद्धा नामक आहुति का आधार है। एवं शरीर त्याग के उपरान्त आत्मा इसी के आधार पर पुनर्जन्म के प्राकृतिक चक्र में प्रवेश कर पाती...

मानव शरीर क्या एक देवालय (मंदिर) है??

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मानव शरीर  क्या एक देवालय (मंदिर) है?? जब देवता दैत्यों द्वारा बनाए गए जादुई आकृतियों से बंधे हुए थे, तो देवी ने बस अपने पति कामेश्वर को देखा और महान गणपति को जन्म दिया, जिनके 28-अक्षरों के मंत्र ने बंधनों को तोड़ दिया और देवताओं को मुक्त कर दिया। यह गुणों के आठ स्थानों पर श्री गणेशत्व (गणेश का आधिपत्य) का प्रतिनिधित्व करता है, जो तब हुआ जब देवी ने कामेश्वर को देखा, जो शिव के शुद्ध गुण रहित (निर्गुण) पहलू को दर्शाता है।  यह इस बात का प्रतीक है कि निर्गुण शिव को महसूस करने से व्यक्ति का व्यक्तिगत अस्तित्व (जीवभाव) कैसे विलीन हो जाता है। यहाँ, "कामेश्वर" शुद्ध, गुण रहित शिव को संदर्भित करता है। "अलोक" का अर्थ है उनका प्रत्यक्ष व्यक्तिगत अनुभव। "गणेश्वर" आठ तत्वों से बने "स्थानों" पर शासन करते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से पुर्यष्टकम के रूप में जाना जाता है, जिसमें सभी 27 घटक शामिल हैं: 1. पाँच कर्मेन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ):    - वाणी (वाक)    - हाथ (पानी)    - पैर (पद)    - उत्सर्जन अंग (पायु)    - प्रजनन अंग (उपस्थ) 2. पांच ज्ञा...