एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा ८४ आसन क्यों है

एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा ८४ आसन क्यों है ? मैं इस का उत्तर न दे सका।

आप को पत्र लिखते हुए इस का उत्तर सद्यः प्रकट हो गया। योग वा भोग के ८४ आसन वा ८४ लाख यौनियाँ हैं। १२ राशियाँ हैं। ७ ग्रह है। दोनों का गुणनफल १२४७ = ८४ है। १२ राशियों का योग ७ ग्रह ८४ प्रकार से करते हैं।
 वेद का वचन है ...
'सप्त युञ्जन्ति_पाशान् ।' - (अथर्ववेद काण्ड १३ सूक्त ३, मंत्र १८ )

 सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा।
 नाभि चक्रमजरमनर्व यत्रेमा,
विश्वा भुवनाधि तस्थुः ||
 - अग्वेद १-१६४-२ ।

 सातों ग्रह १२ भावों से योग करते हैं, १२ राशियों का भोग करते हैं। भोग वा योग के १२x ७ = ८४ आसन हुए। प्रत्येक यह भगवान् विष्णु का अंश है।
 १२ राशियों पर इन्हीं ७ यहाँ का शासन चलता है। आकाशीय संसद् का संचालन इन्हीं सातों की चन्द्रमा बायीं ओर तथा सूर्य दायीं ओर क्रमशः रानी और राजा के समान विराजमान हैं। चन्द्रमा की राशि कर्क ४ तथा सूर्य की राशि सिंह ५ है। प्रथम पंक्ति में, ४+७ = ९(१) चन्द्रराशि में से १ कम किया तथा सूर्य राशि में १ बढ़ा दिया। (४-१) = ३ तथा (५ + १) = ६ हुआ। मिथुन और कन्या बुध की राशि है। बुध युवराज के पद पर प्रतिष्ठित है। दूसरी पंक्ति में, ३ + ६ =९ बुध राशि मिथुन में से १ कम किया तथा कन्या में १ बढ़ा दिया। (३१) २ और (६ + १) = ७ हुआ। वृष और तुलना शुक्र की राशियाँ हुईं। शुक्र अमात्य (मंत्री) के पद पर आसीन है। तीसरी पंक्ति में, २ + ७ = ९ (R) (३) शुक्र राशि वृष में से १ घटाया तथा तुला में १ बढ़ाया। (२-१) = १ एवं (७ + १) = ८ हुआ। मेष और वृश्चिक राशियों मंगल की हुई। मंगल सेनानायक है। चौथी पंक्ति में १ + ८ - ९ (8) मंगल राशि मेष में से १ कम किया तथा वृश्चिक में १ बढ़ा दिया। ११० वा १२ तथा ८ + १ = ९ हुआ। मीन और धनु गुरु की राशियाँ हुई। गुरु पुरोहित है। पांचवीं पंक्ति में० वा १२ + ९ = ९ गुरु की राशि मीन में से १ घटाया तथा धनु में १ जोड़ा। (१२ -१) ११ एवं (९ + १) = १०
हुआ। कुम्भ और मकर शनि की राशियाँ हुई। शनि भृत्य है। छठवीं पंक्ति में, ११ + १० = २१ वा २१ - १२ = ९ (६) आकाशीय राजसभा में चार पायों वाला सिहासन है। इस पर सूर्य राजा और चन्द्र रानी का युग्म विरामान है। चार पायों का अर्थ है कर्क ४ राशि सब से बड़ी आसन्दिका होने से यह सिंहासन है। सिंह के शरीर में चार पैर और एक पूंछ अर्थात् ५ अंग भूस्पर्शी है। इसलिये सूर्य को चन्द्रमा की अपेक्षा अधिक गौरव देने के लिये १ सोपान ऊपर सूर्य का स्थान नियत किया गया। इस प्रकार सूर्य की राशि ४ + १ = ५ सिंह हुई। राजा रानी को युवराज सबसे प्रिय होता है। अतः युवराज बुध राजसिंहान के सब से निकट है। इसे ३ मिथुन, ६ कन्याराशि का स्वामित्व सौंपा गया। युवराज के बाद अमात्य को महत्व दिया जाता है। इस लिये अमात्य शुक्र को बुध के बाद का स्थान मिला। शुक्र को २ वृष एवं ७ तुला राशि का स्वामित्व दिया गया। अमात्य के बाद सेनापति का महत्व होता है। इस पद पर मंगल को बैठाया गया है। १ मेष एवं ८ वृश्चिक की राशियों मंगल के अधिकार में पड़ीं। सेनापति के पश्चात् प्रौढ़ पुरोहित को महत्व दिया जाता है। यह पद बृहस्पति गुरु को दिया गया है। इसका वर्चस्व १२ मीन एवं ९ धनु राशियों पर है। इसके बाद सबसे अंतिम आसन भृत्य वा सेवक को मिला है। शनि सेवक है। इसका कार्य क्षेत्र ११ कुंभ एवं १० मकर राशि तक है। यह ब्रह्म व्यवस्था है।

Comments

Popular posts from this blog

आत्महत्या को शास्त्रों में पाप क्यों कहा गया है?

एक कल्प में कितने वर्ष होते हैं?

आहार के नियम भारतीय 12 महीनों अनुसार