शक्ति रहस्यमय है।

शक्ति रहस्यमय है। इस का रूप अपार है। ऐसी रात्रि का वर्णन वेद करता है। रात्रि के महत्व का प्रतिपादक मंत्र यह है...

" कृष्णायाः पुत्रो अर्जुनी रात्र्या वत्सोऽजायत । 
सह द्यामधि रोहति रुहो रुरोह रोहितः ।।"
( अथर्व. १३ । ३ । २६)

अन्वयार्थ- कृष्णायाः रात्र्याः वत्सः रोहितः अजायत [ काली रात से सूर्य पैदा हुआ। सः द्या अधिरोहति । वह सचमुच द्युलोक की ओर चढ़ता है।] (स) अर्जुनः रुहः रुरोह | वह विकसित शुक्लवर्ण का हो कर ऊपर उठा । अर्जुन =श्वेत, कृष्ण अश्वेत, रोहित = रक्त, वत्स = पुत्र ।

अर्जुन = शुक्ल-(निरुक्त २। ६।२१ ।) सूर्य निकलते समय रक्तवर्ण होता है। यह रात्रि से उत्पन्न होता है। इसलिये यह रात्रि का वत्स / पुत्र है। रात्रि कृष्ण वर्ण की होती है। कृष्ण यहाँ रात्रि का विशेषण है। सूर्य जब क्षितिज से ऊपर उठ कर आकाश की ऊंचवाईयों पर चढ़ता है तो शुक्ल वर्ण का होता है। शुक्ल वर्ण दिन का है। अर्जुन दिन का सूर्य है। इस मंत्र में कृष्ण रात्रि से अर्जुन पुत्र की उत्पत्ति कही गई है। सूर्य परमेश्वर है। सूर्य रात्रि का पुत्र है। अतः रात्रि परमेश्वर की जननी हुई। इससे रात्रि की सर्वोपरिता सिद्ध होती है। सूर्य ज्ञान है। रात्रि से सूर्य (ज्ञान) की उत्पत्ति होती है। इस का तात्पर्य है-रात्रि की उपासना से, रात्रि में चिन्तन ध्यानादि करने से ज्ञान की लब्धि होती है। यहाँ इस मंत्र का निहितार्थ है। यहाँ प्रार्थना मंत्र है...

(१) "वर्ये वन्दे सुभगे सुजात आजगन् रात्रि सुमना इह स्याम् ।
 अस्मास्त्रायस्व नर्याणि जाता अथो यानि गव्यानि पुष्ट्या ॥"
(अथर्व. १९ । ४९ । ३)

अन्वयार्थ... वर्ये ! अथो [वन्दे श्रेष्ठ रात्रि । अब में तेरी वन्दना करता हूँ। ]सुभगे । इह आ अजगन् | उत्तम श्री से सम्पन्न रात्रि । तू इस लोक में आई है। रात्रि । सुमनाः स्याम् | [हे रात्रि में प्रसन्न चित्त होऊ ]। यानि नर्याणि (न्यर्याणि) गव्यानी जाता (जातानि) (तानि) पुष्ट्या अस्मान् त्रायस्व |[ जितने सुश्रेष्ठ धन उत्पन्न हो चुके हैं, उन सब की पुष्टि (पूर्णता) के द्वारा हमारी रक्षा करा] नि +अर्थ =न्यर्य =न् + इ + अ+र्+ य्=नर्य, इ का लोप कर। गो + यत् = गव्य = गोधन = ज्ञानधन गव्यानि + र् + य =ज्ञानधन।
गव्यानि = समस्त ज्ञान-धन।

(२)."शिवा रात्रिमनुसूर्य च हिमस्य माता सुहवा नो अस्तु ।
 अस्य स्तोमस्य सुभगे निबोध येन त्वा वन्दे विश्वासु दिक्षु ।"
(अथर्व १९/४९/५)

अन्वयार्थ - विभावरि रात्रि । नः स्तोमस्य राजा इव जोषसे [ज्योतिर्मयी रात्रि । हमारी स्तुति से तू उसी तरह प्रसन्न हो जैसे एक राजा चारणों के वाक्यों से प्रसन्न /सन्तुष्ट होता है। (वयम्) सर्ववीराः आसाम | हम सब वीररस से ओतप्रोत हो जायें।] (वयम्) सर्ववेदसः भवाम|[ हम सब सभी विद्याओं में निपुण हो जायें।](त्वम् व्यच्छन्तीः | [तुम अन्धकार (अज्ञान) से सब को बाँधती हो वा अन्धकार का त्याग कर प्रकाश से सब को भर देती हो, ज्ञान देती हो।] वि + उच्छ्= व्युच्छति बाँधना पूरा करना त्यागना समाप्त करना (त्वम्) अनुपसः | [तुम दिन में उष्मा (गर्मी) करती हो, रात में उष्मा पीछे करती शीत देती हो। तुम दुःख सुख की कारक हो। ।]

वेद में जिस रात्रि तत्व का निरुपण हुआ है, वह स्त्री ब्रह्म काली (काल डीप) है। लोक में रात्रि की प्रतिमा बना कर उसे पूजा जाता है, आदर दिया जाता है। इन मूर्तियों को काली महाकाली नाम दिया गया है। इन विमों के द्वारा काली तत्व के महत्व का संकेतन होता है। 

यथा- 

काली के ४ हाथ =चार दिशाएं पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण । 

काली के १० हाथ = दस दिसाऍ पूर्व आग्न्येय, दक्षिण, नैर्भृत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर, ईशान, ऊर्ध्व, अधस् ।

 काली के २ पर= रात और दिन।

 काली की बाहर निकली जिव्हा =निःशब्दता, मौन। 

काली का एक मस्तक =एकतम चक्र ।

 काली के ३ नेत्र = भूः भुवः स्वः लोक ।

 काली की मुण्डमाला = सर्वविचारमय।

 काली का कृष्ण वर्ण= सभी वर्णों को सोखने वाली, सर्वभूतमयी, जिसे जानना शक्य नहीं, अज्ञेय तत्व।

 काली के इस स्वरूप को समझ कर उस को पूजने वाले लोग धन्य हैं। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। काली पूजक श्री रामकृष्ण परमहंस स्वयमेव काली हैं। मैं उन के सम्मुख सतत नतमस्तक हूँ। 

काली के पैरों तले शिव-प्रतिमा में शिव जी (संहार के देवता) को पैरों के नीचे दबा हुआ दिखाया जाता है। यह अर्थपूर्ण प्रतीक है। काली के पैरों के नीचे आने (शरणागत होने से जीव शिव हो जाता है। कल्याणकामी जीव को काली की शरण में जाना चाहिये। शिव कालरूप देव है। जिस के पैरों के नीचे काल हो-जो काल से ऊपर हो जिस का काल पर पूर्ण अधिकार हो, वहीं काली है। ऐसी काली मा को मेरा प्रणाम ! 

काली के सम्मुख रुद्रदेव शान्त (अशक्त) हो जाते हैं। इस लिये काली का नाम शाम्या है। वेद यही कहता है- 

"शाम्या ह नाम-रात्रि इह...।"
 (अथर्व १९ । ४९ । ७ | )

【शम्या = शम्नाति वधकर्मा-निघण्टु २ । १९. 】

यही कारण है कि शक्ति की उपासना उपकमों के लिये रात्रि में की जाती है। आराधक कहता है-

(१) "यो अघ स्तेन आयत्यद्यायुर्मत्यों रिपुः । रात्री तस्य प्रतीत्य प्र प्रीवाः प्र शिरो हनत् ॥"
 (अथर्व. १९ । ४९ । ९)

अंघ् (अघ्) अंघयति-ते अशुभकर्मणि + अच् + आयुस् =अमायुस = गर्हित जीवन जीवन बिताने वाला । अघायुस् + सु = अघायुः = पापी ।इ गतौ अयति । आ + इ = आयति (आगतौ) आता है, आ रहा है। स्तेन स्तेनयति-ते + अच्  कर्तरि= स्तेन: = चोर लुटेरा डकैत ।प्रति + इ + यत्= प्रतीत्य = जान कर पुकार कर ,प्रमाणित कर ।प्र + हन् + लोट् म. पु. एक व. =प्रहनत् =तू मार दे,बंध कर ।

अर्थ-हे रात्री मा । जो चोर पापी शत्रु मनुष्य आज आ रहा है, उसे सम्यक् रूप से जान कर उस दुष्ट की गर्दन को काट दे, उसके सिर को फोड़ दे।

(२) "प्र पादौ न यथायति प्र हस्तौ न यथाशिषत् ।
 यो मलिम्लुरुपायति स संपिष्टो अपायति । अपायति स्वपायति शुष्के स्थाणावपायति ।।" 
(अथर्व. १९ । ४९ । १०)

पादौ  प्र हनत् = उस पापी शत्रु के दोनों पैरों को तोड़ दे। 

यथा आयति न = जिस से वह न आवे, न चल पावे।

 हस्तौ प्र हनत् = उस चोर के दोनों हाथों तोड़ दे।

 यथा आशिषत् न = जिस से वह दुष्ट शत्रु खा न पावे। 

यः मलिम्लुः उपायति = जो मलिनाचारी हमारे निकट आता है, आवे।

 सः संपिष्टः अपायति = वह पिस कर कठिन मार खा कर दूर चला जाय मर जाय।

 अपायति स अपायति = वह बहुत दूर (दूसरे लोक को) चला जाय। 

शुष्के स्थाणी अपायति = सुखाने वाली अग्नि और काष्ठ की चिता पर चला जाय- भस्मीभूत हो जाय।

 पूर्वमन्त्र से यह मंत्र पूरी तरह जुड़ा हुआ है। यह मारण तंत्र है। यह राशि में रात्रि देवी महाकाली से की गई प्रार्थना है।

(३) "अघ रात्रि तृष्टधूममशीर्षाणमहिं कृणु ।  अक्षौ वृकस्य निर्जह्यास्तेन तं द्रुपदे जहि ॥ 
( अथर्व १९/५०/१)

अघ रात्रि = (शत्रुओं के लिये नितान्त) अशुभ कुत्सित रात्रि !

 तुष्टधूमम्-अहिम् = पाप कर्म कर के प्रसन्न होने वाले दुष्ट को। तुष् + क्त = तुष्ट = प्रसन्न। धू + मक् = धूम = धूआँ मेघ कुहरा पाप। आहन्ति आ + इण् स च डित् आङो ह्रस्वश्च = हन्ता दुष्ट =अहि 

 अशीर्षाणम् कृण् = सिर रहित कर दो, मार डालो। कृहिंसायाम् स्वा. पर लोट् म. पु. एक व. = कृणु ।

वृकस्य अक्षौ निर्जह्याः = दुष्ट लुटेरे की दोनों आँखों को निकाल कर बाहर कर दो अन्धा बना दो। वृ (आदाने वर्कते बलपूर्वक लेना, लूटना, छीनना)+ कक् = वृक =लुटेरा अपहरणकर्ता दुष्ट।

 तेन तम् द्रुपदे जहि = इस प्रकार से, उस दुष्ट लुटेरे को तू दौड़ा-दौड़ा कर गला-गला कर (भूखा रख कर) मार दे। उसे डण्डे से पीट-पीट कर मार दे। द्रु गतौ डु = द्रु = लकड़ी (का दण्ड)। पद् गतौ + अच् = पद जिस से चला जाता, दौड़ा जाता है। द्रुपदे = दौड़ा कर गला कर यातना दे कर । 

अर्थ- हे कठोर रात्रि । हे कालो मा । हिंसा करके प्रसन्न होने वाले दुष्ट को तू मार दे। उसे अन्धा कर दे। उसे यातना दे दे कर नष्ट कर दे। 

महाशक्ति पर ब्रह्म का तमोमय विग्रह रात्रि है। यह अश्वेत प्रधान होने से काली है। यह देवी है। लोग अपने स्वभावानुसार विभिन्न रूपों में इस वैदिक देवता की उपासना कर लाभ प्राप्त करते हैं। उप कमों की अधिष्ठात्री शक्ति काली रात्रि को मेरा संतत नमस्कार ।

 प्रकृति का विधान है कि सब के शत्रु-मित्र है। जीवन में शत्रु से लोहा लेना ही पड़ता है। शत्रु को ध्वस्त करने के लिये शक्ति की आवश्यकता होती है। सर्वोपरि शक्ति रात्रि है। इस शक्ति से संयुक्त होना तथा इस से शत्रु को नियुक्त (अलग) करना ही उपासना का मुख्य उद्देश्य है। शक्तिमत होने के लिये मैं इसकी स्तुति करता हूँ। शत्रु को शक्ति करने के लिये इस का आवाहन करता हूँ।

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