भगवान् अनन्तमूर्ति कौन हैं ?

जिसके पास थोड़ा ऐश्वर्य है, वह उसके मद में फूला रहता है। उसे घर द्वार का घमण्ड होता है। अल्प जानकारी हो जाने पर उस का फूला नहीं समाता। वह अपने को ज्ञानी समझ बैठता है। व्यक्ति का कितना महत्व है ? उसे परिवार के लोग जानते हैं, परिजन एवं गाँव नगर के लोग जानते हैं। कुछ लोग जनपद में, कोई-कोई को प्रदेश एवं देश स्तर पर भी जान लिया जाता है। विश्व के लिये वह अज्ञात होता है। क्यों कि विश्व के विषय में वह अज्ञ है। हमारी पृथ्वी की तुलना में वह नगण्य है। यह हमारी पृथ्वी ब्रह्माण्ड की तुलना में नगण्य कि वा अस्तित्वहीन है। इसलिये अपने को महान के रूप में स्थापित करने की मूर्खता हमें नहीं करनी चाहिये। हमारी भूमि को स्थिति के बारे में यह वाक्य है...
"यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरसः
 एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थं इव लक्ष्यते ॥"
( भागवत ५/२५/२)
भगवतः अनन्तमूर्तेः सहस्र शिरसः= भगवान् अनन्तमूर्ति के सहस्र शिर हैं। यस्य एकस्मिन् एवं शीर्षणि ध्रियमाणम् = जिसके एक ही सिर पर रखा हुआ। क्षितिमण्डलम्= पृथ्वीमण्डल । सिद्धार्थम् इव लक्ष्यते = सरसों के दाने के समान दिखाई पड़ता है।

 भगवान् अनन्तमूर्ति कौन हैं ? उनके अनन्त सिर क्या हैं ? यह विचार्य है। जो मूर्त होगा, वह अनन्त होगा नहीं।

जो अनन्त होगा, वह मूर्त कैसे ? होगा। जितनी मूर्तियाँ / आकार हैं वे सब सीमित हैं। विशालतर मूर्तियाँ भी सीमित हैं। विशालतम मूर्ति भी सीमित होगी क्योंकि वह असीम अनन्त आकाश के उदर में ही होगी। केवल आकाश ही अनन्त है। अन्य कोई अनन्त नहीं है।

मूर्छ् + क्तिन् =मूर्ति- सतत शान्त, न हिलने वाला, न चलने वाला। गतिहीन, अचर, निष्माण पदार्थ मूर्ति है। शव मूर्ति है। समाधि में स्थित शांतमूर्ति है। ये सब सान्त मूर्ति हैं, अनन्त मूर्ति नहीं। केवल आकाश अनन्त मूर्ति है। आकाश पदार्थ नहीं है, रिक्तता वा अभाव है। यह अकाय अशरीर अरूप है। इस के उदर में अनन्त ज्योतियाँ जगमगाती रहती हैं। अनन्त मूर्तियों (ज्योतियों) को आश्रय देने से यह अनन्तमूर्ति है। अनन्त मूर्ति इसे हम भले कहें, पर यह मूर्ति है नहीं तब अनन्त मूर्ति किसे माना जाय ? मनुष्य जिसकी परिक्रमा न कर सके वह अनन्तमूर्ति है। पृथ्वी के चारों ओर मनुष्य ने घूम लिये। उसके लिये पृथ्वी सीमित है चन्द्रादि पिण्डों की भी मानवीय यानों ने परिक्रमा कर लिया है। यहाँ का स्वामी 1 सूर्य अपरिक्रम्य है। मनुष्य किसी भी दशा में सूर्य का चक्कर लगाने वा वहाँ तक पहुँचने में असमर्थ है। अतः सूर्य हमारे लिये अनन्तमूर्ति है। सूर्य हमारा भगवान् भी है। उसके तेज से सभी यह तेजवंत हो रहे हैं। उसी का तेज हम सब मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों में है। उस के इस तेज के सम्मुख हम नतमस्तक हैं। हमारे सूर्य से भी बढ़कर असंख्य ज्योतिभिण्ड इस आकाश में भरे पड़े हैं। वे सब हमारे लिये व्यर्थ हैं। केवल यही सूर्य हमारा भगवान् है, अनन्त ऊर्जा एवं प्रकाश का स्रोत है। यह हमारा जीवन है, सर्वस्व है। इस सूर्य को छोड़कर किसी अन्य को भगवान् मानना हमें स्वीकार्य नहीं। हम इस के पूजक सौर हैं। सूर्य मण्डल साकार होने से मूर्ति है तथा पहुँच से परे होने के कारण अनन्त है। अतएव यह हमारा अनन्तमूर्ति ईश्वर है। अस्मै नमः ।
शृ हिंसने शृणाति से शीर्ष हुआ है। जिसके द्वारा हिंसन कर्म हो, वह शीर्ष (सिर) है। शिशु का मस्तक माता की योनि को हिंसित (पीडित) करता हुआ बाहर आता है, इसलिये मस्तक को शीर्ष कहते हैं। सूर्य की किरणें अन्धकार का हिंसन (नाश) करती है, इसलिये ये शीर्ष हैं। किरणों की संख्या असंख्य है। असंख्य किरणों वाला होने से सूर्य को सहस्रशीर्षा कहते हैं। अन्य प्रकार से भी सूर्य सहस्रशीर्षा है। जब मह चलते हैं तो ये आकाश को फाड़ते हुए चलते हैं- आकाश को पीड़ा पहुँचाते हैं। इनके चलने से एक मार्ग बनता है। इसे उस ग्रह की कक्षा कहते हैं। इस मार्ग पर चलते हुए आकाश का उदर पीडित होता है, अतः यह मार्ग ग्रह का शिर है। सूर्य के चारों ओर ६० हजार यह जो कि अत्यन्त लघु (अंगुष्ठाकार) है, चक्कर लगाते हैं। इन्हें बालखिल्य अपि कहते हैं। इनकी कक्षाएँ सूर्य के अत्यन्त निकट हैं, अतः ये दर्श्य नहीं हैं। इस के बाद बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण, यम, कुबेर, प्रजापति, इन्द्र, पूषा आदि की कक्षाएँ हैं। इन महों के उपग्रह हैं, उनकी कक्षाएँ हैं। ये सभी सौर परिवार के सदस्य हैं। सूर्य इन सब को साथ ले कर ध्रुव तारे का चक्कर लगाते हुए अभिजित् नक्षत्र की ओर बढ़ रहा है। ये सभी सूर्य के प्रकाश से चमकते हुए दिखते हैं। इन महो की कक्षाएँ सूर्य के फण हैं तथा ग्रह उपग्रह इन के सिर (फणों) पर रखे गये रत्न हैं। पृथ्वी रूपी रत्न सरसों के दाने के बराबर है।

फण् गतौ विस्तारे वा से फण शब्द बना है जो फैलता है, विस्तृत है तथा जिसमें गति है, वह फण है। ग्रहों की कक्षाएँ फण है। सहस्र = असंख्य, हजार, रात इन महों के कक्षाओं की संख्या इनकी संख्या के बराबर है। यह असंख्य वा सहस्र हैं। अतः फण सहस्र हैं। सहस्रफणिने सूर्याय नमः । सहस्रशिरसे सूर्याय नमः ।

सूर्य के चारों ओर लघुतम से लेकर गुरुतम तक यहों की संख्या असंख्य हैं। इसलिये इनकी असंख्य कक्षाएँ वा मार्ग हैं। इन मार्गों को सूर्य स्थिरता प्रदान करता है, वा धारण करता है। अतः ये सभी इसके फण हैं। सूर्य एक सर्प है। जो सरकता हुआ चलता वा गतिशील है, वह सर्प है। सूर्य नाग है। अग = न चलने वाला। न + अग= नाग चलने वाला, सर्पण शील ।पुनः नग् दीप्तौ नगति + अच्= नग =  दीप्ति युक्त, मणि, रत्न ग्रह चमकते हैं। अतः ये नग है। इन्हें जो धारण करता है, वा जिस कक्षा में ये चलते हैं, वह कक्षा नाग है। इस प्रकार महों की सभी कक्षाएँ नाग हैं। जिसकी कक्षा जितनी बड़ी है, वह उतना बड़ा नाग है। सूर्य को कक्षा सर्वाधिक बढ़ी है। यह महानाग है। अन्य कक्षाएँ इसके आश्रित हैं। शिष् हिंसायाम् से शेष शब्द है। अन्धकार वा अज्ञान का हिंसन / नाश करने से सूर्य को शेष कहते हैं। अतः महानाग सूर्य शेषनाग है। सूर्य की किरणें शरदा हैं। शर= शृ हिंसने शृणाति + अच्=शर- प्रकाश, राश्मि जो तम का भेदन करती है। शरद= किरणदाता सूर्यमण्डल शर (ताप), दा (देने वाली) सूर्य  किरणें शरदा हैं। शेषनाग अनन्तमूर्ति सूर्य की पत्नी शारदा है। शेष शारदा का युग्म अभिन्न है शेषशारदाभ्यां नमः (शर एवं शार)।

जिस प्रकार एक देश से दूसरे देश तक जाने वाले विमानों का एक निश्चित मार्ग आकाश में होता है, उसी प्रकार महों के चलते रहने का भी एक नियत मार्ग होता है। ये मार्ग अमूर्त हैं, क्योंकि आकाश अमूर्त है। इन्हें देखा नहीं जाता। किन्तु ये हैं, यह सत्य है। इस प्रत्येक मार्ग पर केवल एक मह चलता है। यह का चलना दिखाई पड़ता है। क्यों कि मह मूर्त है। एक अमूर्त मार्ग पर एक ही मूर्त ग्रह का चलना भी एक अंत है। ये असंख्य मार्ग / कक्षा / परिक्रमण पथ जिस एक मार्ग वा कक्षा से हैं, वह है सूर्य को कक्षा सूर्य एक अमूर्त स्तम्भ के चारों ओर नीचे पाताल लोक (उत्तम तारे) से ऊपर लोग (ध्रुवतारे) को ओर सर्पिल गति से दक्षिणावर्त होकर चल रहा है। वचन है...

" स बहुमानं दक्षिणतः क्रियमाणः ।"
( भागवत ५/२३/१ ।)

सृष्टि के प्रलय पर्यन्त (ब्रह्मा के एक दिन के बराबर) सूर्य का एक परिक्रमा पथ होता है। सूर्य को एक परिक्रमा पूरी होने तक सौर परिवार के अन्य असंख्य ग्रह सूर्य की अनन्त परिक्रमाएँ कर चुके होते हैं। यहाँ के ये परिक्रमण मार्ग सूर्य के असंख्य फण वा सिर हैं। प्रत्येक महकक्षा एक फण है। कक्षा पर आरुढ मह एक मणि है। सूर्य की कक्षा उसका मध्य फण है और इस पर आरुढ सूर्य एक महामणि है। इस प्रकार सूर्य अनन्तमूर्ति सहस्रफण मूर्तिमन्त शेषनाग है। जिस अमूर्त स्तम्भ के चारों ओर सौर परिवार घूमता हुआ नीचे से ऊपर की ओर बढ़ रहा है, वह अमूर्तशिवलिंग है। इस का आदि अन्त नहीं है। अस्मै शिवलिंगाय नमः ।

ग्रहों की कक्षाएँ बराबर नहीं है। इसलिये शेष नाग के फण भी बराबर नहीं है। कोई छोटा तो कोई बड़ा है। शेष नाग के सिर पर मणि होती है। अनन्त सिर हैं तो अनन्त मणियाँ भी हैं। सबसे बड़े फण (सूर्य कक्षा) की सबसे बड़ी मणि (सूर्य) है। इस तारतम्य में पृथ्वी को लघु कक्षा में एक लघुमणि (पृथ्वी) है। यह मणि हरे रंग की है। इस मणि का नाम सिद्धार्थ है। सरसों के श्वेतहरित दाने को सिद्धार्थ कहते हैं। इस प्रकार शेषनाग के इन फर्मों पर नानावर्ण एवं आकार की असंख्य मणियाँ हैं। मध्य मणि सूर्य है। इसे दर्भ (दति तमम्) कहते हैं। इस केन्द्रीय मणि के प्रकाश से अन्य सभी मणियाँ चमकती हैं। उनमें अपनी स्वयं की दीप्ति नहीं है। अमूर्त आकाश के इस अमूर्त शेषनाग को, जो पाताल लोक से ले कर ब्रह्मलोक तक व्याप्त है, भगवान् शेष कहते हैं।

प्रलय उपरान्त जो बचे उसे शेष कहते हैं। यह शेष भगवान् अमूर्त एवं अनन्त मूर्ति है। इसे मेरा नमस्कार ।

 ज्ञान को मूर्तरूप देने एवं ब्रह्माण्ड के रहस्य को अनावरित करने में शेषनाग एक सत्य कल्पना है। पृथ्वी शेषनाग के फण पर टिकी है। शेषनाग पाताल में रहते हैं। इन का मुँह पाताल में तथा पूंछ ऊर्ध्वलोक में है। उत्तम तारे और ध्रुवतारे को मिलाने से जो रेखा बनती है, यह सूर्य के पाताल से ब्रह्म लोक तक जाने तक मार्ग है। यह मार्ग, सूर्य के परिक्रमण मार्ग का अक्ष (शिवलिंग) है। इस शिवलिंग के चतुर्दिक् घूमता हुआ, ऊपर उठता हुआ, उत्तम तारे से ध्रुव तारे की दिशा में सूर्य, अपने परिवार के साथ अनादि काल से दक्षिणावर्त हो कर चल रहा है। जब यह शेषनाग के मुँह में पहुँचता है तो महाप्रलय होता है। महा प्रलय में ब्रह्मा की सौ वर्ष आयु पूरी होती है। ब्रह्मा मर जाते वा ब्रह्मगति को प्राप्त होते हैं। सूर्य मिट जाता है। फिर वही स्थिति आती है। जब न सतु होता है तथा न असत् होता है। मूलप्रकृति अपने स्वरूप में होती है – पुरुष (आकाश) के अंक में सोती है, विश्वास करती है। क्या होता ? क्या नहीं होता है? कौन कहाँ होता है ? कैसे होता है ? इसे कौन जाने ? कौन कहे ?

ब्रह्माण्ड में जब पृथ्वी इतनी क्षुद्र है तो हम किस खेत की मूली हैं ? हम अपने को कुछ लगाते है- यह मुर्खता को पराकाष्ठा है। व्यास जी ने पृथ्वी को सरसों के दाने के बराबर उसको लघुता को दर्शाया है। तुलसी दास ने पृथ्वी की तुलना धूल के एक कण से किया है। इससे पृथ्वी नगण्य है ऐसा भान होता है। इनका बचन है- - -

 "ब्रह्माण्ड भवन विराज जाके, एक सिर जिमि रज कनी।"
(राम चरित मानस)

 ब्रह्माण्ड रूपी शेष के एक मस्तक पर पृथ्वी धूल के एक कण के समान शोभायमान होती है। ऐसे - शेष को बृहत्ता के सम्मुख मैं नव हूँ।

भुज् वक्रगतौ भुजति से भुजा बना है। जो टेढ़ा चलता है, टेढ़ा बैठता है, कुण्डलाकार होने वा कुण्डली मारने से वह कुण्डल है। शिव जी भुजग भूषण हैं। कान में सर्प का कुण्डल, गले में सर्प की माला, बाहों में सर्प का बाजूबन्द, कमर में सर्प की मेखला, स्कन्ध में काटि पर्यन्त सर्प का यज्ञोपवीत, पैरो में सर्प का पादबन्द पहनते हैं। शिव मनुष्याकार नहीं हैं। अतः वे भूषण कैसे धारण कर सकते हैं। शिव लिंग हो शिव है और अमूर्त है। इस अमूर्त शिव लिंग के चारों ओर सौर परिवार की समस्त कक्षाओं का भूषण है। ये सौर कक्षाएँ वर्तुलाकार कुण्डलाकृति होने से भुजग हैं। इस लिये ये शिव की भूषण हैं। इनकी संख्या अधिक है। इसलिये शिव के नाना अंगों को उन्हा की गई है और कक्षा को उसमें जोड़ा गया है। अनन्त कक्षाएँ=फण= सिर = भुजग = सर्प इस शिव के भूषण / शोभा है। शिव आकाश है। आकाश में फण कुण्डलाकार परिभ्रमण कर रहे यह इस के आभूषण हैं। इसे हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।

शेष नाम को शय्या पर विष्णु शयन करते हैं। यह कथन भी प्रत्यक्ष है। परिवलयाकार कक्षा में सूर्य का स्थित रहना इस का शेषशायी होना है। टेढ़ी मेढ़ी शय्या पर सोने वाला क्या शान्ति से सो सकता है ? भगवान् सूर्य (विष्णु जी) को 'शान्ताकारं भुजगशयनं' कहा गया है। जो शिव (सूर्य) भुजगभूषण हैं, वही विष्णु (सूर्य) भुजगशायी हैं। दोनों एक हैं। इस एक को मेरा प्रणाम।

सूर्य हम पृथ्वीवासियों का एकमात्र ईश्वर है। यह परम देव है, परम शक्ति है, परम पद है। सूर्य की किरणें अन्धकार का दारण करने से दर्भ हैं, चमकने से मणि हैं, चलने से वाक् हैं, आकाश के शिरो भागमें होने से केश हैं, सम्पूर्ण मण्डल में प्रकाश रश्मियाँ ही रोम हैं, शौत का दमन करने से दन्त हैं, इन का क्षय नहीं होता, इस लिये अक्ष है, दृष्टि कारक होने से चक्षु हैं, मण्डल से ये लगी वा जुड़ी हुई होने से लिंग हैं, आकाश में तीव्र गति से घुसने से वाण हैं, चारों ओर चलने से अंग हैं, अन्धकार को खाने से अंशु हैं, चर स्वभाव होने से अम्बु हैं, तीनों लोकों को विदीर्ण करने से श्रृंग हैं, कठोर होने से वज्र हैं, ऊपर होने से मूर्धा है, सर्वत्र फैलने से फण हैं, अन्धकार का हिंसन करने से शीर्ष हैं, ऊपर होने से मुख हैं, ज्ञान वाहक होने से बदन हैं, सर्वभक्षी होने से अस्य हैं, चलने से पाद हैं, सर्वत्र जाने से चरण हैं, नाना कार्य करने से कर हैं, मार्ग दर्शन करने से नेत्र हैं, दिशाओं के भीतर उष्मा ले जाने से नयन हैं, मुड़ने से भुजा हैं, रस को अपने भीतर आत्मसात करने से आनन हैं, आर्द्रता को चाटने से जिद्दा है, रस पान कर शुष्कता देने से रश्मि हैं, प्रहार करने से शर हैं, क्रियाशील रहने से किरण है, चमकने से ज्योति हैं। इनसे युक्त सूर्य को मैं नानाभाँति नमस्कार करता हूँ।

जहाँ तक सूर्य का प्रकाश जाता है, जहाँ तक चन्द्रमा के साथ नक्षत्र समूहों वा राशियों का दर्शन होता है, उतना आकाशीय क्षेत्र भूमण्डल कहलाता है। 

इस भूमण्डल के विषय में यह वचन है।

"उक्तस्त्वया भूमण्डलायामविशेषो यावदादित्यस्तपति
 पत्र चासौ ज्योतिषां गणेश्चन्द्रमा वा सह दृश्यते ॥"
( भागवत ५/१६/१)

भू-मण्डल-आयाम-विशेषः= भू मण्डल के विस्तार को उत्तम ढंग से। उक्तः त्वया= आप (शुकदेव) द्वारा कहा गया है। यावत् आदित्यः तपति= जहाँ तक सूर्य का नाप जाता है। यत्र व असौ =जहाँ भी वह। ज्योतिषां गणैः सह =ज्योतिर्मय पिण्डों के समूह के साथ। वा चन्द्रमा दृश्यते= द्रुतगामी चन्द्रमा दिखाई पड़ता है।

भूमण्डल (सूर्य शासित क्षेत्र) में यह द्वीप है जैसे धरती के समुद्र में अनेकों द्वीप उभरे होते हैं, वैसे आकाश समुद्र में ठोस पिण्ड द्वीप है। पृथ्वी एक ऐसा द्वीप है जहाँ प्राणिसमुदाय का वास है। अन्यमह पृथ्वी के सापेक्ष निर्जन हैं। पृथ्वी के घेरे को कुवलय कहते हैं कु नाम पृथ्वी का वलय नाम घेरे का। कुवलय भूपरिधि पृथ्वी को कमल कोश कहा गया है। जैसे कमल की पंखुडियों कई पर्त होकर उसके केन्द्रीय पराग भाग को घेरे रहती हैं, वैसे पृथ्वी में कई पते हैं। इन पर्तों के मध्य में पृथ्वी का कोश (मूल्यवान् भाग) है। पृथ्वी के ठोस स्वरूप के ऊपर वायु मण्डल है। पृथ्वी के ऊपर के वायुमण्डल की परिधि एकलाख योजन है। वाक्य है...

 "यो वायं द्वीपः कुवलय कमलकोशाभ्यान्तर कोशः
 नियुतयोजनविशाल: समवर्तुलः यथा पुष्करपत्रम् ॥" 
(भागवत ५/१६/५)

यः वा अयं द्वीपः= यह जो द्वीप (पृथ्वी) है। 

कुवलय कमल कोश-अभ्यन्तर कोश= पृथ्वी रूप कमल कोश के भीतर का भाग (कोश) है। 

नियुतयोजन विशालः समवर्तुलः= एक लाख योजन विस्तार वाला तथा गोलाकार है।

 यथा पुष्कर पत्रम्= जैसे कमल का पत्र (पुष्प) होता है।

पृथ्वी के भीतर मेरु पर्वत है। यह पर्वत अमूर्त किन्तु वास्तविक है। पृथ्वी के बीचो बीच से होकर उत्तर एवं दक्षिण ध्रुव को मिलाने वाली रेखा (चुम्बकीय क्षेत्र) को मेरु कहते हैं।

 पृथ्वी के मध्य का भाग ज्वालामय है। इसे इलावृत वर्ष कहते हैं। मेरु का विस्तार इलावृत वर्ष से होकर हो जाता है। यह मेरु मानो भूमण्डल की कर्णिका (पतवार, उत्तारक) है। यह सौवर्ण (देदीप्यमान आकर्षक है। यह मेरु (चुम्बकीय क्षेत्र) पृथ्वी के भीतर जितना है, उतना ही पृथ्वी के ऊपर है। कथन है...

"एषां मध्ये इलावृतं नामाभ्यान्तरवर्ध
 यस्य नाभ्यामवस्थितः पर्वतः सौवर्णः
 कुलगिरिराजो मेरु द्वीपायामसमुन्नाहः
 कर्णिकाभूतः कुवलय कमलस्य मूर्धनि
 द्वात्रिंशत् सहस्रयोजन विततो मूले
 षोडश सहस्रं तावतान्तर् भूम्यां प्रविष्टः ॥"
(भागवत ५/१६/७)

 एषाम्= इस पृथ्वी के। 

मध्ये = बीचोबीच । 

इलावृतम् नाम आभ्यन्तर वर्षम् =इलावृत नामक आन्तरिक भाग है। यस्य नाभ्याम् = जिस की नाभि (केन्द्र) में ।सर्वतः सौवर्ण: = पूरीतरह स्वर्ण का बना हुआ वा अत्यन्त आकर्षक। कुलगिरिराज: मेरुः= पर्वतों के कुल का राजा वा पर्वतश्रेष्ठ मेरु पर्वत है।

 द्वीप आयाम समुन्नाहः= द्वीप (पृथ्वी) के आधार पर जितना फैला है, उतना ही ऊपर उठा हुआ है।

कर्णिका भूतः = कमल की नाल के समान है।

 कुवलय कमलस्य मूर्धनि =पृथ्वी रूपी कमल के शीर्ष (ऊर्ध्व भाग) पर।

 द्वात्रिंशत् सहस्र योजनः= ३२ हजार योजन।

 विततः= फैला है।

 मूले = आधार पर।

 षोडशसहस्रम् = १६ हजार योजन है। 

तावत् उतना ।

 अन्तः भूम्याम् =भूमि के भीतर। 

प्रविष्टः =धंसा हुआ है।

जो वर्षा का कारक है, जिससे वर्षा होती है, उसे वर्ष कहते हैं। वर्ष= मेघ पर्वत पर्वत से क्षेत्र  का विभाजन होता है तथा मेघ से आकाशीय भूमि का विभाजन होता है। अतएव वर्ष इलावृत वर्ष =भाग,खण्ड।इलावृत वर्ष= इलावृत भाग।  

समुन्नाह= सम् + उत् + नह् बन्धने + घञ्। ऊपर का दृढ़ एवं वितत बन्धन द्वीप आयाम= भूमण्डल का विस्तार। मेरु पर्वत को पर्वतों का राजा कहा गया है। इस मेरु का विस्तार भूमण्डल के बराबर अर्थात् एक लाख योजन है। इसका अर्थ है कि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की परिधि एक लाख योजन है। पृथ्वी का आधार / आश्रय यह सुमेरु है भूतल के नीचे चुम्बकीय क्षेत्र का विस्तार १६००० योजन तथा ऊपर ३२००० योजन है। पृथ्वी का चुम्बकीय बल दोनों ध्रुवों पर सर्वाधिक एवं समान तथा केन्द्र में अत्यल्प नाममात्र का होता है। ध्रुवों से ऊपर एवं नीचे यह क्रमशः क्षीण होता जाता है। अतः यह कहा जाता है कि मेरु पर्वत पृथ्वी के बाहर उठा हुआ तथा नीचे धँसा हुआ वा प्रविष्ट है। इस मेरु को मेरा नमस्कार ।

वृ आकर्षणे वृणाति + णक्= वर्ण अपनी ओर खींचने वाला। सु + वर्ण = सुवर्ण अधिक आकर्षक। तद्धित अण् =सौवर्ण अत्यधिक आकर्षण सम्पन्न। मेरु पर्वत सौवर्ण है, का अर्थ है. अत्यधिक आकर्षणशील। पृथ्वी के भीतर का सौवर्ण मेरु अदृश्य है। सूर्य रश्मियाँ सौवर्ण हैं। सूर्य सौवर्ण मेरु युक्त है। अपने अन्दर प्रतिष्ठित मेरु के परितः पिण्ड घूमते हैं। आकाश में जितने पिण्ड उतने मेरु । बृहद् मेरु सूर्याक्ष के परितः पृथिव्यादि मह घूमते हैं। इसी तरह बृहत्तर मेरु ध्रुव के चारों ओर सूर्यादि पिण्ड निरन्तर घूमते हैं। काश्यपादि नीहारिकाएँ किसी अज्ञात वृहत्तम मेरु का चक्कर लगा रही हैं। यहाँ तक मन और बुद्धि की पहुँच नहीं है। मेरु अपने क्षेत्र का नियामक होता है। महामेरु अज्ञेय है। यह आकाश की समस्त सृष्टियों का नियामक है। ये सृष्टियाँ इस अज्ञेय मेरु की प्रदक्षिणा करने में संलग्न हैं। मेरु के चतुर्दिक् पिण्ड का घूमना पिण्ड की नियति है। एक पिण्ड एक ही साथ असंख्य मेरुओं की परिक्रमा करता है। यह अद्भुत सत्य है और प्रत्यक्ष है। इस सत्य को मेरा नमस्कार ।

एक मेरु दूसरे मेरु के सामने नत होता है। इस क्रमिक नति की एक व्यवस्था है। पृथ्वी की अक्ष अपने परिक्रमा पथ पर सूर्य की अक्ष के सामने झुकी रहती है। इसी प्रकार सूर्य अपने परिक्रमा पथ पर ध्रुव की अक्ष के सामने सदा झुका रहता है। ध्रुव अपने परिक्रमा पथ पर आकाश गंगा की अक्ष के सामने झुका रहता है। आकाश गंगा अपने प्रदक्षिणा पथ पर अदिति के सामने झुकी रहती है। अदिति एवं दिति देवियों कश्यप के सामने झुक कर उसकी परिक्रमा करती है। यह कश्यय मरीचिका विशालतम देव की झुक कर परिक्रमा करता है। यह देव, किसी की परिक्रमा नहीं करता, न झुकता है। यह स्व परिक्रमा में रत सदा अनत रहता है। अस्मै नमः।

मेरे हृदय में एक मेरु है। इस मेरु के माध्यम से मुझे सभी मेरुओं का दर्शन हो रहा है। इस दर्शन को यहाँ पर स्वाभिव्यक्ति हो रही है। पृथ्वी के दोनों ध्रुवों को मिलाने वाला, उसके केन्द्र से होकर जाने वाला, चुम्बकीय क्षेत्र भूमेरु है। इसी प्रकार सूर्य के दोनों ध्रुवों के मिलाने वाला केन्द्रीय शाक्तिपथ सूर्यमेरु है। ऐसे ही ध्रुवमेरु,गोमेरु, आदिति मेरु कश्यप मेरु,महामेरु है। इन सब को सुमेरु कहते हैं। सुमेक का उल्लंघन कोई पिण्ड नहीं करता। छोटा, सुमेरु के सम्मान में झुका रहता है। महामेरु विशालतम है। इस से बड़ा कोई मेरु नहीं है। अतः यह अच्युत (झुकने वा पतित न होने वाला) है। अच्युताय नमः ।

ईर् गतौ कम्पने च ईर्तें + उ = ईरु-गतिमान कम्पनशील चर। मा + ईरु = मेरु गतिहीन, अकम्प, अचर, अविचल, धीर। सभी मेरु अचल होते हैं। जिसके भीतर मेरु होता है, वह उसे नचाता है। पृथ्वी अपने भीतर स्थित मेरु द्वारा नचाई जाती है। पृथ्वी के नाचने से रात दिन होते हैं। पृथ्वी स्व अक्ष भूमेरु के चतुर्दिक नाचती हुई सूर्य के चारों ओर दौड़ती है। इसी प्रकार सूर्य अपनी अक्ष सुमेरु के चतुर्दिक् नर्तन करता हुआ ध्रुव के परितः चक्कर काटता है, ध्रुव स्व अक्ष पर घूमता हुआ गंगा के चारों ओर, गंगा स्व अक्ष गोमेरु की भूमि में नृत्य करती हुई, अदिति और अदिति स्व अक्ष पर थिरकती हुई, कश्यप की परिक्रमा में संलग्न हैं। महाविष्णु अच्युत इन सब को नचाता हुआ स्वयं नृत्य से विरत है। ऐस महाविष्णु को मेरा अनन्त प्रणम ।

हमारे लिये ये सात मेरु-भू, सू, ध्रुव, गंगा, अदिति, कश्यप एवं अच्युत पूज्य हैं। यह जो अच्युत मेरु है, निश्चय ही हमारे भीतर विद्यमान है। भगवान् का वचन है...

" ईश्वर सर्वभूतानां हृददेशेऽर्जुन तिष्ठति ।
 भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।।"
 (गीता १८/६१)

 हे अर्जुन । ईश्वर सभी भूतों के हृदय में स्थित है। उन सभी भूतों (प्राणियों) को अपनी माया (शक्ति) से घुमाता (नचाता हुआ शरीरयन्त्र पर सवार है। अर्थात् पिण्ड उसके अधीन हैं। अस्मै ईश्वराय नमः ।
#त्रिस्कन्धज्योतिर्विद्

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